हर बार मार्च का महीना क्यों बढ़ा देता है उत्तराखंड का सियासी पारा, जानिए

देहरादून l उत्तराखंड में त्रिवेंद्र सिंह रावत सरकार की कुर्सी खतरे में है। सियासी उथल-पुथल के बीच दिल्ली से लेकर राज्य तक बैठकें चल रही हैं। त्रिवेंद्र सिंह रावत ही उत्तराखंड के सीएम रहेंगे या कोई और बनेगा इसे लेकर बहस जारी है। इन सबके बीच उत्तराखंड में एक चर्चा और हो रही है, यह है मार्च के महीने की। ऐसा इसलिए है क्योंकि मार्च के महीने में हिमालय राज्य में पहले भी कई प्रमुख सियासी उथल-पुथल देखने को मिली है।

यह मार्च 2016 ही था जब हरीश रावत सरकार को गिराने का प्रयास किया गया था। विधायकों के एक समूह ने सीएम के खिलाफ विद्रोह किया था। फिर, पिछले साल मार्च में, मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित करके आश्चर्यचकित कर दिया, जिसके बाद हिमालयी राज्य में सियासी हलचल मच गई।

इसलिए त्रिवेंद्र सिंह रावत के खिलाफ हुए विधायक
इस साल भी, यह मार्च का महीना ही है कि सीएम ने बजट सत्र के दौरान गैरसैंण को उत्तराखंड का तीसरा मंडल घोषित कर दिया। इस मंडल में कुमाऊं और गढ़वाल के दो दो जिलों को सम्मिलित किया गया है। चमोली,रुद्रप्रयाग, अल्मोड़ा और बागेश्वर जिलों को इस मंडल में सम्मिलित किया जाएगा। मुख्यमंत्री ने कहा कि कमिश्नर और डीआईजी स्तर के अधिकारी गैरसैण में बैठेंगे।

इसलिए मार्च का महीना उत्तराखंड के लिए है खास
कहा जा रहा है कि त्रिवेंद्र सिंह रावत के इस फैसले के बाद कुमाऊं के बीजेपी विधायक बहुत नाराज हैं और राज्य में राजनीतिक संकट की स्थिति बन गई है। राजनीतिक विश्लेषक जय सिंह रावत ने टीओआई को बताया, ‘मार्च का उत्तराखंड की राजनीति के साथ एक विशेष संबंध है क्योंकि यह वह महीना है जब प्रत्येक चुनाव के बाद एक नई सरकार का गठन होता है। इसके अलावा, बजट सत्र – जो आमतौर पर मार्च में पारित होता है – अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है।’

जारी ही सियासी हलचल
संयोग से, यह 2016 में बजट सत्र के दौरान था कि हरीश रावत सरकार को अपने ही विधायकों से बगावत का सामना करना पड़ा था। पांच साल बाद, यह फिर से बजट सत्र के दौरान है कि त्रिवेंद्र रावत सरकार को भी भगवा पार्टी के विधायकों के विरोध का सामना करना पड़ रहा है और। पार्टी ने पर्यवेक्षकों को देहरादून भेजा और विधानसभा सत्र जल्दबाजी में खत्म हो गया। अब सियासी हलचल जारी है।


साभार : नवभारतटाइम्स.कॉम

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