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इलाहाबाद में जनवादी लेखक संघ की गोष्ठी में आशुतोष प्रसिद्ध का काव्यपाठ, कविताओं पर हुई गंभीर चर्चा

Frontier Desk by Frontier Desk
22/04/26
in मुख्य खबर, साहित्य
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संवेदनाओं के सूक्ष्म रंगों में डूबा एक काव्य-संध्या

जब कविता ने चुपचाप आत्मा को छुआ…काव्यपाठ में उभरी आशुतोष प्रसिद्ध की संवेदनशील काव्य-दृष्टि

*** आशुतोष प्रसिद्ध का काव्यपाठ ***

सत्रह अप्रैल 2026 को जनवादी लेखक संघ, इलाहाबाद की घर-गोष्ठी श्रृंखला के अंतर्गत युवा कवि आशुतोष प्रसिद्ध के काव्यपाठ का आयोजन हुआ। आशुतोष प्रसिद्ध ने अपनी प्रतिनिधि कविताओं – क्या इस दुनिया से जाना इतना मुश्किल है हेमंत, मेरा जीवन कोरा कागज, चूमना शब्द का सर्वनाम, एक टुकड़ा याद, पास की दूरी, नाव डूबती है, पलायन, ओरहन, परिणति, अभिव्यक्ति का पनियाना, झर्रा, अपरिहार्य, इंतजार के दिनों की मनःस्थिति, नइहर का मोह छुटता ही नहीं, प्रत्याशा एवं कुछ ग़ज़लों का पाठ किया।
आशुतोष प्रसिद्ध की कविताओं पर बात करते हुए कवि एवं आलोचक बसंत त्रिपाठी ने कहा कि अधिकतर कविताओं के शिल्प, कथ्य और बिम्ब नब्बे के दशक की संवेदनाओं के आस-पास हैं. आशुतोष अपनी कविताओं में बार-बार अधिक संवेदनशील होने का आग्रह लेकर आते हैं। इनकी कविताएँ अपनी आत्मा का उत्खनन है लेकिन आक्रामक या क्रूर तरीके से नहीं बल्कि कोमल और संवेदनशील तरीके से बेचैनियों को रखते हैं. इनकी कविताएं चमत्कार युक्ति से बची हुई कविताएं हैं। यद्यपि कुछेक लंबी कविताओं में कहीं-कहीं जो दोहराव भी है.
प्रदीप्त प्रीत ने कहा कि आशुतोष कि अधिकतर कविताएं समाज के दुराग्रहों से उपजे हुए जिस अकेलेपन और निर्वात का सृजन करती हैं वह कमोबेश हर रचनात्मक व्यक्ति को अपने चुने हुए संसार जैसा ही सहज महसूस होता है. वहीं युवा कवि आदित्य पाण्डेय ने कहा कि इनकी कविताओं में अनुपस्थिति एवं रिक्तता की बहुत सारी परतें हैं। इस कवि की एक खास बात यह है कि यह अपनी अभिव्यक्ति के साथ-साथ कविताओं में आए हुए पात्रों की भावनाओं एवं अपने लोक के प्रति भी संवेदनशील है।
कवि विवेक निराला ने उनकी कविताओं में अयोध्या के बदलाव को रेखांकित किया और युवा कवि प्रज्वल चतुर्वेदी कहा कि इनके गद्य में जो तारतम्यता, औचिकता एवं प्रवाह है कई बार उसका अभाव इनकी कविताओं में देखने को मिलता है। जिसकी वजह से बिम्ब, भाषा और कथ्य की प्रचुरता के बावजूद कविताएं अपना पर्याप्त प्रभाव पाठक पर नहीं छोड़ पाती हैं।
कवि एवं शायर लक्ष्मण प्रसाद गुप्त ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में विस्तार से अपनी बात रखते हुए कहा कि इस दौर में कविता से दुनियावी अपेक्षा बहुत अधिक होने लगी है, खासकर अकादमिक पाठक के नजरिए से देखने पर आशुतोष की कविताओं में यह अपेक्षा सीधे तौर पर पूरी नहीं होती है लेकिन बहुत संभव है कि बाहरी पाठक को इनमें अपना अक्स दिखाई देगा। इन कविताओं में कई बिम्ब बिल्कुल नए हैं. आशुतोष प्रसिद्ध की कविताओं का अंदरूनी संसार बहुत समृद्ध है।
आखिर में बसंत त्रिपाठी ने सुरजीत पातर की एक कविता और कान्सटैन्टीन पी. कवाफ़ी (अनुवाद : कुँवर नारायण) की दो महत्वपूर्ण कविताओं का पाठ करके सभी श्रोताओं का धन्यवाद ज्ञापन किया। इस मौके पर आमंत्रित कवि, टिप्पणीकर्ताओं एवं अध्यक्ष के अलावा अनीता, गोविंद निषाद, रंजना कुमारी, शिवांगी गोयल, अरविन्द शर्मा, सत्यभामा राजोरिया, अनुभव अग्निहोत्री, आर्यन सिंह, शाशांक आनन्द, आमरीन खान, साक्षी पाण्डेय, तुलसी, समर प्रताप सिंह, नीरज चौधरी, हर्षिता त्रिपाठी, आदर्श रॉय, शुभम पाल, आद्या आदि मौजूद थे।

रिपोर्ट : प्रदीप्त प्रीत

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