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विचार: प्लास्टिक बैन के लिए संसाधनों की भारी कमी, भारत नहीं है तैयार

Jitendra Kumar by Jitendra Kumar
17/11/22
in मुख्य खबर, राष्ट्रीय
विचार: प्लास्टिक बैन के लिए संसाधनों की भारी कमी, भारत नहीं है तैयार
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Priti Mahesh


हर साल जैसे ही मौसम बदलता है, पूरे कोलकाता में दुर्गा पूजा के पंडाल दिखाई देने लगते हैं। दुर्गा पूजा पश्चिम बंगाल का सबसे बड़ा त्योहार है। इन पंडालों को सजाने के लिए कई आयोजन समितियां कुछ ऐसे विषयों को चुनती हैं जिन पर समाज में चर्चा हो रही होती है। पंडाल आयोजकों पिछले कुछ सालों से ‘प्रदूषण’ और ‘इस ग्रह को हम कैसे नष्ट कर रहे हैं’ जैसे लोकप्रिय विषयों का उपयोग करते आए हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में पर्यावरणीय समस्याओं और जलवायु परिवर्तन के बारे में जागरूकता बढ़ाने पर ध्यान दिया गया है।इस साल, शहर के सबसे बड़े पंडालों में से एक के आयोजकों ने अपनी थीम के रूप में ‘प्लास्टिक और समुद्री प्रदूषण’ को चुना।

आयोजकों ने इस बात पर प्रकाश डाला कि कैसे प्लास्टिक कचरा, विशेष रूप से पॉलिथीन बैग, समुद्री जानवरों को नुकसान पहुंचा रहा है। यह संदेश ज़ोरदार और स्पष्ट था। लेकिन क्या केवल जागरूकता ही लोगों के व्यवहार को बदल सकती है? आस-पड़ोस के पूजा पंडालों की हमारी यात्रा ने इस धारणा को तुरंत दूर कर दिया। सड़कें फूड स्टॉल्स की भीड़ से कसी हुईं थी, जिनमें आइसक्रीम, जूस और अन्य स्नैक्स के लिए चम्मच, स्ट्रॉ और प्लेट्स जैसी सिंगल-यूज़ प्लास्टिक की चीज़ों का इस्तेमाल किया गया। प्लास्टिक की छड़ियों से जुड़े हुए गुब्बारों से बच्चों को लुभाया जा रहा था और प्लास्टिक की सजावट से वयस्कों को आकर्षित करने की कोशिश की जा रही थी।

प्लास्टिक प्रदूषण के कारण होने वाली समस्याओं के बारे में जागरूक करता अक्टूबर 2022 में लगाया गया कोलकाता का एक दुर्गा पूजा पंडाल। यहां दर्शाया गया कि समुद्री जीवन को प्लास्टिक कैसे प्रभावित करता है। (फोटो: © प्रीति महेश)
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार, भारत ने 2019 और 2020 में लगभग 34.7 लाख टन प्लास्टिक कचरा उत्पन्न किया। पिछले पांच सालों में, प्रति व्यक्ति प्लास्टिक अपशिष्ट उत्पादन लगभग दोगुना हो गया है। नई दिल्ली स्थित थिंक टैंक द् एनर्जी एंड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट (टेरी) की 2018 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में निर्मित लगभग 43% प्लास्टिक का उपयोग पैकेजिंग के लिए किया जाता है, जिनमें से अधिकांश सिंगल-यूज़ हैं जिसका अर्थ है कि यह एक बार उपयोग के बाद अपशिष्ट प्रणाली में प्रवेश करता है। देश में लगभग 60% प्लास्टिक कचरे को रिसाइकिल (पुनर्नवीनीकरण) किया जाता है, बाक़ी को जला दिया जाता है या लैंडफिल में दफ़्न कर दिया जाता है।

इस साल 1 जुलाई को, भारत ने प्लास्टिक कचरे की बढ़ती समस्या को दूर करने के लिए चम्मच, स्ट्रॉ, प्लेट और पॉलिथीन बैग सहित 19 सिंगल-यूज़ वाली प्लास्टिक वस्तुओं पर प्रतिबंध लगाकर एक बड़ा कदम उठाया। 30 सितंबर 2021 से 75 माइक्रोन से कम मोटे बैग पर प्रतिबंध लगा दिया गया था, लेकिन 120 माइक्रोन से कम मोटे बैग पर प्रतिबंध 31 दिसंबर 2022 से प्रभावी होगा। भारत के सिंगल-यूज़वाले प्लास्टिक पर प्रतिबंध को दुनिया भर में सराहा गया और प्लास्टिक प्रदूषण से निपटने के लिए इसे एक विकासशील देश द्वारा बड़े कदम के रूप में देखा गया।

ठीक से लागू न कर पाने से फेल हो गया प्लास्टिक बैन
ज़्यादातर भारतीय पर्यावरणविदों ने इस बैन की तारीफ़ की है, लेकिन वे जानते थे कि असली परीक्षा कुछ महीनों बाद आएगी। और, प्रतिबंध के चार महीने बाद, कोलकाता की सड़कों ने यह साफ़ कर दिया कि धरातल पर इसको लागू करने के लिए अभी एक लंबा रास्ता तय करना है। यह सोचना गलत होगा कि ये हालात केवल ‘सिटी ऑफ जॉय’ यानी कोलकाता में ही है; पूरे देश में स्थिति एक जैसी है।

सितंबर में मैंने दिल्ली और फिर शिलांग में ऐसा ही हाल देखा। प्रतिबंधित प्लास्टिक की वस्तुएं बाजारों में स्वतंत्र रूप से उपलब्ध थीं, या टेकअवे डिलीवरी में दी जाती थीं। सब्जियों को पतली पॉलिथीन की थैलियों में बेचा जाता था; स्थानीय गन्ने के रस और नारियल पानी के विक्रेता प्लास्टिक के स्ट्रॉ उपलब्ध कराते थे; और कई रेस्तरां, प्लास्टिक कटलरी का उपयोग कर रहे थे। यानी सब कुछ पहले की तरह ही चल रहा था।

जुलाई में जब, भारत में सिंगल-यूज़ प्लास्टिक बैन लागू हुआ, तब इनमें से ज्यादातर बड़े शहरों में मजबूती से साथ शुरुआत हुई थी। सार्वजनिक कार्यक्रम आयोजित किए गए और बड़े पैमाने पर जागरूकता अभियान भी हुए। प्लास्टिक के विकल्पों को सामने लाने और व्यवसायों के बीच ऐसे उत्पादों के निर्माण को बढ़ावा देने के प्रयास किए गए।

प्रतिबंध को लागू करने के लिए जोर भी लगाया गया। नियामक एजेंसियों के मुताबिक कई राज्यों में सिंगल-यूज़ वाले प्लास्टिक के प्रतिबंध को लागू करने के लिए मौके पर चेकिंग जैसे कदम उठाए गए और इसका उल्लंघन करने वालों, विशेष रूप से निर्माताओं के खिलाफ सख्त कार्रवाई की गई। उदाहरण के लिए:

मुंबई में, बृहन्मुंबई नगर निगम ने प्रतिबंध के पहले दो हफ्तों में 225 किलोग्राम प्लास्टिक ज़ब्त किया और 2.85 लाख रुपये का जुर्माना लगाया। जुलाई 2022 में टॉक्सिक्स लिंक द्वारा आयोजित एक बैठक में, दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति के सदस्य सचिव केएस जयचंद्रन ने बताया कि प्रतिबंध के पहले 15 दिनों के भीतर, दिल्ली में स्थानीय अधिकारियों ने लगभग 21 टन प्रतिबंधित प्लास्टिक की वस्तुओं को जब्त कर लिया और 1.38 करोड़ रुपये का कुल जुर्माना वसूल किया।

बेंगलुरु में, ब्रुहत बेंगलुरु महानगर पालिक लोकल अथॉरिटी ने 1 जुलाई से 3 जुलाई के बीच लगभग 700 किलोग्राम सिंगल-यूज़ प्लास्टिक को ज़ब्त कर लिया, और 2 लाख रुपये का जुर्माना लगाया। प्रतिबंध के पहले महीने में, गुरुग्राम म्युनिसिपालिटी ने प्रतिबंधित वस्तुओं के उपयोग के लिए 6.19 लाख रुपये के जुर्माने के साथ 886 चालान जारी किए। इसी अवधि में 1,538.5 किलोग्राम प्रतिबंधित प्लास्टिक जब्त किया गया।

सिंगल-यूज़ प्लास्टिक से छुटकारे और विकल्प के लिए संघर्ष
हालांकि, स्थिति हर जगह एक जैसी नहीं थी। भारत के छोटे शहरों और कस्बों में शुरू से ही प्लास्टिक प्रतिबंध का शायद ही कोई प्रभाव पड़ा हो। छोटे व्यवसाय करने वालों ने बातचीत में मुझे बताया गया कि प्रतिबंध से पहले उनसे सलाह नहीं ली गई थी और उपभोक्ता अभी भी प्रतिबंधित वस्तुओं, विशेष रूप से प्लास्टिक बैग और कटलरी की मांग कर रहे थे। इसके विकल्प आमतौर पर अधिक महंगे हैं और अक्सर उपलब्ध नहीं हो पाते, इस कारण से विक्रेता अतिरिक्त लागत को अपने ऊपर लेने या अपने ग्राहकों को खोने के लिए तैयार नहीं हुए और सिंगल-यूज़ वाले प्लास्टिक का उपयोग जारी रखने का रास्ता चुना।

और सच तो यह है, बड़े ब्रांडों और बड़े निगमों ने भी इस बदलाव को लेकर अधिक इच्छा नहीं दिखाई है। पिछले कुछ वर्षों में, 2016 में ई-कचरा प्रबंधन या इस साल एक्सटेंडेड प्रोड्यूसर्स रिस्पांसिबिलिटी फॉर प्लास्टिक पैकेजिंग जैसी नीतियों को अचानक से लाया गया, जिसमें थोड़ी अग्रिम चेतावनी है। लेकिन सिंगल-यूज़ प्लास्टिक बैन अलग था। सिंगल-यूज़ वाले प्लास्टिक को समाप्त करने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2019 में प्रतिबद्धता व्यक्त की थी, और वस्तुओं की सूची को 2020 में अधिसूचित किया गया था।

सिंगल-यूज़ वाले प्लास्टिक को समाप्त करने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2019 में प्रतिबद्धता व्यक्त की थी और वस्तुओं की सूची को 2020 में अधिसूचित किया गया था।
निगमों, उद्योगों और उपभोक्ताओं के पास प्रतिबंध की तैयारी के लिए समय था। फिर भी, जब इस साल प्रतिबंध लागू हुआ, तो कॉर्पोरेट दिग्गजों, देश के सबसे बड़े एक पेय निर्माताओं में से एक; पारले एग्रो सहित भारत के सबसे बड़ा डेयरी समूह; अमूल और उपभोक्ता सामान बनाने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनी डाबर इंडिया ने अपने पेय पदार्थों की पैकेजिंग से जुड़े प्लास्टिक के स्ट्रॉ को बदलने के लिए और समय मांगा।

उद्योगों की तरफ से आए बयानों के अनुसार, भारत के पेय निर्माता हर साल लगभग 6 अरब स्ट्रॉ का उपयोग करते हैं, और पेपर स्ट्रॉ की घरेलू निर्माण क्षमता लगभग शून्य है। अब तक सीमित मांग के कारण सीमित मात्रा में प्लास्टिक मुक्त विकल्पों का उत्पादन किया गया है। इन विकल्पों की उच्च मात्रा में मांग नहीं है और तुलनात्मक रूप से लागत बहुत अधिक है। ऐसी स्थिति में ब्रांड्स न तो इसे खुद अपने ऊपर लेना चाह रहे हैं और व्यापार खोने के डर से न ही उपभोक्ताओं के ऊपर थोपना चाह रहे हैं। यह समझना मुश्किल है कि कंपनियों ने पहले ही बाजार की इन गतिशीलताओं का अनुमान क्यों नहीं लगाया, या फिर उन्होंने अनावश्यक स्ट्रॉ को पूरी तरह से खत्म करने के लिए उत्पादों को नये तरीके से डिजाइन करने पर विचार क्यों नहीं किया।

सभी हितधारकों के सहयोग पर निर्भर है प्रतिबंध की सफलता
यह समस्या गैर-प्लास्टिक विकल्पों को खोजने के लिए अनुसंधान और विकास में निवेश को लेकर निगमों की इच्छा की कमी में निहित है। इसके अलावा, कुछ प्लास्टिक के उपयोग को समाप्त करने के उद्देश्य से छोटे विक्रेताओं द्वारा विकल्पों को खोजने और इनको अपनाने की दिशा में काम करने की जरूरत है। उपभोक्ताओं के व्यवहार में जागरूकता दिखनी चाहिए जिससे वे सिंगल-यूज़ प्लास्टिक की मांग करना और उपयोग करना बंद कर दें। और सबसे महत्वपूर्ण यह है कि नियामक एजेंसियां इस प्रतिबंध को लागू करने के लिए ठोस योजना तैयार करें।

भारत में प्लास्टिक की थैलियों पर पहले के प्रतिबंध से सबक बिल्कुल स्पष्ट हैं: इस तरह के किसी भी बड़े बदलाव के लिए सभी हितधारकों के निरंतर प्रयास और इसको लागू करवाने में बहुत सारे सरकारी समर्थन की ज़रूरत होती है। साथ ही, व्यवस्था में बदलाव की भी बहुत जरूरत होती है। दुर्भाग्य से, भारत के सिंगल-यूज़ वाले प्लास्टिक के प्रतिबंध में इनका अभाव है। मैंने जो देखा और सुना है, उसके आधार पर प्रतिबंधित वस्तुओं की मौके पर चेकिंग और उनको ज़ब्त करने की काम धीमा हो रहा है। इसके विकल्पों के निर्माताओं को कोई प्रोत्साहन नहीं दिया जा रहा है। इन सबसे इस प्रतिबंध को बहुत कम रफ़्तार मिल पा रही है और परिणामस्वरूप बड़े स्तर पर उल्लंघन हो रहा है।

भारत में सिंगल-यूज़ प्लास्टिक बैन के चार महीने हुए हैं, अभी शुरुआती दिन हैं। अगर सामूहिक इच्छाशक्ति हो तो निश्चित तौर पर बदलाव आ सकता है। लेकिन सवाल यह है कि इसके लिए क्या कोई अगुवाई करने को तैयार है?


साभार : thethirdpole.net

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