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भारत से बाहर कितने देशों में पूजे जाते हैं राम?

Jitendra Kumar by Jitendra Kumar
21/01/24
in अंतरराष्ट्रीय, राष्ट्रीय
भारत से बाहर कितने देशों में पूजे जाते हैं राम?
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नई दिल्ली: रामायण भारत में सहस्राब्दियों से लोकप्रिय रहा है, संस्कृत और कई अन्य भाषाओं में महाकाव्य से लेकर, अलग अलग लोक कथाओं तक.. अलग अलग नाटकों से लेकर कठपुतलियों के खेल तक… और गांवों और छोटे शहरों में आयोजित अनगिनत कथाओं से लेकर एक बाप दादाओं की कहानियों में… राम की कहानी एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक सुनाई जाती रही है।

हालांकि, रामायण महाकाव्य को भारतीय तटों से कहीं ज्यादा लोकप्रियता हासिल है और रामायण का प्रसार इस बात का भी प्रमाण है, कि कैसे भारतीयों ने दुनिया भर में यात्रा की, समृद्ध व्यापारियों के रूप में, प्रचारकों के रूप में और बंधुआ मजदूरों के रूप में।

इस लेख में, हम राम की कहानी के भारत से निकलने और एशिया के साथ साथ अलग अलग महाद्वीपों में फैलने के बारे में जानने की कोशिश करेंगे और समझेंगे, कि कैसे राम, भारत से निकलकर, थाईलैंड, कंबोडिया, लाओस, चीन, तिब्बत जैसे देशों तक पहुंचे और 19वीं शताब्दी आते आते कैसे भारत के राम की कहानी, अफ़्रीका, कैरेबियन और ओशिनिया के कुछ हिस्सों में लोकप्रियत हो गई।

एशिया में कैसे फैला रामायण?

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, सेंट जॉन्स यूनिवर्सिटी, न्यूयॉर्क में एशियाई इतिहास और धर्म के तत्कालीन सहायक प्रोफेसर संतोष एन देसाई ने 1969 में लिखा है कि “भारत से निकलकर एशिया में रामायण का फैलना कई सदी से पहले ही शुरू हो गया, जब भारत में ईसाइयों का दौर चल रहा था। उस वक्त राम की कहानी तिब्बत होते हुए चीन तक पहुंची और फिर ये एशिया के अलग अलग देशों, जैसे पूर्वी तुर्किस्तान तक पहुंची।

इसके अलावा, समुद्र मार्ग से रामायण गुजरात और दक्षिण भारत के रास्ते इंडोनेशिया के जावा, मलाया और सुमात्रा द्वीपों तक पहुंचा। वहीं, जमीन के रास्ते फिर राम की कहानी म्यांमार (पहले बर्मा) के रास्ते थाइलैंड, लाओस, वियतनाम और कंबोडिया में भी गाई जाने लगी।

वियतनाम और कंबोडिया में राम की जो कहानी सुनाई जाती है, उसमें अब भारत से पहुंचा रामायण और इंडोनेशिया से पहुंचे रामायण का मिश्रण शामिल हो गया है।

उन्होंने लिखा है, कि “ईसाई युग की प्रारंभिक शताब्दियों में भारतीय इस क्षेत्र की यात्रा क्यों कर रहे थे? मुख्य रूप से मसालों, सोने और सुगंधित लकड़ी के व्यापार के लिए। कई लोग वहीं रुक गए, क्योंकि या तो उन्होंने स्थानीय महिलाओं से शादी कर ली थी या उन्हें वहीं नौकरी मिल गई थी।

इतिहासकार कर्मवीर सिंह ने ‘भारत-थाईलैंड संबंधों के सांस्कृतिक आयाम: एक ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य’ (2022) शीर्षक वाले रिसर्च पेपरर में लिखा है, कि व्यापारी अपने साथ “भारतीय धर्म, संस्कृति, परंपराएं और दर्शन” लेकर आए। उन्होंने लिखा है, कि “उनके साथ ब्राह्मण पुजारी, बौद्ध भिक्षु, विद्वान और साहसी भी देश से बाहर निकले और उन सभी ने दक्षिण पूर्व एशिया के मूल निवासियों तक भारतीय संस्कृति के प्रसारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।”

समय के साथ, रामायण इनमें से कई देशों की संस्कृति का एक अभिन्न अंग बन गई। माना जाता है, कि थाईलैंड में अयुत्या साम्राज्य (1351 से 767) रामायण की अयोध्या संस्कृति पर आधारित था। अयुत्या शहर पर यूनेस्को के एक लेख में कहा गया है, कि “जब पुनर्स्थापित राज्य की राजधानी को नीचे की ओर ले जाया गया और बैंकॉक में एक नया शहर बनाया गया, तो अयुत्या के शहरी टेम्पलेट और वास्तुशिल्प रूप को फिर से बनाने का एक सचेत प्रयास किया गया… और इस दौरान पाया गया, कि ये शहर अयोध्या के पौराणिक शहर जैसा बनाया गया है।”

कंबोडिया में 12वीं शताब्दी में निर्मित अंगकोर वाट मंदिर परिसर में रामायण के भित्ति चित्र हैं, और यह मूल रूप से विष्णु को समर्पित एक मंदिर है।

क्या रामायण आज भी इन क्षेत्रों में अस्तित्व में है?

आज भी, रामायण इन दक्षिण पूर्व एशियाई देशों में से कई देशों की संस्कृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनी हुई है, हालांकि यहां प्रमुख धर्म बौद्ध धर्म (उदाहरण के लिए कंबोडिया, लाओस) से लेकर इस्लाम (मलेशिया, इंडोनेशिया) तक फैली हुई हैं।

रामकियेन, रामायण का एक संस्करण, थाईलैंड का राष्ट्रीय महाकाव्य है। वर्तमान राजा चक्री वंश के हैं, जिनके सभी शासकों के नाम राम के नाम पर हैं। थाईलैंड के वर्तमान संवैधानिक सम्राट, वजिरालोंगकोर्न को राम एक्स कहा जाता है। लाओस में भी, फ्रा राम की कहानी राष्ट्रीय महाकाव्य है।

बेशक, इन सभी देशों में राम की कहानी में कई बदलाव आए हैं। साथ ही, राम की कहानी के उनके संस्करणों की प्रेरणा आवश्यक रूप से वाल्मिकी रामायण नहीं है। उदाहरण के लिए, जिन देशों में यह कहानी दक्षिण भारत के व्यापारियों द्वारा लोकप्रिय हुई, वहां यह तमिल महाकाव्य कंबन रामायण से काफी समानता रखती है।

दिवंगत विद्वान ए.के. रामानुजन ने लिखा है, कि “यह स्पष्ट रूप से दिखाया गया है, कि अठारहवीं सदी के थाई रामकियेन का तमिल महाकाव्य पर बहुत प्रभाव है। उदाहरण के लिए, थाई कार्यों में कई पात्रों के नाम संस्कृत नाम नहीं हैं, बल्कि स्पष्ट रूप से तमिल नाम हैं।”

राम की इन कहानियों में भारतीय महाकाव्य से कुछ अंतर हैं। कंबोडिया के रीमकर में, एक जलपरी राजकुमारी सुवन्नमच्चा को भगवान हनुमान से प्यार हो जाता है। जावा में, जावानीस देवता ध्यान और उनके पुत्र, कहानी का हिस्सा बन जाते हैं। मलेशियाई हिकायत सेरी राम, रावण (महाराजा वाना) के प्रति अधिक सहानुभूति रखते हैं। लाओस में प्रकाशित एक लेख के अनुसार, “फ्रा राम को गौतम बुद्ध का पूर्व अवतार माना जाता है…हापमानसौने, लाओ रावण को मारा का पूर्व अवतार माना जाता है, वह राक्षस जिसने बुद्ध के ज्ञान प्राप्ति में बाधा डालने की कोशिश की थी।”

इन सभी देशों में नाटकों, नृत्य नाटिकाओं, कठपुतली शो आदि के माध्यम से कहानी को जीवित रखा गया है।

देसाई लिखते हैं, कि “आम तौर पर किंवदंतियों की उत्तरी धारा से निकली कहानियां राम की कुलीनता और महानता पर जोर देती हैं। दूसरी ओर, दक्षिणी किंवदंतियों पर आधारित संस्करण, रावण को एक नायक के रूप में चित्रित करते हैं और उसकी विद्वता की प्रशंसा करते हैं।”

एशिया के बाहर कैसे पहुंचा रामयण?

एक प्रमुख धारा, जो रामायण को अफ्रीका, कैरेबियन आदि देशों में ले गई, वह 19वीं शताब्दी में भारत के बाहर गिरमिटिया मजदूर थे। गुलामी समाप्त होने के बाद, इन देशों में मजदूरों की तत्काल मांग थी, जो पहले दास श्रम के माध्यम से काम करने वाले बागानों पर काम कर सकते थे। ब्रिटिश भारत से गिरमिटिया मजदूरों के रूप में पुरुषों और महिलाओं को फिजी, मॉरीशस, त्रिनिदाद और टोबैगो, गुयाना, सूरीनाम आदि देशों में भेजा गया था। ‘गिरमिटिया’ शब्द ‘समझौते’ से आया है, जिस पर इन लोगों ने हस्ताक्षर किए थे (या बागानों में काम करने के लिए) हस्ताक्षर कराए गए।

इनमें से अधिकांश गिरमिटिया मजदूर उत्तर प्रदेश और बिहार के थे। हालांकि जब वे पूरी तरह से नए जीवन के लिए जहाज़ों पर चढ़ रहे थे, तो वे ज़्यादा कुछ नहीं ले जा सके, लेकिन वे अपनी संस्कृति और धर्म को साथ ले गए, और इस संस्कृति का एक बड़ा हिस्सा तुलसीदास का रामचरितमानस था, जो अवधी में लिखा गया था और यकीनन उत्तर भारत में सबसे लोकप्रिय धार्मिक पाठ था।

इन देशों में कितना बचा है रामायण?

गिरमिटिया राजाओं को प्रभावित करने वाले अमीर व्यापारी नहीं थे, लेकिन उन्होंने राम की कहानी को कैसे याद किया और संरक्षित किया, इसमें निजी व्यक्तिगत तत्व है। एक विदेशी भूमि में, अपने घरों से बहुत दूर, जिसे वे गरीबी या जातीय उत्पीड़न या किसी प्रकार के सामाजिक बहिष्कार से भागने के लिए छोड़ गए थे, रामचरितमानस को याद कर, पुरानी कहानियों को याद कर, राम की कहानी, वास्तविक घर से भी ज्यादा वास्तविक मातृभूमि का प्रतीक बन गया।

लेखक वी.एस. नायपॉल, जिनका जन्म त्रिनिदाद में गिरमिटिया मजदूरों के परिवार में हुआ था, उन्होंने लिखा है, कि “गांधी और नेहरू तथा अन्य लोग जहां काम करते थे वह ऐतिहासिक और वास्तविक था। जिस भारत से हम आए थे वह असंभव रूप से हमारी पहुंच से दूर था, राम की भूमि, हमारे लिए काल्पनिक बन गया था।”

ब्रिटिश इतिहासकार क्लेम सीचरन, जिनका जन्म गुयाना में एक गिरमिटिया परिवार में हुआ था, उन्होंने लिखा है, कि उनके पूर्वजों के लिए, “रामायण… का निर्माण मातृभूमि के प्रामाणिक प्रतिनिधित्व के रूप में किया गया था। असली पूर्वी यूपी और पश्चिमी बिहार रडार से गायब हो गए।”

उन्होंने यह भी लिखा है, कि गिरमिटिया महिलाओं के लिए सीता का क्या मतलब था। उन्होंने लिखा है, कि “…सीता के व्यक्तित्व ने उन महिलाओं को धीरज दिया, जो अपने परिवारों से हजारों किलोमीटर दूर आ गईं थीं, जिनके अपने परिवार से संबंध टूट चुके थे, जिन्हें सताया गया, लेकिन उन्होंने सीता की हिम्मत को याद किया और अपने जीवन का पुननिर्माण किया।”

इन देशों में आज भी रामलीला का लोक रंगमंच लोकप्रिय है। आज भी इन देशों में रामकथा गाया जाता है, नाटकों का आयोजन होता है और लोग इस बहाने अपनी मातृभूमि को याद करते हैं।

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