जोशीमठ की आपदा

अजय दीक्षित


उत्तराखण्ड के जोशीमठ शहर में जो दिख रहा है, वह कई तरह के आपातकाल और विध्वंसकाल की चेतावनी है। भू-स्खलन हो रहा है। ग्लेशियर पिघल कर स्थान बदल रहे हैं। और मलबे मिट्टी के पहाड़ों पर शहर बसे हैं। जिंदगी और दुनिया आबाद है, लेकिन अब लोग बेघर हो रहे हैं। जोशीमठ में 678 घर खतरनाक स्थिति में हैं, लिहाजा खाली कराए जा रहे हैं। अभी तक 81 मकान खाली कराए जा चुके हैं, सिलसिला जारी है और उनमें रहने वालों को शिफ्ट किया जा रहा है। जिंदगी विस्थापित हो रही है। यह अनुभव चार दशक पहले भी भयावह और असुरक्षित था और आज भी त्रासदी के मुहाने पर है। तब भू-वैज्ञानिकों, विशेषज्ञों और पर्यावरणविदों ने जो रपटें सरकार को दी थीं, वे कहीं धूल फांक रही होंगी, क्योंकि निर्माण, बुनियादी ढांचे, सुरंगें, राष्ट्रीय राजमार्ग और रेल लाइन आदि के जरिए विकास के बिम्ब उभारना सरकार की योजनाओं में शामिल था।

बीते कुछ अंतराल में गढ़वाल हिमालय में जो आर्थिक और मानवीय नुकसान सामने आए हैं, उनसे साफ हो गया था कि ऐसे विकास में सरकार को पर्यावरण संबंधी खामियाजा भुगतना पड़ेगा, जीडीपी का भारी पतन होगा, लेकिन पहाड़ों का छलनी किया जाना, विस्फोटों से सुरंग बनाना, पहाड़ को क्षत-विक्षत कर रेलवे लाइन बिछाना और पनबिजली तथा खनन माफिया की मुनाफाखोरी जारी रही। आज खौफनाक मंजर सामने दिख रहा है। जोशीमठ का महत्व सांस्कृतिक, पौराणिक, आध्यात्मिक और सामरिक है। सिर्फ 40 किलोमीटर की दूरी पर चीन की सीमा है। इसे भगवान विष्णु का दूसरा घर माना जाता था। आदि शंकराचार्य ने भारत में हिंदुत्व के जो चार मठ स्थापित किए थे, उनमें से एक ‘ज्योतिर्मठ’ इसी शहर का प्राचीन नाम था। विष्णु अवतार नरसिंह भगवान भी अपना गुस्सा शांत करने इसी पहाड़ पर आये थे । लोग उनके मन्दिर में पूजा करते हैं।

आज शिवलिंग भी खंडित हो गया है, लिहाजा श्रद्धालु उसे देखकर रो रहे हैं और किसी अनिष्ट की कल्पना से कांप रहे हैं। उत्तराखंड के मुख्य सचिव ने खाली हो चुके और दरारों से फटे मकानों को ध्वस्त करने के आदेश भी दे दिए हैं। जो आशियाने थे, वे अब मलवा हो जाएंगे। सिर्फ जोशीमठ ही नहीं, राज्य के अन्य 70 स्थानों और गांवों के लोगों ने भी घरों, ज़मीन में दरारों की शिकायतें की हैं। टिहरी, पौड़ी, रुद्रप्रयाग और चमौली जिलों के हालात भी जोशीमठ सरीखे हो सकते हैं। वहां भी पहाड़ को छिन्न-भिन्न किया गया है। कुल 35,000 परिवारों पर अचानक संकट आ पसरा है। किस- किस पहाड़ी स्थल को ध्वस्त करेंगे, खाली कराएंगे और मलबे मिट्टी में तबदील होता देखते रहेंगे? कमोबेश सभी पहाड़ों को छलनी किया जा रहा है। पहाड़ों पर अप्रत्याशित, अवांछित बोझ है। विकास के नाम पर पहाड़ों को चीर- चीर कर ‘महानगरीय’ बनाने की भूख पहाड़ों को जिंदा कहां रहने देगी?

दरअसल ‘ग्लोबल क्लाईमेट रिस्क इंडेक्स, 2020’ में भारत का स्थान पांचवां है। इससे भारत बेहद असुरक्षित और आघात योग्य देशों की जमात में आ गया है। तब भयभीत होकर भारत सरकार ने 2070 तक ‘शून्य कार्बन उत्सर्जन’ का लक्ष्य घोषित किया है। यानी सरकार जलवायु परिवर्तन के खतरे भांप और आंक रही है। नीति आयोग और नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक सरीखे संवैधानिक संगठन अपनी-अपनी रपटों में आगाह कर चुके हैं कि पहाड़ों पर जो अतिक्रमण, ड्रिल निर्माण किए जा रहे हैं, विकास के नाम पर सुरंगें और राजमार्ग बनाए जा रहे हैं, उनके कारण एक दिन पहाड़ पर जीवन ही समाप्त हो सकता है । इससे बड़ी और खौफनाक चेतावनी और क्या हो सकती है ?

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