डॉ मनोज तत्वादी
विज्ञान विषयक लेखक
भारतीय पारिस्थिती एवं पर्यावरण संस्थान के भूतपूर्व विद्यार्थी
ऐतिहासिक बहुमत जीत कर, लोकतंत्र के मंदिर की सीढी को मत्था टेक कर, सातो दिन बिना रुके दौडने वाले विकास-रथ पर सवार हो कर देश के १८वे प्रधानमंत्री जी ने पहले छह महिने में एक ऐसे मुद्दे में हाथ डाला जिसे उनके पूर्व हुए १७ प्रधानमन्त्रियो ने कभी सोचा नही था. सन २०१४ में बापू की जयंती पर संपूर्ण विश्व ने पहली बार किसी प्रधानमंत्री स्तर के व्यक्ती को झाडू हाथ में लिए सफाई करते हुए देखा. प्रसंग था, मोदीजी द्वारा स्वच्छ भारत अभियान की अविश्वसनीय तरीके से शुरुवात ! “स्वच्छता को एक राजनीतिक औजार के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि इसे सिर्फ देशभक्ति और स्वास्थ्य के प्रति प्रतिबद्धता से जोड़ कर देखा जाना चाहिए।“और साथ में यह भी कहा की“विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, भारत में सफाई और स्वच्छता की कमी के कारण औसतन प्रति व्यक्ति ६५०० रूपये बर्बाद होते हैं। स्वच्छ भारत सार्वजानिक स्वास्थ्य और गरीबों की आय की सुरक्षा पर सार्थक प्रभाव डालेगा , और अन्ततोगत्वा राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में योगदान देगा।“ उनकी आत्म-विश्वास से ओत-प्रोत मोदी वाणी ने भारत में अस्वच्छता के विरुद्ध मानो युद्ध की घोषणा ही कर दी. जन-जत्थे घर-गली-मोहल्ला-दफ्तरआदी साफसफाई अभियान में जुटे रहे. टीवी और अखबार भी कुडा-कचरा उठाते जन व जन नेताओ के फोटो छापकर और कवरेज देकर धन्य हो गई.
भारत को सर्वतोपरी स्वच्छ करने सार्वजनिक स्वास्थ्य की इस राष्ट्र-व्यापी कवायद में अन्य बातो के साथ एक दूरदर्शी बदलाव केंद्रीय वन, पर्यावरण व जलवायू परिवर्तन मंत्रालय ने पारित किये. यह सन १९९८ से लागू बायो-मेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट रूल में आवश्यक बदलाव थे, जिन्हे बायो-मेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट रूल-२०१६ कहा गया. विश्व भर से जब इस संवेदनशील विषय पर आग्रह के स्वर उठे थे तब सन १९९९ में पहली बार विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा “द ब्लू बुक “ शीर्षक से एक पत्रिका छापी गई. विषय तब भी थमा नही तब सन २०१४ में इसी पुस्तिका का पुनर्मुद्रण किया गया. नूतन प्रत में बायोमेडिकल कचरे की पहचान एवं उसका सुरक्षित प्रबंधन, वायु-प्रदूषण का आंकलन, जलवायू परिवर्तन जैसे कुछ महत्त्वपूर्ण मुद्दे जोडे गये थे. इसी शृंखला में सन २०१६ में भारत सरकार ने गंभीर संज्ञान लेते हुए कानून पारित किया. कचरे से संबंधित इस बेहद महत्त्वपूर्ण विषय पर एक ओर तो पर्याप्त गंभीरता थे तो दूसरी ओर नितांत अनभिज्ञता !
क्या है यह?
जैव चिकीत्सीय अपशिष्ट अर्थात बायोमेडिकल वेस्ट जिसे हम अस्पताल से निकलने वाले कचरे के रूप में जानते हैं। यह एक प्रकार का अपशिष्ट होता है जिसमें संभावित रूप से रोग-संक्रामक सामग्री होती है। बायोमेडिकल अपशिष्ट प्रतिदिन इलाज के लिए आनेवाले रोगियों का निदान, उपचार और कुछ मेडिकल रिसर्च के दौरान उत्पन होता है। साथ ही जैव-अणुओं या प्राणीयो अथवा अन्य जीवों से युक्त अनुसंधान प्रयोगशाला अपशिष्ट जो मुख्य रूप से पर्यावरण से प्रतिबंधित है।
बायोमेडिकल वेस्ट के प्रमुख स्रोत-• सरकारी अस्पताल/निजी अस्पताल/नर्सिंग होम/औषधालय। • प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र। • मेडिकल कॉलेज और अनुसंधान केंद्र/पैरामेडिकल सेवाएं। • पशु चिकित्सा कॉलेज और पशु अनुसंधान केंद्र। • ब्लड बैंक/ शवगृह/ऑटोप्सी सेंटर। • जैव प्रौद्योगिकी संस्थान। • उत्पादन इकाइयां।
बायोमेडिकल वेस्ट के लघु स्रोत-• चिकित्सकों/दंत चिकित्सकों के क्लीनिक • पशु घर/वधशालाएं। • रक्तदान शिविर। • टीकाकरण केंद्र। • एक्यूपंक्चरिस्ट/मनोरोग क्लीनिक/कॉस्मेटिक पियर्सिंग। • अंतिम संस्कार सेवाएं। • विकलांग व्यक्तियों के लिए संस्थान
जैव-चिकित्सीय अपशिष्ट का वर्गीकरण और श्रेणियाँ लगभग ७५ प्रतिशत से ९०प्रतिशत चिकित्सीय अपशिष्ट उतना ही हानिरहित होता है जितना कोई भी अन्य म्यूनिसिपल अपशिष्ट । बाकी का १०प्रतिशत से २५प्रतिशत अपशिष्ट अन्य प्रकार के कचरों से भिन्न होता है, जो कि मनुष्य और पशुओं के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है और पर्यावरण को भी नुकसान पहुँचाता है । किंतु यदि इन दोनों प्रकार के कचरों को एक साथ मिला दिया जाये तो पूरा का पूरा अपशिष्ट हानिकारक बन जाता है । जैव-चिकित्सीय अपशिष्ट को निम्नलिखित श्रेणियों में वर्गीकृत किया जाता है:1. संक्रामक 2. हानिकारक 3. कोशिका-विषी 4. रासायनिक
संक्रामक-संक्रामक अपशिष्ट में रोगाणु (पैथोजेन्स), जीवाणु, विषाणु, परजीवी या काई की सघनता और मात्रा इतनी हो सकती है कि जल्द बीमारी पकड़ लेने वाले लोगों में रोग पनप सकते हैं ।संक्रामक रोग से पीड़ित किसी रोगी के संपर्क में जो अपशिष्ट रहता है उसमें सूक्ष्म रोगाणु होते हैं जो उस रोग को किसी अन्य व्यक्ति तक पहुंचा देते हैं
हानिकारक-यह खतरा तेज धार वाले जैव-चिकित्सीय अपशिष्ट से हो सकता है जिसके कारण घाव हो सकता है जिसमें सुइयां, अधस्त्वक (हाइपोडर्मिक) सुइयाँ, छुरी और अन्य ब्लेड, चाकू, इन्फ्युजन सैट, आरियाँ, टूटे कांच की शीशियों, एकल और नाखून । ये वस्तुएँ संक्रमित हों अथवा न हों परन्तु इन्हें प्रायः स्वास्थ्य परिचर्या अपशिष्ट में सबसे खतरनाक माना जाता है । इनसे घाव हो जाते हैं, जिसके फलस्वरूप जटिलताएँ पैदा हो जाती हैं ।
कोशिका-विषी एजेंट-
कुछ औषधियाँ अथवा अन्य पदार्थ कोशिका (शरीर की ढांचागत और कार्यात्मक इकाई) को जख्मी कर सकते हैं । कोशिका-विषी अपशिष्ट में आषधि तैयार करने और संचालन के दौरान संदूषित वस्तुएँ शामिल होती हैं जो इस प्रकार हैं- सिरिंज, सुइयों की मापक शीशियाँ और पैकेजिंग, ऐसी ओषाधियां जिनके उपयोग की तिथि समाप्त हो गई है, वार्डों से लौटा हुआ फालतू (बचा हुआ) घोल और दवाइयाँ ।इसमें रोगियों का मल-मूत्र और उल्टी भी शामिल होती है. जिसमें उपयोग की गई कोशिका-विषी औशधियों अथवा उनके चयापचय का अधिक खतरा हो सकता है और जिसे औषध लेने के बाद कम से कम 48 घंटे और कभी-कभी एक सप्ताह के लिए जीनोविषी (जीनोटोक्सिक) माना जाना चाहिए । इनमें से ध्यान देने योग्य ये हैं:(i) केंसर-रोधी औषधियाँ, (ii) तेज तेजाब तथा क्षार, (iii) तेज फिनायल, (iv) रेडियो-धर्मी सामग्री ।
रसायन-खतरे वाले रसायन प्रायः प्रयोगशाला के अपशिष्ट अथवा अन्य पदार्थों से उत्पन्न होते हैं । इसमें ये शामिल हैं:(i) रसायन चिकित्सीय अपशिष्ट, (ii) फोटोग्राफी के रसायन, (iii) फार्मल्डीहाइड और अन्य रोगाणुनाशक, (iv) भारी धातुएं (जैसे पारा), (v) बेहोशी की फालतू गैसें, (vi) अन्य जीव-विष और जंग वाले पदार्थ, (vii) विकिरणधर्मी रसायन, (viii) रंगाई की सामग्री, (ix) कीटनाशक (जैसे डी डी टी) बायोमेडिकल वेस्ट से जुड़ी समस्याएंकई अस्पतालों में वर्तमान जैव-चिकित्सा अपशिष्ट प्रबंधन से जुड़ा एक प्रमुख मुद्दा यह है कि जैव-अपशिष्ट विनियमन का कार्यान्वयन असंतोषजनक है क्योंकि कुछ अस्पताल अव्यवस्थित, अनुचित और अंधाधुंध तरीके से कचरे का निपटान कर रहे हैं। पृथक्करण प्रथाओं की कमी, अस्पताल के कचरे को सामान्य कचरे के साथ मिलाने के परिणामस्वरूप पूरे अपशिष्ट प्रवाह को खतरनाक बना देती है।
अनुचित पृथक्करण का परिणाम अंततः अपशिष्ट निपटान की गलत विधि के रूप में सामने आता है। अपर्याप्त जैव-चिकित्सा अपशिष्ट प्रबंधन इस प्रकार पर्यावरण प्रदूषण, अप्रिय गंध, कीड़ों, कृन्तकों और कृमियों जैसे वैक्टरों के विकास और गुणन का कारण बनेगा और सीरिंज और सुइयों से दूषित चोटों के माध्यम से टाइफाइड, हैजा, हेपेटाइटिस और एड्स जैसे रोगों के संचरण का कारण बन सकता है।उन सब संचारी रोगो को रोकना महत्वपूर्ण है, जो पानी, पसीने, खून, शरीर के तरल पदार्थ और दूषित अंगों के माध्यम से शरीर को संक्रमित करते है.। अस्पतालों में और उसके आसपास बिखरा बायो मेडिकल वेस्ट मक्खियों, कीड़ों, चूहों, बिल्लियों और कुत्तों को आमंत्रित करता है जो प्लेग और रेबीज जैसी संचार बीमारी के प्रसार के लिए जिम्मेदार हैं। अस्पताल में कचरा बीनने वालों को टेटनस और एचआईवी संक्रमण होने का खतरा रहता है। डिस्पोजेबल सीरिंज, सुई, आईवी सेट और कांच की बोतलों जैसी अन्य वस्तुओं का उचित विसंक्रमण के बिना पुनर्चक्रण हेपेटाइटिस, एचआईवी और अन्य वायरल रोगों के लिए जिम्मेदार हैं। सबसे सुरक्षित और पर्यावरण के अनुकूल तरीके से अस्पताल के कचरे का प्रबंधन करना स्वास्थ्य प्रशासकों की प्राथमिक जिम्मेदारी बन जाती है। अस्पतालों और अन्य स्वास्थ्य देखभाल प्रतिष्ठानों में जैव-चिकित्सा अपशिष्ट निपटान की समस्या बढ़ती हुई चिंता का विषय बन गई है। अस्पताल प्रशासन को कचरे के वैज्ञानिक, सुरक्षित और लागत प्रभावी प्रबंधन के नए तरीकों की तलाश करने और अपने कर्मियों को इस क्षेत्र में हुई प्रगति के बारे में सूचित करने के लिए प्रेरित करना, उचित अस्पताल अपशिष्ट प्रबंधन प्रणाली की आवश्यकता एक प्रमुखता है और अस्पतालों में गुणवत्ता आश्वासन का एक अनिवार्य घटक है।
स्वास्थ्य के देखभाल में हॉस्पिटल से निकलने बाले कचरे के अनुचित प्रबंधन से पर्यावरण पर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से प्रभाव पड़ता है। चिकित्सा अपशिष्ट के अपर्याप्त जलने से जहरीले गैस का उत्सर्जन पर्यावरण के लिए हानिकारक होता है।
हमारे जल स्रोतो पर बायोमेडिकल कचरे का सबसे गंभीर प्रभाव पड़ता है। उदाहरण के तौर पर, समुद्री जीवों द्वारा इस जहरीले कचरे का सेवन उनके लिए जानलेवा हो सकता है। विषाक्त पदार्थ खाद्य श्रृंखला(फूड-चेन) में प्रवेश करेंगे और अंततः उन मनुष्यों तक पहुंचेंगे जो समुद्री जीवों का सेवन करते हैं। चिकित्सा क्षेत्र में प्लास्टिक का अधिक मात्रा में उपयोग भी पर्यावरण के लिए खतराहै।
भस्मीकरण प्रक्रिया या कूड़ा जलाने के बाद, विषाक्त राख अवशेष उत्पन्न होता है और अक्सर इसे लैंडफिल(जमीन के गड्ढे भरकर उसे समतल बनाने हेतू ) में डाला जाता है। परंतु यही राख भूमिगत जल और हवा के माध्यम से मानव उपयोग के संपर्क में आता है। भस्मकों के कारण होने वाला वायु प्रदूषण ओजोन परत को नष्ट कर देता है, फसल और जंगल को नुकसान पहुंचाता है और जलवायु परिवर्तन को बढ़ाता है।
भारत सरकार द्वारा निर्गमित 2016 का कानून : कूछ प्रमुख मुद्दे २०१६का यह कानून १९९८के कानून का संशोधन है। ये नए नियम स्वच्छ भारत अभियान को ध्यान में रखकर बनाये गए हैं।इस कानून में रक्तदान शिविर, टीकाकरण शिविर, सर्जिकल शिविर और अन्य सभी प्रकार के स्वास्थ्य शिविर को शामिल किया गया है। इस नियम के कुछ महत्वपूर्ण तथ्य हैं:-
- जिन बायो-मेडिकल चीजों से भरे बैग का निपटारा होना है, उनके लिए बार कोड प्रणाली लागु किया जाये।
- सभी स्वास्थ्यकर्मियों को नियमित रूप से प्रशिक्षण दिया जाये और उनका समय-समय पर टीकाकरणहो।
- क्लोरीन सहित प्लास्टिक बैग, दस्ताने, ब्लड बैग आदि हर दो साल में बदले जाएँ।
- डायोक्सिन आदि के उत्सर्जन की एक सीमा तय की जाये।
- प्रयोगशाला, सूक्ष्मजीवी सम्बन्धी वस्तु, खून के नमूने, खून के बैग आदि को विसंक्रमित (sterilization) करके सयंत्रित करना।
- हर क्षेत्र में एक प्रमुख बायो-मेडिकल वेस्ट निपटान केंद्र बनाने के लिए राज्य सरकार द्वारा व्यवस्था करनी चाहिए।
- इस काम के लिए क़ानूनी प्रक्रियाओं को आसान बनाना चाहिए।
- बायो-मेडिकल वेस्ट को चार श्रेणियों में बांटा जाये ताकि इनको आसानी से निपटाया जा सके।
- बायो-मेडिकल चीजों का नियमित रूप से उपचार हो और इसकी रिपोर्ट सरकार को दी जाए।
- जहां बायो-मेडिकल वेस्ट उपचार केंद्र है, उसके कई किमी के अंदर कोई आवासीय काम्प्लेक्स नहीं होना चाहिए।
वर्तमान: दहलाने वाले आंकडे
भारत में कुल ३,५२,०१४ पंजीकृत स्वास्थ्य केंद्र है. इनमे १,१३,१८६ केंद्रो रोगियो के लिए बेड्स (बिस्तर) की सुविधा सहित और बचे हुए २,३७,९३८ केंद्र बेड्स की सुविधा से वंचित है. एक अध्ययन के अनुसार रोगी के १ बेड के कारण प्रतिदिन १ से २ किलोग्राम कचरा एवं एक क्लिनिक से प्रतिदिन करीब ६०० ग्राम कचरा तयार होता है. देश में सिर्फ २१,८७० ऐसे स्वास्थ्य केंद्र है जिनके पास स्वयं की बायो-मेडिकल वेस्ट के योग्य निपटारे की व्यवस्था है. बाकी सब केंद्र इस वेस्ट के निपटारे हेतूसार्वजनिक बायो मेडिकल वेस्ट ट्रीटमेंट फेसीलिटी पर निर्भर करते है. इस पुरी व्यवस्था के चलते देश में औसतन ६६ टन बायो मेडिकल वेस्ट प्रतिदिन ऐसा बचता है जिसका योग्य निपटारा नही हो पाता. यही आंकडा साल भर में बाध कर २४,००० टन कचरे में परिवर्तीत हो जाता है. यह आंकडा और बाध जाता है क्योंकी हमारे देश में ४८,१५४ स्वास्थ्य केंद्र ऐसे भी है जो पंजीकृत नही अत: उन केंद्रो से उत्पन्न होने वाले कचरे की सरकार के पास कोई जानकारी नही. किंतु वे अनुपचारीत(untreated) कचरे एवं उससे उत्पन्न खतरे को तो बढते ही है!
बहुत कठीन है डगर पनघट की…
जैव-चिकित्सीय अपशिष्ट, उसके विभिन्न स्रोत, प्रकार, दुष्परिणाम व साथ ही केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण मंडल द्वारा वर्ष २०१६ में निर्गमित मार्ग दर्शल तत्वो में उल्लेखित नियम-निर्देशो इत्यादी को जानने के बाद एक ही प्रश्न उठता है की जब वैश्विक स्तर पर हर एक देश इस गंभीर समस्या से जूझने हेतू पुरी राजनैतिक शक्ती लगा रहा है, अत्याधुनिक तरीके से एवं सख्ती से निपटने की तयारी भी दिखा रहे है तो हम भलाअब और किस मंगल-मुहूर्त की प्रतीक्षा में बैठे है?
केंद्र सरकार कहती है, की हमने इस विषय पर एक मजबूत नियम बना दिया है, कार्यान्वयन की जवाबदारी तो राज्य सरकार की है. राज्य सरकार का प्रदूषण नियंत्रण मंडल तुरंत एक महत्त्वपूर्ण दर्जे की विस्तृत सूचना सभी संबंधितो को भेज कर कर्तव्य पूर्ती की समाधी में मग्न हो जाता है. अब आती है बात उन पर जो इस नामुराद फसाद की जड है अर्थात जैव-चिकित्सीय अपशिष्ट के उद्गम स्थान.सरकारी अस्पतालो के पास तो कारणो की पुरी फौज तयार है की इन सब के लिए फंड नही है. फंड है तो फिर मशीन नही है. वह उपलब्ध हो तो ऑपरेटर की टीम नही है. यह सब हो तो पगार में अपेक्षित वृद्धी नही है.क्योंकी राज्य सरकार के वित्त विभाग के पास फंड नही है. मतलब, ढाक के वही तीन पात !
बडे निजी अस्पताल इस बारे में निश्चिंत है की फिलहाल कचरे को काले पोलीथीन में डालने से अधिक कुछ करने की आवश्यकता नही है. जैसे बडे वैसे ही छोटे अस्पताल! उधर वैज्ञानिक एवं सुरक्षित तरीके से जैव-चिकित्सीय अपशिष्टको अस्पतालो से संकलित करने वाले सेवा-प्रदाताओ की कथा भी कुछ जुदा नही है. विशिष्ट सेवा प्रदाता होने के कारण अतिरिक्त शुल्क मिलता है. अस्पताल जैसा देते है वैसा ही ये ट्रान्सपोर्ट एजेंसीयां स्वीकार करते है और अंततः भिन्न-भिन्न नामो से जमा किया हुआ कचरा सब. सुखा कचरा, गिला कचरा, हरा कचरा, लाल कचरा, जैव-चिकित्सीय कचरा यह सब अपनी-अपनी विभिन्नता को त्याग समरस होकर एकरूप हो जाता है. हरेक शहर के बाहर संमिश्र कचरे के पहाड ही कहलाते है-डम्पिंग यार्ड! हमारे तेज-तर्रार टीवी/अखबार इस बारे में यदा-कदा खबर छाप कर, जागरूक नागरिक उसे देख/पढ कर अफसोस जता कर सरकार- सिस्टम को कोस कर एवं संबंधित विभाग के अधिकारी दिखावे हेतू गिनी-चुनी-सधी कारवाई कर अपने-अपने कर्तव्य की इतिश्री मान लेते है.
भरोसेमंद भविष्य
मगर दिलासे की खबर यह है कि इस पूरी कडी में सब कुछ गलत ही है ऐसा नही है.मध्य प्रदेश के शहर इंदौर को ही लीजिये. सन २०१६ में इंदौर नगर निगम के आयुक्त मनीष सिंह ने शहर को सर्व स्तरो पर स्वच्छ बनाने का संकल्प लिया. जनता ने भरपूर साथ दिया. जनता चुस्त ! प्रशासन दुरुस्त!! परिणाम यह की तब से लगातार छह वर्ष से स्वच्छ सर्वेक्षण अवार्ड अंतर्गत “भारत का सबसे स्वच्छ शहर” इस सम्मानजनक उपलब्धी का यह शहर हकदार है. माननीय मोदी जी ने स्वच्छ भारत के रूप में एक बेहतरीन अभियान दिया है, तो दूसरी ओर राज्य व केंद्र में सर्व स्तरीय समन्वय हेतू मुख्य-सचिवो (वरिष्ठ नौकरशाह) के राष्ट्रीय संमेलन जैसे अभिनव उपक्रम भी शुरू किये है. सन २०११ की जन गणना के अनुसार देश में २४९ म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन है. इन सब जगह पर कुशल एवं अनुभवी निगम आयुक्त(नौकरशाह) है. इनका बस थोडा ध्यान इस मुद्दे पर केंद्रित हो जाये. तात्पर्य यह की जब अपने ही देश की एक इकाई जन सहयोग से अपेक्षित स्तर पर पहुच सकती है तो बाकी क्यो नही?
कुल जमा स्वच्छ भारत अभियान को तेजी से दागदार और बदबूदार बनाने वाले गंभीर किंतु दुर्लक्षित सामजिक स्वास्थ्य से जुडे इस आयाम पर चलते-चलते एक बात यह, की अविलंब एक व्यापक जन-जागृती व माहिती अभियान एवं उसके तुरंत पश्चात संबंधित संस्थानो/ व्यक्तियो पर कठोर दंडात्मक कार्यवाही का न थमने वाला दौर शुरू हो! व्यापक जनहित में चाहे तो प्रधानमंत्री कार्यालय-(पी एम ओ) संज्ञान लेते हुए इसकाफीडबॅक संबंधितो से ले.भारत में इस नामाकूल जैव-चिकित्सीय कचरे के व्यवस्थापन हेतू यही एक कारगर अनुष्ठान है. बायो-मेडिकल वेस्ट उस पौराणिक रक्त-बीज नामक राक्षस की तरह है जिसे सिर्फ सही समय पर, सही तरीके से ही नष्ट किया जाना चाहिये अन्यथा यह बचेगा, बढेगा और मानव सहित जीव-जगत को सिर्फ हानी ही पहुचायेगा.
वर्तमान में प्रकल्प प्रबंधन सलाहकार है.
drmanoj.tatwadi@gmail.com
