हाथों में बाइबल, होठों पर भक्ति गीत और प्रार्थना में लीन लोग. लगभग 90 प्रतिशत ईसाई आबादी वाले नगालैंड में यह नज़ारा आम है. जो ईसाई धर्म अब से 150 साल पहले नगालैंड पहुंचा था वो अब यहां की पहचान और संस्कृति का अहम हिस्सा बन गया है. नगालैंड में दीमापुर या कोहिमा जैसे बड़े शहर हों या फिर कोई छोटा गांव, चर्च की इमारत सबसे पहले नज़र आती है.
दीमापुर के नज़दीक तोलुवी गांव में 1953 में बने बैपटिस्ट चर्च में रविवार सुबह भारी संख्या में लोग आए हैं. यहां हर कोई प्रार्थना में लीन है. कोरस और प्रार्थना के बाद वहां मौजूद धर्म प्रचारक डॉ. हिकोटे मंच पर आते हैं और जोशीली आवाज़ में भाषण देते हैं. अपने भाषण में वो ईसाई धर्म के मूल्यों के अलावा ख़ासतौर पर क्लीन इलेक्शन मूवमेंट पर बात करते हैं.
वो लोगों से अपनी अंतरात्मा की आवाज़ सुनकर स्वच्छ और ईमानदार छवि वाले उम्मीदवार को वोट देने की अपील करते हैं. वो लोगों से कहते हैं कि वो चुनाव में किसी तरह के प्रलोभन से बचें और अपनी दिल की बात सुनकर वोट करें. नगालैंड के चर्चों में पादरियों के इस तरह के भाषण आम हैं.
सीटों का गणित
नगालैंड में 27 फ़रवरी को मतदान होना है. केंद्र में सत्ताधारी बीजेपी यहां गठबंधन सरकार में हैं और स्थानीय नगा पार्टी नेशनलिस्ट डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी (एनडीपीपी) के साथ मिलकर चुनाव लड़ रही है. 60 सीटों पर एनडीपीपी ने और 20 सीटों पर बीजेपी ने उम्मीदवार उतारे हैं. नगालैंड में कोई मज़बूत विपक्ष नहीं हैं. यहां कांग्रेस के अलावा रिपब्लिकन पार्टी ऑफ़ इंडिया, लोक जनशक्ति पार्टी और कई अन्य क्षेत्रीय पार्टियां चुनाव लड़ रही हैं.
2018 में 60 में से 26 सीटें जीतने वाली नगा पीपुल्स फ्रंट (एनपीएफ़) को 2021 में यहां बड़ा झटका लगा था और पार्टी के 21 विधायक बाग़ी होकर एनडीपीपी के गठबंधन में चले गए थे.
इस बार एनपीएफ़ सिर्फ 22 सीटों पर चुनाव लड़ रही है. यानी नगालैंड में कोई मज़बूत विपक्ष इस बार नहीं हैं. नगालैंड में जहां-जहां भी हम गए, सबसे ज़्यादा प्रचार भारतीय जनता पार्टी का ही दिखा.
यहां लगे चुनावी पोस्टरों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बड़ी तस्वीर छपी है. बीजेपी यहां विकास का वादा लेकर आई है, जिस पर बहुत से लोग यकीन करते दिख रहे हैं.
दीमापुर में अपनी एक दोस्त के साथ लॉटरी स्टाल चला रहे एक युवक से हमारी बात हुई. वो एक रिसॉर्ट में पांच हजार रुपए महीना पर काम करे हैं. ग्रामीण क्षेत्र के रहने वाले ये ईसाई युवक बीजेपी के विकास के वादे से प्रभावित हैं और उसे उम्मीद है कि बीजेपी यहां विकास कर सकेगी.
विकास के मामले में नगालैंड बाकी प्रदेशों से पिछड़ा है. यहां एक भी मेडिकल कॉलेज नहीं है. राजधानी कोहिमा या दीमापुर जैसे बड़े शहरों से बाहर निकलते ही टूटी-फूटी सड़कें दिखकी हैं.
इस युवक का कहना है, “बीजेपी के आने के बाद विकास आया है, उन्होंने हमारे लिए बहुत काम किया है. मैं ईसाई हूं और मुझे बीजेपी को वोट देने में तब तक कोई दिक्कत नहीं है जब तक वो धर्म में हस्तक्षेप नहीं करते.”
देश में हिंदुत्ववादी मानी जाने वाली पार्टी की पहचान रखने वाली बीजेपी के नगालैंड में अधिकतर नेता ईसाई हैं जो पूरी शिद्दत के साथ पार्टी को आगे बढ़ाने में लगे हैं. रोज़ी यंथन 28 साल से बीजेपी से जुड़ी हैं. वो नगालैंड में बीजेपी के महिला मोर्चे की प्रमुख रही हैं.
वो कहती हैं, “बीजेपी विकास की राजनीति करने वाली पार्टी है. बीजेपी यहां विकास के लिए और लोगों को अच्छी शिक्षा और नौकरी देने के लिए आई है. यहां बीजेपी में धर्म को लेकर कोई भेदभाव नहीं है ना ही धर्म को लेकर किसी भी तरह का टकराव है. हम यहां अपने धर्म का पालन करते हैं. मैं सपना देखती थी कि एक दिन बीजेपी की सरकार आएगी और यहां विकास होगा.”
चिंताएं
लेकिन राज्य में एक हिंदुत्ववादी पार्टी के उभार ने ईसाई बहुल इस प्रदेश में कई लोगों को चिंता में डाल दिया है. दीमापुर के पास एक गांव में चर्च से बाहर निकल रही एक महिला से जब हमने बीजेपी के बारे में सवाल किया तो वो थोड़ा संभलकर बोलीं, “नगालैंड एक ईसाई बहुल प्रदेश है. हम पर कोई दबाव नहीं है क्योंकि हम एक ईसाई राज्य हैं. लेकिन हम दूसरे राज्यों मे हो रही घटनाओं के बारे में सुनते हैं कि चर्च तोड़े जा रहे हैं और कई जगह लोग अपनी आस्था का पालन करने के लिए स्वतंत्र नहीं है. हमें भी डर लगता है कि कहीं ऐसा वक्त नगालैंड में भी ना आ जाए क्योंकि नगालैंड भी भारत में ही है.”
वो कहती हैं, “यहां लोगों को बीजेपी से तब तक कोई दिक्कत नहीं है जब तक वो धर्म के मामले में सीधा हस्तक्षेप नहीं करती. लेकिन बहुत से लोगों के मन में आशंका तो है ही.”
हमले
बीते रविवार को दिल्ली में चर्च और ईसाई समुदाय से जुड़ी संस्थाओं ने ईसाइयों के ख़िलाफ़ बढ़ रही हिंसा के ख़िलाफ़ प्रदर्शन किया था. इन ईसाई संस्थाओं का आरोप है कि भारत में चर्चों और ईसाई धर्म का पालन करने वाले लोगों पर हमले बढ़ रहे हैं. दिल्ली में संसद भवन के पास जंतर-मंतर पर हुए इस प्रदर्शन में देशभर के चर्चों से जुड़े लोग शामिल थे.
यूनाइटेड क्रिश्चियन फ़ोरम (यूसीएफ़) का कहना है कि चर्चों पर लगातार हमले बढ़ रहे हैं. यूसीएफ़ ने एक रिपोर्ट में कहा है कि साल 2014 में देश में देश में ईसाइयों के ख़िलाफ़ हिंसा की 147 घटनाएं हुई थीं. साल 2022 में ये आंकड़ा 598 था. यूसीएफ़ के दावों के मुताबिक़ इस अल्पसंख्यक समुदाय पर सर्वाधिक हमले उत्तर प्रदेश में, उसके बाद छत्तीसगढ़, झारखंड, कर्नाटक और तमिलनाडु में होते हैं. हालांकि नगालैंड में ईसाई धर्म से जुड़े लोगों पर कभी किसी तरह का कोई हमला नहीं हुआ है.
पैसा
शलोम बाइबल सेमिनरी के अकादमिक डीन डॉ. विलो नलेओ क्लीन इलेक्शन मूवमेंट के समन्वयक हैं. नगालैंड बैपटिस्ट चर्च काउंसिल (एनबीसीसी) इस मूवमेंट का नेतृत्व कर रही है. राजधानी कोहिमा से क़रीब पंद्रह किलोमीटर दूर शलोम बाइबल सेमिनरी का बड़ा कैंपस है. यहां 200 से अधिक छात्र ईसाई धर्म की शिक्षा हासिल करते हैं.
डॉ. नलेओ राज्य में बीजेपी के उभार के पीछे पैसे की शक्ति को देखते हैं.
भारतीय जनता पार्टी ने 2018 विधानसभा चुनावों में नगालैंड की 60 में से 12 सीटें हासिल की थीं. इससे पहले पार्टी सर्वाधिक 7 सीटें साल 2003 के चुनावों में हासिल कर सकी थी. 2008 में पार्टी ने राज्य में 2 और 2013 में 1 सीट जीती थी. नगालैंड की एकमात्र लोकसभा सीट पर 2019 में बीजेपी की गठबंधन पार्टी एनडीपीपी के उम्मीदवार ने जीत हासिल की थी.
विश्लेषक मानते हैं कि बीजेपी ने केंद्र की सत्ता में अपने दम पर नगालैंड में भी अपनी राजनीतिक ज़मीन मज़बूत की है. बीजेपी के उभार का कारण बताते हुए डॉ. विलो नलेओ कहते हैं, “नगालैंड में बीजेपी का उभार सिर्फ राजनीति तक सीमित नहीं है. वो आदिवासी कल्याण यूनियनों की शक्ल में भी यहां आ रहे हैं.”
“वो गांव में जाते हैं और स्कूल बनाते हैं. वो कुछ ग़ैर-ईसाई परिवारों को अपने साथ मिला रहे हैं. वो इन लोगों को अपनी पारंपरिक आस्था ना छोड़ने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं. वो सीधे तौर पर ईसाई धर्म के खिलाफ़ नहीं हैं लेकिन वो उन्हें वाराणासी जैसी जगहों पर पढ़ने भेज रहे हैं ताकि वो लौटकर यहां हिंदी का प्रचार कर सकें. मेरा गांव में भी ऐसा ही एक स्कूल है.”
डॉ. नलेओ जिस हिंदी स्कूल की बात कर रहे थे उसे देखने देखने हम राजधानी कोहिमा से क़रीब 20 किलोमीटर दूर विस्वेमा गांव पहुंचे.
ये स्कूल यहां साल 2003 में स्थापित हुआ था. स्कूल की इमारत काफ़ी बड़ी है लेकिन यहां सिर्फ़ 10-15 ही छात्र पढ़ते हैं. इनमें से अधिकतर ईसाई हैं स्कूल के पास ही एक ईसाई परिवार के घर पर हमने बीजेपी का झंडा लहराता देखा. यहां रह रहीं सुषमा राय ने बताया, “मेरी बेटी इस हिंदू स्कूल में पढ़ती है. हम बीजेपी का समर्थन करते हैं क्योंकि मेरे पति मानते हैं कि बीजेपी यहां विकास ला रही है.”
मूल रूप से नेपाल की रहने वाली सुषमा राय बीजेपी की समर्थक हैं. वो कहती हैं, “बीजेपी यहां पिछड़े लोगों के लिए काम कर रही है और उसने गांव-गांव तक विकास पहुंचाने का वादा किया है. हम लगता है कि बीजेपी यहां गांवों में भी विकास करेगी इसलिए ही यहां लोग इसका समर्थन कर रहे हैं.”
