“बेटी” कोख कहती मेरी मैंने तो संतान जने हैं बेटा बेटी कहकर तुमने ये कैसे ताने बुने हैं

बेटी

कोख कहती मेरी मैंने तो संतान जने हैं
बेटा बेटी कहकर तुमने ये कैसे ताने बुने हैं

सींचा है रक्त से दोनों को ही मैंने
नौ मास रात दिन मैंने जिसमे सपने बुने हैं

इक को धरती स्वरुप दिया इक को अम्बर
नही अकेले संसार दोनों के साथ ही चले हैं

फिर क्यूँ बेटी धूमिल बेटे को शान कहे हैं
क्यूँ सबने मिलकर माँ के कोख का अपमान किये हैं
फिर क्यूँ बेटे की ख़ुशी पर बेटी का बलिदान किये हैं ?

**स्वेता मिश्रा**

-नाइजीरिया-

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