मृदुला मुखर्जी
छत्तीसगढ़ में कांग्रेस का महाधिवेशन आयोजित हो रहा है। लंबे समय बाद कांग्रेस में अध्यक्ष पद के लिए चुनाव संपन्न हुए हैं। इस महाधिवेशन में भविष्य की व्यापक रणनीति तैयार होगी। इसका एकदम स्पष्ट अर्थ है-कांग्रेस ने पार्टी के आंतरिक लोकतंत्र के ढांचे को दुरुस्त करना शुरू कर दिया है। यह उचित समय है कि कांग्रेस के आंतरिक लोकतंत्र की परंपरा और उदात्त मूल्यों का फिर से स्मरण किया जाए। भारत का स्वाधीनता संग्राम हमें कई ऐसे उदाहरण देता है, जिससे हम कांग्रेस की मूल परंपरा को सही अर्थों में समझ सकते हैं।
स्वाधीनता संग्राम के बड़े नेताओं के संबंधों को ही ले लीजिए। सभी बड़े नेता अपनी विचारधारा के आधार पर आपसी मतभेद रखते थे, लेकिन उनके बीच व्यापक हित के लिए एकजुट होकर काम करने की उदारता थी। उन दिग्गज नेताओं के बीच वैचारिक मतभेदों के बावजूद परस्पर सौहार्द की भावना आंतरिक लोकतंत्र की बुनियादी कसौटी रही। मिसाल के तौर पर महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और सरदार पटेल स्वाधीनता आंदोलन के अग्रणी नेता थे। इनके नेतृत्व में कांग्रेस ने अंग्रेजों से आजादी हासिल की। इनमें गांधीजी सबसे बड़े नेता थे। यद्यपि ये तीनों ही नेता पृष्ठभूमि और व्यक्तित्व में बहुत भिन्न थे, परंतु उनमें बहुत कुछ ऐसा था, जो उन्हें जोड़े रखने में सक्षम था। इसी भावना से उन्होंने कांग्रेस के भीतर आंतरिक लोकतंत्र की जड़ों को मजबूत बनाया।
कांग्रेस के भीतर के इस लोकतांत्रिक स्पेस को गांधीजी ने और अधिक व्यापक बनाया। उन्होंने कांग्रेस की छतरी के नीचे हर उस विचार का स्वागत किया, जो उन्हें उपनिवेशवाद के मोर्चे पर मदद करने को तैयार था। इस वजह से कांग्रेस ऐसे संगठन के तौर पर विकसित हुई, जहां दक्षिण से लेकर वामपंथ तक, बहुत व्यापक वैचारिक स्पेक्ट्रम वाले लोग साथ-साथ काम कर सके। वे आपस में खुली बहस कर सकते थे, लड़-झगड़ सकते थे। यहां तक कि एक-दूसरे के खिलाफ मोर्चाबंदी भी कर सकते थे, लेकिन उपनिवेशवाद के विरुद्ध बिगुल बजने पर सारे मतभेद ताक पर रखकर एकजुट भी हो सकते थे।
आज कांग्रेस के भीतर लोकतांत्रिक स्पेस बनाने के गंभीर प्रयास फिर शुरू हुए हैं। गांधी-नेहरू परिवार से इतर अध्यक्ष के चुनाव से कांग्रेस को एक परिवार की पार्टी होने के आरोप से मुक्त करने की भावना दिखती है। इसका श्रेय राहुल गांधी को जाता है, जिन्होंने अपनी मां की तरह त्याग की राजनीति का रास्ता चुना। नई व्यवस्था ने उन्हें रोजमर्रा के कामकाज से काफी हद तक मुक्त किया है। अब वह विचारधारा और लोकप्रिय आंदोलन की ओर अधिक ध्यान दे पाएंगे। मल्लिकार्जुन खरगे के चुनाव से सिद्धांततः ही सही, यह संदेश दिया गया कि पार्टी में लोकतांत्रिक स्पेस को बढ़ावा दिया जा रहा है। कांग्रेस को अपने मतभेदों को भुलाकर एक साथ बढ़ने की भावना से काम करना सीखना होगा।
राहुल गांधी की यह चिंता उचित है कि पार्टी का पुराना ढांचा अब अपेक्षित चुनाव परिणाम देने में सक्षम नहीं। वह यह भी मानते हैं कि अब वैचारिक संघर्ष को वरीयता दी जानी चाहिए। यह सब कांग्रेस के भविष्य के लिए शुभ संकेत हैं। पार्टी के भीतर चुनावों से संभव है कि तमाम दृष्टिकोण और रणनीतिगत मतभेदों के लोग चुनकर आएंगे। इससे तमाम गुटों को अपना मत रखने के लिए मंच मिलने के साथ ही उनके भीतर लोकतांत्रिक भावना से काम करने की क्षमता विकसित होगी। आंतरिक लोकतंत्र के अभाव में पार्टी के तमाम गुट आपस में गुपचुप साजिश करने और एक-दूसरे की टांग खींचने को मजबूर होते हैं।
कांग्रेस ने पिछले काफी समय से हर स्तर पर चुनाव कराने की प्रतिबद्धता जाहिर की है। अच्छा हो कि इस महाधिवेशन में इस संबंध में कुछ महत्वपूर्ण निर्णय लिए जाएं। न सिर्फ कांग्रेस वर्किंग कमेटी, बल्कि अन्य स्तरों पर चुनाव से पीछे हटना पार्टी के लिए हितकर नहीं होगा। जब लोग चुनकर आते हैं तो वे यह नहीं कह सकते कि पार्टी के भीतर उन्हें सुना नहीं गया या उनका प्रतिनिधित्व नहीं है। पुराने नेताओं में चुनावों को प्रभावित करने की क्षमता अधिक होती है। वे राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक रूप से अधिक वोट पाने के लिए बोगस वोटिंग का सहारा भी ले सकते हैं। इस जोखिम के बावजूद आंतरिक लोकतंत्र का कोई विकल्प नहीं।
आजादी के पहले का कांग्रेस का इतिहास बताता है कि कई बार बेहद विवादित मुद्दों पर नेताओं के बीच मतभेद सुलझाने में चुनावी व्यवस्था बड़ी सहायक रही। तब सभी पक्ष अपनी राय खुलकर व्यक्त करते थे। असहयोग आंदोलन छेड़ा जाए या नहीं, यह निर्णय खुली वोटिंग द्वारा लिया गया था। भारत छोड़ो आंदोलन के विरोध में 13 कम्युनिस्ट नेताओं ने गांधीजी के प्रस्ताव के विरुद्ध वोट दिया था, लेकिन गांधीजी ने उन्हें ही सबसे पहले बधाई दी, क्योंकि वह कांग्रेस को एक लोकतांत्रिक संगठन की तरह विकसित करना चाहते थे।
अगर ऐतिहासिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो भारत में कांग्रेस ही लोकतंत्र की पहरुआ पार्टी रही है। कम्युनिस्ट पार्टियां लोकतांत्रिक केंद्रीयतावाद की वजह से कभी लोकतांत्रिक नहीं रहीं तो दक्षिणपंथी पार्टियों का लोकतंत्र के प्रति नजरिया सबको मालूम है। इस तरह देखें तो भारत में कांग्रेस के ऊपर लोकतंत्र के मूल विचार को जिंदा रखने की जिम्मेदारी तो है ही, उसे आंतरिक लोकतंत्र की पुरानी पद्धति पर लौटकर उसके प्रति अपनी प्रतिबद्धता को दोहराने की भी जरूरत है। अब उपनिवेशवाद की तरह सांप्रदायिक ताकतें विकराल रूप धारण कर चुकी हैं। उनका मुकाबला करने के लिए कांग्रेस को अपने घर को सबसे पहले दुरुस्त करना होगा।
(लेखिका प्रख्यात इतिहासकार, नेहरू मेमोरियल लाइब्रेरी एंड म्यूजियम की पूर्व निदेशक एवं जेएनयू की सेवानिवृत्त प्रोफेसर हैं)
