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नरेंद्र मोदी क्या विश्व नेता बन कर उभरे हैं और भारत वैश्विक ताक़त?

Jitendra Kumar by Jitendra Kumar
26/09/22
in मुख्य खबर, राष्ट्रीय
नरेंद्र मोदी क्या विश्व नेता बन कर उभरे हैं और भारत वैश्विक ताक़त?
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जी-7 दुनिया के सात बड़े औद्योगीकृत देशों का समूह है. इस समिट में पीएम मोदी कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो से बात कर रहे थे तभी पीछे से अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन आए और उन्होंने भारतीय प्रधानमंत्री के कंधे पर हाथ रख दिया. पीएम मोदी ने पीछे मुड़कर देखा तो बाइडन दिखे और फिर दोनों नेता गर्मजोशी से मिले.

समाचार एजेंसी रॉयटर्स के इस वीडियो क्लिप को भारतीय न्यूज़ एजेंसी एनएनआई ने सोशल मीडिया पर पोस्ट किया और लिखा कि राष्ट्रपति बाइडन खु़द पीएम मोदी तक हाथ मिलाने आए. यह वीडियो क्लिप कुछ ही घंटों में वायरल हो गया. प्रधानमंत्री मोदी के समर्थकों ने इसे भारत के बढ़ते वैश्विक प्रभाव के तौर पेश किया. मोदी समर्थक एक पत्रकार ने लिखा कि यही चीज़ें वामपंथियों को परेशान करती हैं.

जी-7 पहले जी-8 हुआ करता था, लेकिन 2014 में रूस ने यूक्रेन के क्राइमिया को ख़ुद में मिला लिया तो उसे इस ग्रुप से बाहर कर दिया गया था. अब कहा जा रहा है कि इस ग्रुप में रूस की जगह भारत ले सकता है. जी-7 समिट के ठीक तीन महीने बाद उज़्बेकिस्तान के समरकंद में शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गेनाइज़ेशन यानी एसएसीओ की बैठक हुई.

चीन की अगुआई वाले इस संगठन के भारत, रूस और पाकिस्तान भी सदस्य हैं. 16 सितंबर को एससीओ समिट से अलग पीएम मोदी और रूसी राष्ट्रपति पुतिन की मुलाक़ात हुई. इस मुलाक़ात में पीएम मोदी ने कैमरे के सामने पुतिन से कहा कि यह दौर डेमोक्रेसी, डिप्लोमेसी और डायलॉग का है, न कि युद्ध का. पीएम मोदी ने राष्ट्रपति पुतिन से यह बात यूक्रेन पर हमले के संदर्भ में कही थी.

पीएम मोदी की इस टिप्पणी को पश्चिमी देशों के नेताओं ने हाथों-हाथ लिया. ऐसा तब था जब यूक्रेन पर रूस के हमले को लेकर पश्चिम के देश भारत से ख़ुश नहीं थे. भारत संयुक्त राष्ट्र में यूक्रेन को लेकर रूस के ख़िलाफ़ सभी बड़े प्रस्ताव पर वोटिंग से बाहर रहा था. अमेरिका और यूरोप के बड़े देश चाहते थे कि भारत रूस के ख़िलाफ़ वोट करे.

दूसरी तरफ़ 24 फ़रवरी को पुतिन ने यूक्रेन पर हमले की घोषणा की तब से भारत का रूस से तेल आयात बढ़ता गया. वहीं पश्चिम के देश रूस पर प्रतिबंध कड़े कर रहे थे ताकि उसकी आर्थिक गतिविधियों को रोका जा सके. इसी महीने 13 सितंबर से संयुक्त राष्ट्र की 77वीं महासभा की शुरुआत हुई. यूएन की महासभा को दुनिया के देशों के प्रतिनिधि संबोधित करते हैं.

मैक्रों ने पीएम मोदी की प्रशंसा की
77वीं महासभा में भी यूक्रेन और रूस का मुद्दा छाया रहा. फ़्रांस के राष्ट्ऱपति इमैनुएल मैक्रों ने 20 सितंबर को यूएन की आम सभा को संबोधित करते हुए कहा कि भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रूसी राष्ट्रपति के सामने बिल्कुल सही कहा था कि यह दौर युद्ध का नहीं है. मैक्रों ने पीएम मोदी का नाम लेते हुए कहा था, ”नरेंद्र मोदी ने रूसी राष्ट्रपति के सामने बिल्कुल सही बात कही थी. यह वक़्त पश्चिम के ख़िलाफ़ प्रतिशोध और उसका विरोध करने का नहीं है. यह समय है कि हम सभी मिलकर वैश्विक चुनौतियों का सामना करें.”

फ़्रांस संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य है और यूएन की आम सभा में राष्ट्रपति मैक्रों की ओर से पीएम मोदी की तारीफ़ में नाम लेना एक अहम घटना थी. मोदी सरकार के मंत्री अनुराग ठाकुर और किरेन रिजिजू ने मैक्रों के इस वीडियो क्लिप को ट्वीट किया. ये मंत्री बताना चाह रहे थे कि भारत अब वैश्विक स्तर पर अपनी जगह बना रहा है.

यूएनजीए में भारत का नाम कई देशों ने लिया. ब्रितानी पीएम लिज़ ट्रस ने भी यूएनजीए में भारत का नाम लिया और कहा कि ब्रिटेन भारत से अपने संबंध को मज़बूत कर रहा है. फ़्रांस और ब्रिटेन के राष्ट्रध्यक्षों के अलावा जर्मन चांसलर, पुर्तगाल के पीएम, यूक्रेन के राष्ट्रपति, गुयाना के राष्ट्रपति, तुर्की के राष्ट्रपति के साथ मेक्सिको और वेनेज़ुएला के प्रतिनिधियों ने भी यूएनजीए में भारत का नाम लिया.

मेक्सिको के विदेश मंत्री लुइस इब्रार्ड कैसाउबोन ने तो रूस और यूक्रेन के बीच शांति वार्ता के लिए एक समिति बनाने का प्रस्ताव रखा जिसमें पीएम मोदी, पोप फ्रांसिस और संयुक्त राष्ट्र प्रमुख एंटोनियो गुटेरेश को रखने की सलाह दी. मेक्सिको के इस प्रस्ताव का वेनेज़ुएला ने भी समर्थन किया. दूसरी तरफ़ रूस ने यूएनजीए में भारत के लिए अहम घोषणा भी की. रूसी विदेश मंत्री सेर्गेई लावरोफ़ ने कहा कि वह संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत और ब्राज़ील की स्थायी सदस्यता का समर्थन करते हैं.

21 सितंबर को अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने भी यूएनजीए को संबोधित करते हुए कहा था कि वह संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार का समर्थन करते हैं. राष्ट्रपति बाइडन ने कहा था कि अमेरिका संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्य और अस्थायी सदस्यों की संख्या बढ़ाने के पक्ष में है. सुरक्षा परिषद में अमेरिका भी भारत की स्थायी सदस्यता का समर्थन करता है.

रूस और अमेरिका प्रतिद्वंद्वी, पर दोनों भारत के साथ

एस जयशंकर विदेश मंत्री बनने के बाद पहली बार इसी महीने 10 सितंबर को सऊदी अरब गए थे. इस दौरे में उन्होंने सऊदी गज़ट को दिए इंटरव्यू में कहा था, ”भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है. दुनिया की पाँचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है. तकनीक का हब है. इसके अलावा पारंपरिक रूप से वैश्विक मामलों में भारत सक्रिय रहा है. ये सारी चीज़ें भारत को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्य के लिए योग्य बनाती हैं.”

जयशंकर के ऐसा कहने के एक हफ़्ते बाद ही अमेरिकी राष्ट्रपति का यूएन सुरक्षा परिषद में सुधार का समर्थन करना और रूस का यह कहना कि वह सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता का समर्थन करना है, मायने रखता है. कहा जा रहा है कि पश्चिम के देश अभी जलवायु परिवर्तन और चीन से काउंटर करने के लिए सप्लाई चेन को बदलना चाहते हैं. ऐसे में भारत एक अहम देश बन चुका है.

24 सितंबर को अमेरिकी अख़बार न्यूयॉर्क टाइम्स में एक लेख छपा कि भारत का प्रभाव वैश्विक मंच पर बढ़ रहा है, लेकिन देश के भीतर लोकतंत्र कमज़ोर हो रहा है. यह लेख न्यूयॉर्क टाइम्स के साउथ एशिया के ब्यूरो चीफ़ मुजिब मशाल ने लिखा है.

भारत के प्रभाव बढ़ने की वजह बताते हुए मुजिब मशाल ने लिखा है, ”मोदी भारत की मज़बूती का फ़ायदा उठाने पर ध्यान फ़ोकस कर रहे हैं. कोविड-19 महामारी, यूक्रेन पर रूसी हमला और चीन के विस्तारवाद के कारण वर्ल्ड ऑर्डर बाधित हुआ है. मोदी इसे मौक़े के तौर पर ले रहे हैं और भारत को अपनी शर्तों पर स्थापित करने में लगे हैं.

ब्रिटेन को पीछे छोड़ भारत दुनिया की पाँचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है. कई देशों से भारत ट्रेड डील कर रहा है. भारत के पास बड़ी युवा आबादी है. इसके साथ ही भारत टेक्नॉलजी इन्फ़्रास्ट्रक्चर बढ़ा रहा है. भारत को चीन के काउंटर के तौर पर भी देखा जा रहा है.”

मौक़े का फ़ायदा उठा रहा भारत?
मुजिब मशाल ने लिखा है, ”रूस और अमेरिका दोनों के साथ भारत सैन्य अभ्यास कर रहा है. इसके अलावा अमेरिका और यूरोप के दबाव के बावजूद भारत रूस से तेल ख़रीद रहा है. भारत में लोकतांत्रिक मूल्यों को लेकर कई तरह के गंभीर सवाल उठ रहे हैं, लेकिन पश्चिम के देश इसे चुनौती नहीं दे रहे हैं. विश्लेषकों और राजयनिकों का मानना है कि ट्रेड और जियोपॉलिटिक्स पर जब भी ध्यान केंद्रित किया जाता है तो मानवाधिकारों को किनारे कर दिया जाता है. नई दिल्ली के एक यूरोपियन डिप्लोमैट ने कहा कि ईयू भारत से ‘ये ट्रेड डील, वो ट्रेड डील और केवल डील’ चाहता है.”

भारत के उभार और मोदी सरकार की उपलब्धि में भारत का दुनिया की पाँचवी बड़ी अर्थव्यवस्था बनना प्रमुखता से बताया जा रहा है. लेकिन इसके साथ ही कई विरोधाभास भी जुड़े हैं. संयुक्त राष्ट्र डिवेलपमेंट प्रोग्राम ने मानव विकास सूचकांक यानी एचडीआर रिपोर्ट 2021-22 जारी की है. एचडीआर की वैश्विक रैंकिंग में भारत 2020 में 130वें पायदान पर था और 2021 में 132वें पर आ गया है.

मानव विकास सूचकांक का आकलन जीने की औसत उम्र, पढ़ाई, और प्रति व्यक्ति आय के आधार पर होता है. कोविड-19 महामारी में भारत का इसमें नीचे जाना कोई हैरान करने वाली बात नहीं है, लेकिन वैश्विक स्तर पर एचडीआर में जितनी गिरावट दर्ज की गई, उससे ज़्यादा भारत में गिरावट आई है.

2021 में भारत के एचडीआर में 1.4% की गिरावट आई जबकि वैश्विक स्तर पर यह 0.4% थी. 2015 से 2021 के बीच भारत एचडीआर रैंकिंग में लगातार नीचे गया जबकि इसी अवधि में चीन, श्रीलंका, बांग्लादेश, यूएई, भूटान और मालदीव ऊपर जा रहे थे. भारत, जापान, अमेरिका और इंडोनेशिया में ऑस्ट्रेलिया के राजदूत रहे जॉन मैकार्थी ने 21 सितंबर को फ़ाइनैंशियल रिव्यू में लिखे एक आलेख में कहा है कि मोदी के नेतृत्व में भारत एक वैश्विक शक्ति के रूप में उभर रहा है.

जॉन मैकार्थी ने लिखा है, ”जब मोदी ने पुतिन से कहा कि अभी युद्ध का दौर नहीं है तो उन्होंने बड़े आराम से रूसी राष्ट्रपति से दूरी बना ली. शीत युद्ध के दौरान चीन पाकिस्तान के साथ मिला हुआ था. दूसरी तरफ़ रूस को भारत के मज़बूत रणनीतिक साझेदार के तौर पर देखा जाता था. लेकिन वो दौर अब चला गया.

भारतीयों के मन में ऐतिहासिक रूप से कुछ मामलों में रूस को लेकर आदर है. इसके साथ ही नेटो के विस्तार को लेकर भी सोच है. समरकंद में मोदी विजयी बनकर निकले हैं. आप उन्हें नापसंद करते हैं तो करिए लेकिन जियोपॉलिटिक्स की समझ के आधार पर कह रहा हूँ कि उन्हें हराना मुश्किल है. मोदी ने समरकंद में शी जिनपिंग को इग्नोर किया तो उन्हें पता था कि उनके वोटर इससे नाराज़ नहीं होंगे और क्वॉड के पार्टनर भी इससे सहमत रहेंगे. भारत की बहुसंख्यक आबादी चीन को पसंद नहीं करती है.”

क्या नरेंद्र मोदी के शासन काल में भारत वैश्विक मंच पर एक ताक़त के रूप में उभरा है? दिल्ली की जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में मध्य एशिया और रूसी अध्ययन केंद्र में असोसिएट प्रोफ़ेसर राजन कुमार कहते हैं कि कोई भी देश वैश्विक ताक़त बड़ी और मज़बूत अर्थव्यवस्था के आधार पर बनता है.

राजन कुमार कहते हैं, ”भारत की अर्थव्यवस्था 2003 से ही लगातार बढ़ रही है. मनमोहन सिंह के समय में भी भारत की वृद्धि दर आठ फ़ीसदी रही. 2014 के बाद भारत की वृद्धि दर धीमी भी हुई है. तो हम ये नहीं कह सकते कि केवल इस सरकार में भारत की अहमियत बढ़ी है. हाँ, ये बात ज़रूर है कि मोदी का दूसरा कार्यकाल विदेश नीति के लिहाज से काफ़ी अहम रहा. पहले कार्यकाल में भीड़ जुटाने पर ज़्यादा फ़ोकस था, लेकिन एस जयशंकर के विदेश मंत्री बनने के बाद भारत की विदेश नीति में कई ठोस परिवर्तन हुए हैं. भारत पहले गुटनिरपेक्ष की नीति पर चलता था, लेकिन अब मल्टिइंगेजमेंट की नीति पर बढ़ रहा है. पहले किसी गुट में नहीं रहने की बात होती थी, लेकिन अब हर गुट में रहने की बात हो रही है.”

भारत को अगले साल कई अंतरराष्ट्रीय ज़िम्मेदारियां मिलने जा रही हैं. जी-20 की अध्यक्षता इंडोनेशिया से भारत के पास आ रही है और अगले साल भारत में ही जी-20 समिट होगा. एससीओ की अध्यक्षता भी भारत को मिल गई है और अगले साल इसका समिट भी भारत में ही होगा. इसी साल दिसंबर महीने में भारत को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की अध्यक्षता एक महीने के लिए मिलने जा रही है. इसे भारत के उभार से जोड़कर देखा जा रहा है.

रविवार को भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने वॉशिंगटन में कहा कि अब भारत को सुना जाता है. उन्होंने कहा, ”हमारी राय अब मायने रखती है. मुझे लगता है कि पिछले छह सालों में हमारी यह बड़ी उपलब्धि है. ऐसा पीएम मोदी के कारण हुआ है.”

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