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खस्ताहाल भारतीय सड़कें और अवैध निर्माण – अर्थव्यवस्था को पहुँच रहा भारी नुकसान

Frontier Desk by Frontier Desk
24/10/25
in लेख
खस्ताहाल भारतीय सड़कें और अवैध निर्माण – अर्थव्यवस्था को पहुँच रहा भारी नुकसान
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Devendra K Budakoti
देवेंद्र कुमार बुडाकोटी

देवेंद्र कुमार बुडाकोटी

भारत में सड़कें अक्सर खराब हालत में होती हैं — न तो निर्माण की गुणवत्ता ठीक होती है, न ही रखरखाव। आम लोग लगातार व्यवस्था और उससे जुड़ी भ्रष्टाचार की शिकायत करते हैं। इसी संदर्भ में मैंने हिमालयी क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण परियोजनाओं में कार्य कर चुके, प्रतिष्ठित भूवैज्ञानिक डॉ. दिनेश सती से चर्चा की। उन्होंने एक बहुत ही सटीक बात कही: “जब तक सड़क कच्ची, तब तक नौकरी पक्की।”

उनका तात्पर्य था कि सड़कें जानबूझकर घटिया गुणवत्ता में बनाई जाती हैं, क्योंकि यह आम धारणा है कि किसी भी ठेके की राशि का 30 से 40 प्रतिशत हिस्सा ‘सिस्टम’ को चिकनाई देने में चला जाता है, ताकि काम जल्दी स्वीकृत हो सके। यही कारण है कि कुछ विभागों को ‘मलाईदार’ कहा जाता है। ऐसी व्यवस्था में अच्छी गुणवत्ता वाली सड़कें और उनका नियमित रखरखाव केवल एक कल्पना बनकर रह जाते हैं। बार-बार मरम्मत के लिए टेंडर जारी होते हैं, जिससे घटिया निर्माण का चक्र चलता रहता है।

जबकि प्राकृतिक आपदाओं को अक्सर नुकसान का कारण बताया जाता है — खासकर हिमालयी क्षेत्रों में — यह समझना जरूरी है कि कई यूरोपीय देशों में भारी बर्फबारी और बारिश के बावजूद सड़कें सालों-साल अच्छी स्थिति में बनी रहती हैं। तो वहां कैसे संभव है?

अब हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में आई हालिया आपदाओं की बात करें, तो जान-माल की भारी हानि देखने को मिली। हालांकि प्राकृतिक आपदाओं जैसे कि बादल फटना, भूस्खलन आदि को रोका नहीं जा सकता, फिर भी ज़मीनी स्तर पर आपदा प्रबंधन और न्यूनीकरण को लेकर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।

इस वर्ष की मानसूनी आपदाओं में जिन इमारतों को नुकसान पहुँचा, उनमें से अधिकांश बिना मंज़ूरी के, अवैध रूप से बनाई गई थीं — नदी किनारों और ढलानों पर। वर्षों से ये निर्माण कार्य बिना किसी वैध अनुमति के चलते आ रहे थे, और इसका कारण मुझे लगता है: “जब तक निर्माण गैरकानूनी, तब तक रहेगी कर वसूली।”

आपदा के समय ये अवैध ढांचे मीडिया, विशेषकर सोशल मीडिया में प्रमुखता से सामने आए। परंतु जैसे ही राहत और बचाव कार्य शुरू हुए, अवैध निर्माण का मुद्दा पीछे छूट गया। हकीकत यह है कि ऐसे निर्माण संबंधित विभागों की मिलीभगत के बिना संभव ही नहीं हैं। शुरुआत से अंत तक हर स्तर पर रिश्वत का लेन-देन होता है — जब तक कोई बड़ी त्रासदी न हो जाए।

चिंताजनक बात यह है कि इस तरह के गैरकानूनी निर्माण केवल आपदा संभावित क्षेत्रों तक सीमित नहीं हैं। वे उन क्षेत्रों में भी मौजूद हैं, जहाँ कभी भी भूकंप जैसी आपदा भारी नुकसान पहुँचा सकती है।

सड़क और परिवहन क्षेत्र किसी भी देश की बुनियादी संरचना के महत्वपूर्ण स्तंभ होते हैं। हालांकि हाल के वर्षों में हमारे राष्ट्रीय राजमार्ग नेटवर्क में कुछ सुधार देखने को मिला है, परंतु समग्र स्थिति अभी भी गंभीर है। अवैध निर्माण न केवल जान-माल की हानि का कारण बनते हैं, बल्कि पर्यटन क्षेत्र को भी भारी नुकसान पहुँचा रहे हैं — विशेष रूप से हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड जैसे राज्यों में।

अब समय आ गया है कि पर्यटन के नाम पर हो रहे अनियंत्रित और अवैध निर्माण को गंभीरता से लिया जाए। हमें तत्काल ठोस कदम उठाने होंगे, ताकि भविष्य में पर्यटन इन राज्यों की अर्थव्यवस्था को सशक्त बना सके और युवाओं को रोजगार के अवसर प्रदान कर सके।

लेखक समाजशास्त्री हैं और विकास क्षेत्र में लगभग चार दशकों से सक्रिय हैं।

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