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बीजेपी की ठाकुर वोट साधने की रणनीति, बना प्लान

Jitendra Kumar by Jitendra Kumar
07/05/24
in मुख्य खबर, राजनीति, राष्ट्रीय
बीजेपी की ठाकुर वोट साधने की रणनीति, बना प्लान
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लखनऊ। लोकसभा चुनाव के दो चरण की वोटिंग हो चुकी है और अब तीसरे चरण के लिए मतदान हो रहा है. पश्चिमी यूपी में ठाकुर प्रत्याशी को न उतारने और विजय रुपाला के बयान को लेकर ठाकुर समुदाय के बीच नारजगी खुलकर दिखी. अब लोकसभा चुनाव पश्चिमी यूपी और ब्रज क्षेत्र से आगे बढ़कर अवध और पूर्वांचल के सियासी रणभूमि में होने जा रहे हैं. इन इलाकों की सीट पर ठाकुर समुदाय अहम रोल अदा करते हैं, जिसके चलते बीजेपी अब डैमेज कन्ट्रोल में जुट गई है ताकि पश्चिमी यूपी वाली कमी पूर्वांचल और अवध में न रह जाए. यूपी की सियासत में एक सप्ताह में कई बड़े कदम उठाए गए हैं, जिसे ठाकुर समुदाय की सियासत से जोड़कर देखा जा रहा?

लोकसभा चुनाव के लिहाज से उत्तर प्रदेश बेहद अहम राज्य माना जाता है, क्योंकि देश की सबसे ज्यादा 80 सीटें यहीं से आती है. बीजेपी ने इस बार के चुनाव में मिशन-80 का टारगेट यूपी में सेट किया है, लेकिन टिकट बंटवारे के चलते ठाकुर समाज की नाराजगी पार्टी के लिए बढ़ा दी. पश्चिमी यूपी में कई जगहों पर महापंचायतें करके ठाकुरों ने बीजेपी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था. सहारनपुर के ननौत गांव, मेरठ के कपसेड़ा, गाजियाबाद के धौलाना और नोएडा के जेवर में ठाकुरों की पंचायतें हुईं थी. ऐसे में पिछले दो चरणों में ठाकुर समाज की नाराजगी ने बीजेपी के लिए टेंशन बढ़ा दी है.

बीजेपी की ठाकुर वोट साधने की रणनीति

पश्चिमी यूपी और ब्रज क्षेत्र के बाद अब जब चुनाव अवध-पूर्वांचल की तरफ बढ़ रहा है तो बीजेपी ठाकुर समुदाय को मैनेज करने में जुटी है. इसके पीछे वजह यह है कि अवध और पूर्वांचल क्षेत्र में कहीं न कहीं ठाकुर समुदाय के वोटर सियासी तौर पर काफी प्रभाव में माने जाते हैं. यही वजह है कि बीजेपी पश्चिम की गलती पूर्वांचल और अवध के बेल्ट में नहीं दोहराना चाहती. क्योंकि ठाकुरों की नारजगी से बीजेपी के मिशन पर ग्रहण लगने का खतरा दिख रहा था. इसीलिए बीजेपी अब ठाकुरों को साधने की कवायद तेजी से कर रही है. इसे तीन प्वाइंट में समझ सकते हैं?

अमित शाह और राजा भैया की मुलाकात

जनसत्ता पार्टी के अध्यक्ष और कुंडा से विधायक राजा भैया की रविवार को केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह से बेंगलुरु में मुलाकात हुई थी, जिसे ठाकुर समाज की नाराजगी को दूर करने से जोड़कर देखा जा रहा है. राजा भैया यूपी में ठाकुर समुदाय के बड़े नेता के तौर पर जाने जाते हैं और उनकी पकड़ सिर्फ प्रतापगढ़ सीट पर ही नहीं बल्कि सुल्तानपुर से लेकर अमेठी, रायबरेली, अयोध्या, प्रयागराज और कौशांबी क्षेत्र तक है. राजा भैया 2004 से लेकर 2017 तक सपा के लिए सियासी मददगार साबित होते रहे हैं, लेकिन योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद से बीजेपी के साथ खड़े नजर आते हैं.

बीजेपी की सरकार बनने के बाद से राजा भैया विधान परिषद से लेकर राज्यसभा चुनाव में बीजेपी के साथ खड़े रहे. इसके अलावा बीजेपी के मुद्दे पर भी सदन से सड़क तक सुर में सुर मिलाते नजर आए. राजा भैया चाहते थे कि लोकसभा चुनाव में बीजेपी के साथ गठबंधन हो, लेकिन ऐसा नहीं हो सका. इसके बाद माना जा रहा था कि राजा भैया प्रतापगढ़ और कौशांबी सीट पर सपा के लिए मदद कर सकते हैं, क्योंकि बैकडोर से सपा के साथ उनकी डील की चर्चा थी. ऐसे में राजा भैया और अमित शाह के बीच में पक रही सियासी खिचड़ी को ठाकुर वोटों के डैमेज कन्ट्रोल के तहत देखा जा रहा है. माना जा रहा है कि राजा भैया अब बीजेपी के लिए सियासी जमीन तैयार करने की मुहिम में जुट गए हैं.

बृजभूषण सिंह के बेटे को मिला टिकट

उत्तर प्रदेश में बीजेपी ने सबसे देर में अगर किसी लोकसभा सीट पर टिकट का ऐलान किया है तो वह बृजभूषण शरण सिंह की कैसरगंज सीट थी. महिला पहलवानों के यौन शोषण के आरोप में फंसे बृजभूषण शरण को उम्मीदवारी को लेकर बीजेपी कशमकश में फंसी हुई थी, क्योंकि उनका अपना सियासी आधार है. गोंडा और बस्ती मंडल में ठाकुरों के बीच बृजभूषण सिंह की मजबूत पकड़ मानी जाती है. विजय रुपाला के बयान को आधार बनाकर ठाकुरों ने प्रेशर पॉलिटिक्स बनाने में दांव चला, जिसका ही असर है बीजेपी ने भले ही बृजभूषण शरण का टिकट काट दिया, लेकिन पार्टी ने किसी और को उम्मीदवार बनाने के बजाय उनके बेटे करण बृजभूषण सिंह को ही टिकट दिया.

कैसरगंज सीट से बृजभूषण शरण सिंह लगातार तीन बार से सांसद है, इसके अलावा गोंडा और बलरामपुर सीट से चुनाव जीत चुके हैं. बीजेपी ने जिस-जिस सीट पर बृजभूषण सिंह को उतारा था उन सीटों पर जीत हासिल कर उन्होंने पार्टी की झोली में डाल दी. उन्होंने बलरामपुर सीट रिजवान जहीर जैसे दिग्गज नेता से छीनी थी. इसके बाद उन्होंने कैसरगंज सीट से जीत की हैट्रिक लगाई, जिसके चलते ही उनका टिकट अंतिम समय तक फंसा था. बीजेपी यौन शोषण के आरोपी बृजभूषण को टिकट देने से हिचकिचा रही थी, लेकिन उसने ठाकुर वोटों के चलते ही बीच का रास्ता निकाला और उनके बेटे को प्रत्याशी बना दिया.

धनंजय सिंह की पत्नी ने छोड़ा मैदान

जौनपुर लोकसभा सीट से बसपा के टिकट पर चुनावी मैदान में उतरी बाहुबली धनंजय सिंह की पत्नी श्रीकला रेड्डी ने अपने कदम पीछे खींच लिए हैं. जौनपुर सीट पर बीजेपी से कृपा शंकर सिंह चुनाव लड़ रहे हैं जबकि सपा से बाबू सिंह कुशवाहा की पत्नी शिवकन्या कुशवाहा मैदान में है. कृपा शंकर सिंह ठाकुर समुदाय से आते हैं और धनंजय की पत्नी के चुनाव लड़ने से ठाकुर वोटों में बिखराव का खतरा बना हुआ था. बीजेपी के लिए धनंजय फैक्टर एक बड़ी टेंशन बन रहा था, जिसके चलते ही उनके मैदान से हटने की स्क्रिप्ट लिखी गई. श्रीकला रेड्डी ने यह फैसला तब लिया, जब धनंजय सिंह जेल से बाहर आए और बेंगलुरु में राजा भैया और अमित शाह के बीच बैठक होती है.

राजा भैया और धनंजय सिंह का रिश्ता

राजा भैया और धनंजय सिंह के बीच काफी गहरे रिश्ते हैं. माना जाता है कि राजा भैया के जरिए ही धनंजय सिंह को साधने का काम किया गया है. धनंजय सिंह की छवि एक ठाकुर बाहुबली नेता की रही है और उनका सियासी असर सिर्फ जौनपुर सीट तक ही नहीं बल्कि पूर्वांचल की कई सीटों तक है. इतना ही नहीं धनंजय सिंह ने शुरू से ही मुख्तार अंसारी के खिलाफ मोर्चा खोल रखा था और बाहुबली बृजेश सिंह के गुट में रहे. इसके चलते धनंजय सिंह की अपनी सियासी पकड़ पूर्वांचल के ठाकुरों के बीच मजबूत मानी जाती है. धनंजय सिंह के जरिए बीजेपी ने ठाकुरों को सियासी संदेश देने की कोशिश की है, वो भले ही अभी खुलकर न बोल रहे हों, लेकिन उनकी खामोशी बहुत कुछ कह रही है.

रायबरेली से दिनेश प्रताप सिंह को टिकट

गांधी परिवार के गढ़ और देश की हाई प्रोफाइल माने जाने वाली रायबरेली लोकसभा सीट पर बीजेपी ने दिनेश प्रताप सिंह को उतारा है, जो ठाकुर समाज से आते है. बीजेपी से इस सीट पर कई दावेदार माने जा रहे थे, जिसमें सपा के विधायक मनोज पांडेय का नाम भी चर्चा में था. इसके बावजूद बीजेपी ने दिनेश प्रताप सिंह को रायबरेली सीट पर राहुल गांधी के खिलाफ उतारा है. दिनेश प्रताप सिंह मौजूदा समय में योगी सरकार में मंत्री हैं और पिछली बार सोनिया गांधी के खिलाफ चुनाव लड़कर करीब पौने तीन लाख वोट उन्होंने हासिल किए थे. बीजेपी इस बार किसी ब्राह्मण को उतारने की प्लानिंग कर रही थी, लेकिन ठाकुर वोटों के चलते उन पर एक बार फिर से भरोसा जताया है. हालांकि, दिनेश सिंह को सियासी बुलंदी कांग्रेस में मिली है और उन्होंने कांग्रेस छोड़कर 2018 में बीजेपी का दामन थामा था.

अवध से पूर्वांचल तक को साधने का प्लान

रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया, बृजभूषण शरण सिंह और दिनेश प्रताप सिंह अवध के इलाके से आते हैं. बृजभूषण सिंह का सियासी असर गोंडा, बहराइस और बस्ती के अलावा पूर्वांचल के कई जिलों में है तो धनंजय सिंह की अपनी सियासी पकड़ पूर्वांचल के बेल्ट में है. पूर्वांचल के जौनपुर, मछलीशहर, बलिया, गाजीपुर, घोसी, चंदौली और आजमगढ़ सीट पर बीजेपी के लिए इस बार कड़ी चुनौती है तो दूसरी तरफ अवध में रायबरेली, प्रतापगढ़, सुल्तानपुर, अमेठी, कौशांबी, बाराबंकी, गोंडा, बहराइच में बीजेपी के सामने सपा-कांग्रेस गठबंधन कांटे की टक्कर देता हुआ नजर आ रहा है.

राजनीतिक विश्लेषक हेमंत तिवारी कहते हैं कि जौनपुर सीट पर धनंजय सिंह की पत्नी श्रीकला रेड्डी के चुनाव लड़ने से सीधा नुकसान बीजेपी के प्रत्याशी कृपा शंकर सिंह को हो रहा था, लेकिन उनके हटने से बीजेपी की राह आसान हो गई. इसके अलावा जौनपुर से लगा मछली शहर और भदोही सीट पर भी बीजेपी को फायदा हो सकता है. इसी तरह से राजा भैया की डील हो जाने के बाद अब प्रतापगढ़, कौशांबी, प्रयागराज, फूलपुर, सुल्तानपुर और अमेठी में बीजेपी के लिए मददगार साबित हो सकते हैं. दिनेश प्रताप सिंह के चलते रायबरेली और उन्नाव सीट पर फायदा मिलने की उम्मीद है.

बीजेपी को बृजभूषण शरण से कितना लाभ

वहीं, बृजभूषण शरण के जरिए गोंडा, बस्ती और देवीपाटन मंडल की सीटों पर बीजेपी को सियासी लाभ मिल सकता है. बृजभूषण सिंह का इन इलाकों की सीटों पर सीधा असर है और ठाकुरों के बीच मजबूत पकड़ है. बीजेपी ने उनका टिकट काटा, लेकिन किसी अन्य को देने के बजाय उनके बेटे को ही प्रत्याशी बनाया. बृजभूषण सिंह का एक बेटा विधायक है और अब दूसरा बेटा लोकसभा चुनाव मैदान में है. बीजेपी ने उनके जरिए अवध के साथ-साथ पूर्वांचल के इलाके में ठाकुरों को जोड़ने का दांव चला है.

बीजेपी ने यूपी से कितने ठाकुर उतारे

बता दें कि यूपी में बीजेपी ने भले ही पश्चिमी यूपी में सिर्फ मुरादाबाद सीट से इस बार 14 ठाकुर प्रत्याशी उतारे हैं, जबकि 2019 में 17 ठाकुर प्रत्याशी दिए थे और 2014 में 21 उम्मीदवार उतारे थे. बीजेपी ने इस बार भले ही कम प्रत्याशी दिए हों, लेकिन उनकी आबादी से ज्यादा प्रत्याशी उतारे हैं. यूपी में 7 फीसदी के करीब ठाकुर मतदाता है, लेकिन वो अपनी आबादी से ज्यादा हमेशा चुनाव जीतते रहे हैं. सूबे की 80 लोकसभा सीट में से 20 सीट पर ठाकुर समाज का मजबूत दखल है. सूबे में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह भी ठाकुर समुदाय से आते हैं.

2017 के यूपी विधानसभा चुनाव में 63 राजपूत विधायक जीतने में सफल रहे थे जबकि 2022 में 49 ठाकुर विधायक बने. सूबे में ठाकुर वोटों की सियासत को देखते हुए बीजेपी ने राजा भैया से लेकर बृजभषण शरण सिंह और अब बैगडोर से धनंजय सिंह से डील हुई है. बीजेपी इस बात को जानती है कि अवध और पूर्वांचल में ठाकुर वोटर निर्णायक है, जिसके चलते हर संभव कोशिश की जा रही है. देखना है कि अब साइलेंट होकर धनंजय सिंह पूर्वांचल में ठाकुर वोटरों को साधने का काम करेंगे तो राजा भैया से लेकर बृजभूषण सिंह क्या सियासी गुल खिलाते हैं.

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