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पहला दिन-पहली बात, साल नया-यादें पुरानी…यही है जिंदगानी

Jitendra Kumar by Jitendra Kumar
02/01/24
in मुख्य खबर, राष्ट्रीय
पहला दिन-पहली बात, साल नया-यादें पुरानी…यही है जिंदगानी

प्रथम क्रांति का केंद्र नाना राव पेशवा

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गौरव अवस्थी


अक्सर होता है कि नए के साथ नई यादें ही जुड़ती- बनती हैं। 2024 साल नया है लेकिन यादें पुरानी ताज़ी हुईं। यह न आयोजित था न प्रायोजित! किस्मत अकस्मात देती है। मेहनत समय पर। ऐसा ही साल के पहले दिन कुछ अपन के साथ हुआ। उमर के जिस दौर से जीवन गुज़र रहा है, उसमें नया साल हो, कोई तीज-त्यौहार या राष्ट्रीय उत्सव! उल्लास मन का मारा हो जाता है। ‘आया राम-गया राम’ की तर्ज पर ही सब आते-जाते रहते हैं। युवावस्था में अपनी पूर्वज पीढ़ी में ‘निरुत्साह’ जीवन को देखकर मन में जो सवाल उमड़ते-घुमड़ते थे, उनका जवाब अब समय ही दे रहा है। पिताजी का उस समय का मौन अब मुखर होकर कह रहा है, समझ तो गए ही होगे बच्चू!

प्रथम क्रांति का केंद्र नाना राव पेशवा

खैर, छोड़िए! तो बात हो रही थी, नए साल में पुराने दिनों में लौटने की। इसका पहिया इतनी तेजी से खुद-ब-खुद घूमा कि लौट आया पुराने दिनों का सुखद अहसास। घरों की तली पूड़ी। सुस्वादु सब्जी। तरह-तरह के अचार। प्लेट की जगह पुराना अखबार। हरी घास का बिछौने पर मिल-बांटकर खाने का मजा कुछ और ही होता है। फिर हरी-हरी घास ऐतिहासिक पार्क की हो तो क्या कहने? बचपन और इतिहास सब याद आने ही लगता है।

प्रथम क्रांति का केंद्र नाना राव पेशवा

पद से दूर-परिवार सरीखा टूर…
रोजी-रोटी से दूर जिम्मेदारी से नया-नया ही जुड़ा है मां मनोहरा और मां मोहिनी के नाम का स्कूल। यह जानते हुए भी कि पद से कोई कद नहीं बनता लेकिन पद तो पद ही होता है। चाहें उसका कोई कद हो या न हो। नए साल के पहले दिन स्कूल में छुट्टी का रिवाज था पर यह यादों के बियाबान में बिला गया। यह याद दिलाया प्रिंसिपल और पुत्र ने। ‘छुट्टी’ हो जाती तो आज का यह मजा तो छूट ही जाता। पर जब किस्मत साथ देती है तो छूटता कुछ नहीं, मिलता-ही-मिलता है। साल के पहले दिन जो मिला उसे अब साल भर क्या? जीवन भर भूला नहीं जा सकता।

प्रथम क्रांति का केंद्र नाना राव पेशवा

परिवार केवल वही परिवार नहीं होता जो घर की चहारदिवारी में सीमित हो। परिवार की परिभाषा गढ़ी जाती है। बड़ी बनाई जाती है। जो ‘अपना’ वही परिवार। इस अर्थ में स्कूल से जुड़े लोग भी अपना परिवार ही हैं। ट्रिप पर निकलने के पहले ही ‘पद’ कई पग दूर कर दिया गया। केवल हमने ही नहीं, सबने। बचा सिर्फ परिवार। इसी परिवार के कुछ सदस्यों के साथ साल के पहले दिन ऐतिहासिक और पौराणिक पहचान वाले परियर (परि-हरि यानि जहां भगवान राम ने माता सीता का परित्याग किया) और बिठूर (ब्रह्मावर्त, जहां ब्रह्मा जी के चरण पड़े) के लिए निकल पड़े।

प्रथम क्रांति का केंद्र नाना राव पेशवा

निकलना-घूमना तो अक्सर होता है पर आज का निकलना कई मायने में खास इसलिए रहा कि थोड़े समय के लिए ही सही पुराने दिन लौट से आए। एक गाना है-‘कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन..। वाकई में बीते दिन जैसे लौट ही आए। इस नए परिवार का कोई सदस्य केवल सब्जी बनाकर लाया और कोई सब्जी-पूड़ी-अचार, कोई खीर-रबड़ी। मात्रा इत्ती कि खाए न खाई जाए। ऐसे मौकों पर जैसे छात्र जीवन में या बचपन में घर की बनाई हुई पूड़ी-सब्जी एक साथ गोलाई में बैठकर खाई-खिलाई जाती थीं, वैसे ही अनुभव से आज फिर अपने इस नए परिवार के बीच गुजरना हुआ। पार्क में बैठकर सबने अपने-अपने टिफिन खोले। दूसरे का खाना खुद खाया। खुद का खाना दूसरे को खिलाया। फिर जिसको जो अच्छा लगा उसने बिना संकोच वही उठा लिया। दाल और आलू वाली कचौड़ी। पूड़ी। पनीर की रसेदार सब्जी। आलू-मटर की सूखी। हरी धनिया वाला नमक। मिर्च का मसाला। आम की कली। लिखने में ही लार टपकी जा रही है। खाने की बात तो दूर।

हद है यार! किले में किटी पार्टी…
सब जानते हैं, 1857 में स्वाधीनता की प्रथम क्रांति का केंद्र नाना राव पेशवा का बिठूर में बना किला ही था। वैसे तो विद्रोह की सजा के स्वरूप ब्रिटिश हुकूमत ने नाना राव के इस किले को तोपों से ध्वस्त कर दिया पर 1947 में आजादी के बाद सरकारों ने बचे-खुचे किले को सहेज कर क्रांतिवीरों की यादों को करीने से सहेजा है। घूमने फिरने, मन बहलाने और पुरानी यादों से जोड़ने के लिए किले वाली भूमि पर बनाए गए पार्क में नाना राव की आदमकद और उनके प्रमुख सेनापति तात्या टोपे की आवक्ष प्रतिमा प्रेरणादाई है।

एक हिस्से में स्वाधीनता संग्राम की याद दिलाने वाले संग्रहालय की स्थापना बिलाशक बेहतरीन। संग्रह भी अच्छा। प्रथम स्वाधीनता संग्राम से लेकर झंडा गीत के रचयिता श्याम लाल पार्षद तक की यादें। ‘प्रताप’ से लेकर ‘मतवाला’ मासिक पत्रिका के पृष्ठों का पृष्ठपेषण। ‘इंकलाब जिंदाबाद’ का नारा देने वाले मौलाना हसरत मोहानी से जुड़ी वीथिका। सब कुछ अच्छा। प्रेरक। खटकने वाली बात कोई थी तो बस यही कि संग्रहालय में तो जूते-चप्पल उतार कर जाने का नियम और स्वाधीनता की अलख जगाने वाले नाना राव पेशवा के प्रतिमा स्थल पर जूते-चप्पल पहनकर जाने में कोई रोक-टोक नहीं। वाह री! व्यवस्था। वाह रे! नियम। अरे, स्वाधीनता संग्राम से जुड़ा हर ‘वीर’ भगवान से कम नहीं। फिर नाना राव पेशवा की गिनती तो प्रथम स्वाधीनता संग्राम के उन गिने-चुने नायकों में है जिन्होंने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ क्रांति का झंडा पहले-पहल उठाया। प्रयागराज के आजाद पार्क में प्रतिमा स्थल पर सब जूते-चप्पल उतार कर ही जाते हैं। वह नियम यहां क्यों नहीं हो सकता? नाना राव पेशवा और झांसी की रानी लक्ष्मीबाई तो चंद्रशेखर आजाद के भी प्रेरक पूर्वज हैं।

एक और बात ने दिल कुछ ज्यादा ही दुखाया। ऐतिहासिक किले की प्राचीर में प्रवेश करते ही बाएं हाथ दीवार पर टंगे एक बोर्ड पर निगाह हर एक की टिकती है। हमारी भी टिकी। बोर्ड का मजमून है -‘ शुभ विवाह, मांगलिक कार्यक्रमों, किटी पार्टी, सेमिनार इत्यादि सभी आयोजनों हेतु मुक्ताकाशी मंच, लाॅन और वातानुकूलित कक्ष उपलब्ध है। (चित्र संलग्न) मुक्ताकाशी मंच के ठीक बगल में वह ऐतिहासिक कुआं स्थित है, जिसमें कूदकर नाना राव पेशवा के घर की महिलाओं और बच्चों ने ब्रिटिश फौजों की गिरफ्त में आने के बजाय मौत को गले लगाने को तरजीह दी थी। ‘रियल’ लड़ाई से जुड़े ऐसे ऐतिहासिक स्थान पर बॉलीवुड के भद्दे हेयर स्टाइल वाले लड़कों की ‘रील’ के लिए इधर-उधर की उछलकूद देखकर दिल और बैठ गया। बलिदान स्थल पर ऐसी फूहड़ता पर तो तत्काल रोक लगा ही देनी चाहिए। जिस स्वाधीनता के लिए नाना राव पेशवा, उनका परिवार मर मिटा, क्या उस स्थान को किटी पार्टी के लिए देना उचित है? बलिदान स्थल पर मंगल गीत का क्या मतलब?

इस किले की देखरेख का जिम्मा संभालने वाले उत्तर प्रदेश पर्यटन विकास निगम के अफसरों को इस मसले पर सोचना जरूर चाहिए। पैसा या सरकारी भाषा में कहें ‘राजस्व’ कमाने के लिए ऐसे ऐतिहासिक स्थल ही बचे हैं क्या? अच्छा तो यह होता कि पर्यटन विकास निगम यहां नाना राव पेशवा, बाजीराव पेशवा, झांसी की रानी लक्ष्मीबाई और तात्या टोपे से जुड़े प्रसंगों पर मुक्ताकाशी मंच और परिसर में लाइट एंड साउंड शो शुरू करके कमाई कर ले। सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे। आने वाले को पैसे के बदले कुछ तो सार्थक ज्ञान मिले।

कुरुक्षेत्र में गीता ज्ञानस्थल पर गजब का लाइट और साउंड शो देखिए जाकर। क्या स्क्रिप्ट, क्या तकनीक और क्या प्रदर्शन। एक कुरुक्षेत्र नहीं, देश भर के तमाम ऐतिहासिक और पौराणिक स्थानों पर लाइट और साउंड शो का प्रचलन अब आम है। गदर की गद्दारी से जुड़े ग्वालियर के किले में साउंड शो हो सकता है तो बिठूर में क्यों नहीं? वफादारी का यह सिला! अफसरों को सोचना चाहिए कि किटी पार्टियों से बलिदान देने वाली ‘पुण्यात्माओं’ कितना कष्ट हो रहा होगा। नया वर्ष तभी सार्थक होगा जब बिठूर के इस ऐतिहासिक किले में बलिदान देने वालों की कद्र बढ़े।

नए साल की बस एक यही इच्छा-प्रार्थना है। चाहें तो आप भी इस आवाज में अपनी आवाज मिलकर नया वर्ष शुभ बना सकते हैं।स्वाधीनता के लिए बलिदान देने वाले सभी महापुरुषों को शत्-शत् नमन के साथ आप सभी को नए वर्ष की शुभकामनाएं..

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