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गज़ब का विकास! पांच साल में 826 स्कूलों पर पड़े ताले

फ्रंटियर डेस्क by फ्रंटियर डेस्क
14/03/26
in देहरादून
गज़ब का विकास! पांच साल में 826 स्कूलों पर पड़े ताले
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पहाड़ों से पलायन रोकने में नाकाम साबित हो रही सरकार

देहरादून। उत्तराखंड के पहाड़ों में विकास के दावों के बीच एक कड़वी सच्चाई सामने आई है। पिछले पांच वर्षों में राज्य के 826 प्राथमिक विद्यालयों पर ताले लग चुके हैं। कभी बच्चों की चहल-पहल से गुलजार रहने वाले इन स्कूलों में आज सन्नाटा पसरा हुआ है। पलायन और लगातार घटती छात्र संख्या के कारण यह रूकूल बंद होने का दावा सरकार की और से किया जा रहा है।

यह चौंकाने वाला खुलासा तब हुआ जब विधानसभा में भाजपा विधायक महेश जीना के सवाल पर शिक्षा मंत्री धन सिंह रावत ने खुद सरकार की ओर से आंकड़े पेश किए। सरकार ने स्वीकार किया कि कई स्कूलों में छात्रों की संख्या इतनी कम हो गई थी कि उन्हें चलाना संभव नहीं रहा। ऐसे में शिक्षा विभाग ने इन स्कूलों को बंद करने या पास के विद्यालयों में छात्रों का समायोजन करने का फैसला लिया।

दरअसल यह केवल स्कूल बंद होने की कहानी नहीं है, बल्कि पहाड़ों में तेजी से बदलते सामाजिक और आर्थिक हालात की तस्वीर भी है। गांव खाली हो रहे हैं, परिवार शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं और पीछे छूट रहे हैं सूने घर और बंद होते स्कूल।

टिहरी में सबसे ज्यादा ताले

विधानसभा में रखे गए आंकड़ों के मुताबिक सबसे ज्यादा असर टिहरी जिले में दिखाई दिया है, जहां 262 स्कूल बंद कर दिए गए। इसके अलावा पौड़ी गढ़वाल में 120, पिथौरागढ़ में 104, अल्मोड़ा में 83, नैनीताल में 49, चमोली में 43, देहरादून में 38, चंपावत में 34, उत्तरकाशी और बागेश्वर में 25-25, उधमसिंह नगर में 21 और रुद्रप्रयाग में 15 स्कूल बंद हुए हैं।

हरिद्वार में भी 2 स्कूलों पर ताले लग चुके हैं। सरकार का कहना है कि जिन स्कूलों में छात्रों की संख्या बेहद कम थी, वहां के बच्चों को नजदीकी बड़े स्कूलों में भेजा जा रहा है ताकि उन्हें बेहतर शिक्षा और संसाधन मिल सकें। साथ ही स्कूलों की प्रशासनिक व्यवस्था को मजबूत करने के लिए 808 प्रधानाध्यापकों की नियुक्ति प्रक्रिया भी चल रही है।

कई स्कूलों में गिनती के छात्र

हालात इतने गंभीर हो चुके हैं कि कई गांवों के स्कूलों में केवल दो से तीन छात्र ही बचे थे। ऐसे में पूरे स्कूल को चलाना विभाग के लिए मुश्किल बन गया। यही वजह है कि शिक्षा विभाग को मजबूर होकर स्कूल बंद करने पड़े। राज्य में अभी भी 10,940 स्कूल संचालित हो रहे हैं, लेकिन इनमें से बड़ी संख्या ऐसे विद्यालयों की है जहां छात्रों की संख्या दस से भी कम है।

पलायन ने बढ़ाई परेशानी

पहाड़ों से लगातार हो रहा पलायन इस संकट की सबसे बड़ी वजह बनता जा रहा है। रोजगार, बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं और आधुनिक सुविधाओं की तलाश में हर साल हजारों परिवार गांव छोड़ रहे हैं। जब परिवार ही गांव से चले जाते हैं तो स्कूलों में बच्चों की संख्या स्वाभाविक रूप से घट जाती है।

बुनियादी सुविधाओं की कमी भी जिम्मेदार

शिक्षाविद् शिव शंकर जायसवाल का मानना है कि सरकारी स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं की कमी भी छात्रों की घटती संख्या का बड़ा कारण है। कई स्कूलों के भवन जर्जर हैं, कक्षाओं की कमी है और कई जगह शौचालय, पेयजल व खेल मैदान जैसी सुविधाएं भी पर्याप्त नहीं हैं। इसके अलावा शिक्षकों की कमी भी लंबे समय से बनी हुई समस्या है।

बड़ा सवालः क्या पहाड़ों में बच पाएगी शिक्षा?

पांच साल में 826 स्कूलों का बंद होना साफ संकेत दे रहा है कि पहाड़ों की शिक्षा व्यवस्था गंभीर संकट से गुजर रही है। पलायन, घटती आबादी, कमजोर बुनियादी ढांचा और शिक्षकों की कमी जैसे कई कारण मिलकर इस समस्या को और गहरा कर रहे हैं। अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में पहाड़ों के और भी स्कूलों पर ताले लग सकते हैं- और शायद बच्चों की किलकारियां भी पहाड़ों से हमेशा के लिए गायब हो जाएं।

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