Saturday, March 7, 2026
नेशनल फ्रंटियर, आवाज राष्ट्रहित की
  • होम
  • मुख्य खबर
  • समाचार
    • राष्ट्रीय
    • अंतरराष्ट्रीय
    • विंध्यप्रदेश
    • व्यापार
    • अपराध संसार
  • उत्तराखंड
    • गढ़वाल
    • कुमायूं
    • देहरादून
    • हरिद्वार
  • धर्म दर्शन
    • राशिफल
    • शुभ मुहूर्त
    • वास्तु शास्त्र
    • ग्रह नक्षत्र
  • कुंभ
  • सुनहरा संसार
  • खेल
  • साहित्य
    • लेख
    • कला संस्कृति
  • टेक वर्ल्ड
  • करियर
    • नई मंजिले
  • घर संसार
  • होम
  • मुख्य खबर
  • समाचार
    • राष्ट्रीय
    • अंतरराष्ट्रीय
    • विंध्यप्रदेश
    • व्यापार
    • अपराध संसार
  • उत्तराखंड
    • गढ़वाल
    • कुमायूं
    • देहरादून
    • हरिद्वार
  • धर्म दर्शन
    • राशिफल
    • शुभ मुहूर्त
    • वास्तु शास्त्र
    • ग्रह नक्षत्र
  • कुंभ
  • सुनहरा संसार
  • खेल
  • साहित्य
    • लेख
    • कला संस्कृति
  • टेक वर्ल्ड
  • करियर
    • नई मंजिले
  • घर संसार
No Result
View All Result
नेशनल फ्रंटियर
Home मुख्य खबर

जयंती विशेष : जपो निरन्तर एक ज़बान, हिंदी, हिंदू, हिंदुस्तान…

Jitendra Kumar by Jitendra Kumar
24/09/22
in मुख्य खबर, राष्ट्रीय, साहित्य
जयंती विशेष : जपो निरन्तर एक ज़बान, हिंदी, हिंदू, हिंदुस्तान…
Share on FacebookShare on WhatsappShare on Twitter

गौरव अवस्थी


भारतेंदु युग के प्रमुख स्तंभ पंडित प्रताप नारायण मिश्र की अल्प आयु में पिता की मृत्यु के चलते औपचारिक पढ़ाई तो बहुत नहीं हो पाई लेकिन स्वाध्याय के बल पर वह पत्रकारिता और साहित्य के प्रकांड पंडित बने। परवर्ती साहित्यकारों और संपादकों में तो उनके प्रति सम्मान का भाव था ही पूर्ववर्ती साहित्यकार भी उनके पांडित्य से प्रभावित रहा करते थे।

24 सितंबर 1856 को जन्मे पंडित प्रताप नारायण मिश्र के जन्म स्थान को लेकर साहित्यकारों में कुछ मतभेद हैं। आचार्य रामचंद्र शुक्ल और डॉ सुरेश चंद्र शुक्ल ने उनके जन्म स्थान के रूप में कानपुर को मान्यता दी है। इनका मत है कि पंडित प्रताप नारायण के पिता पंडित संकटा प्रसाद मिश्र को परिवार पालन के लिए 14 वर्ष की अल्पायु में कानपुर आना पड़ा। इसलिए उनका (प्रताप नारायण) जन्म कानपुर में ही हुआ होगा लेकिन अपने संपादन में ‘प्रताप नारायण मिश्र कवितावली’ प्रकाशित करने वाले नरेश चंद्र चतुर्वेदी और डॉ शांति प्रकाश वर्मा उनका जन्म उन्नाव जनपद के बैजेगांव ( अब बेथर) ही मानते हैं। ‘भारतीय साहित्य के निर्माता प्रताप नारायण मिश्र’ पुस्तक में रामचंद्र तिवारी लिखते हैं-‘मिश्रा जी का जन्म बैजेगांव में हुआ हो या ना हुआ हो उनकी रचनाओं में गांव का अंश कुछ अधिक ही है।’

मासिक पत्र ब्राह्मण का प्रकाशन :
भारतेंदु हरिश्चंद्र की परंपरा जारी रखने के लिए आर्थिक कठिनाइयों के बाद भी पंडित प्रताप नारायण मिश्र ने मार्च 1883 में ब्राह्मण नाम से मासिक पत्र प्रकाशित करना शुरू किया। ब्राह्मण के प्रथम अंक में अपना उद्देश्य स्पष्ट करते हुए उन्होंने लिखा था-‘अंतः करण से वास्तविक भलाई चाहते हुए सदा अपने यजमानों (ग्राहकों) का कल्याण करना ही हमारा मुख्य कर्म होगा’। 550 रुपए का घाटा सहकर वह 7 वर्षों तक ब्राम्हण का निरंतर प्रकाशन करते रहे। इसके बाद प्रकाशन का दायित्व खड्गविलास प्रेस बांकीपुर के मालिक बाबू रामदीन सिंह को सौंप दिया।

हिंदी के लिए पूर्णत: समर्पित:
पंडित प्रताप नारायण मिश्र हिंदी के बहुत बड़े हिमायती थे। अपने मासिक पत्र ब्राह्मण में हिंदी को लेकर वह जब का लेख लिखते रहते थे। एक बार समकालीन प्रकाशन ‘फतेहगढ़ पंच’ ने उनकी हिंदी पक्षधरता के खिलाफ लेख प्रकाशित किया। इस पर उनका गुस्सा बढ़ गया। उन्होंने फतेहगढ़ पंच के लेख के जवाब में ब्राह्मण में कई महीने तक लिखा। दोनों के बीच कई महीने विवाद चलता रहा। उसी बीच उन्होंने हिंदी पर एक कविता लिखी, जो काफी चर्चित हुई-

चहहु जो सांचे निज कल्यान, तो सब मिलि भारत संतान
जपो निरंतर एक ज़बान -हिंदी, हिंदू, हिंदुस्तान
तबहि सुधरिहे जन्म-निदान; तबहिं भलो करिहे भगवान

मसखरी की मिसालें :
प्रताप नारायण मिश्र स्वभाव से मस्त मौला थे। मसखरे थे। नाटकों में अभिनय भी करते थे। कानपुर की सड़कों पर वह लावनी गाते हुए कभी रिक्शे पर कभी पैदल निकलते थे। फागुन में इकतारा लेकर वह उपदेशपूर्ण, हास्य, होली, कबीर और पद आदि भी गाते थे। वह सांस बंद कर के घंटों तक मुर्दा से पड़े रहते थे। अपने कान एक या दोनों उन्हें हिलाते या फड़काते थे। तब उनके दूसरे अंग स्थिर रहते थे। उनकी मसखरी की मिसालें भी खूब चर्चित हैं।
एक बार नाटक में उनको स्त्री का रूप लेना था। मूछों का मुंड़ाना जरूरी था। भक्ति भाव से अपने पिता के सामने हाजिर हुए और बोले यदि आप आज्ञा दीजिए तो इनको (मूंछों) मुड़वा डालूं। मैं अनाज्ञाकारी नहीं बनना चाहता।’ पिता ने हंसकर आज्ञा दे दी। इसी तरह एक बार कानपुर म्युनिसिपिलटी में इस बात पर विचार हो रहा था कि भैरव घाट में मुर्दे बहाए जाएं या नहीं। चर्चा के बीच किसी ने कहा कि जले हुए मुर्दे की पिंडी यदि इतने इंच से अधिक न हो तो बहाई जाए। दर्शकों में प्रताप नारायण भी मौजूद थे। वह तत्क्षण खड़े होकर बोले- ‘अरे दैया रे दैया! मरेउ पर छाती नापी जाई!’ इस पर खूब जोर के ठहाके लगे।
ऐसा ही एक किस्सा पादरी से बातचीत का है। पादरी ने व्यंग्य पूर्ण लहजे में कहा-आप गाय को माता कहते हैं। उन्होंने कहा- हां। पादरी बोला तो बैल को आप चाचा कहेंगे। इस पर उनका जवाब था- बेशक रिश्ते से क्या इंकार है? पादरी ने तंज कसते हुए कहा-हमने तो 1 दिन अपनी आंखों से एक बार को महिला खाते देखा था। मिश्र जी ने कहा- अजी साहब, वह इसाई हो गया होगा! हिंदू समाज में ऐसे भी बैल होते हैं।’ पादरी मुंह लटका कर चला गया।

लावनी सुनकर कन्नौज के कसाइयों ने छोड़ दी थी गोहत्या:

पंडित प्रताप नारायण मिश्र गोरक्षा के बहुत बड़े हिमायती थे। कई कविताओं में उन्होंने गोरक्षा पर जोर दिया। अपने निबंध में महावीर प्रसाद द्विवेदी लिखते हैं-‘सुनते हैं कानपुर में जो इस समय गौशाला है उसकी स्थापना के लिए प्रयत्न करने वालों में प्रताप नारायण भी थे। एक बार स्वामी भास्कर आनंद के साथ वह कन्नौज गए और गौ रक्षा पर व्याख्यान दिया। व्याख्यान में एक लावनी कही-

बां-बां करि तृण दाबि दांत सों, दुखित पुकारत गाई है

आचार्य द्विवेदी अपने निबंध में लिखते हैं- मिश्र जी की इस लावनी में करुण रस का इतना अतिरेक था कि मुसलमानों तक पर इसका असर हुआ और एक आध कसाइयों ने गौ हत्या से तो बात कर ली थी।

38 बरस में पूरी हो गई जीवन यात्रा
अपने दैनंदिन जीवन में सदैव अस्त व्यस्त रहने वाले पंडित प्रताप नारायण मिश्र अक्सर बीमार रहा करते थे। इसी के चलते 38 वर्ष की कम उम्र में 1894 में उन्होंने अपनी जीवन यात्रा पूरी की। अपने इस छोटे से जीवन में उन्होंने साहित्य की हर विधा में लिखा। रामचंद्र तिवारी के अनुसार, प्रताप नारायण ग्रंथावली में उनके 190 निबंध और प्रताप नारायण मिश्र कवितावली में छोटी बड़ी 197 कविताएं संग्रहीत हैं। उन्होंने हिंदी गद्य को समृद्ध किया। उनके गद्य में लोक प्रचलित मुहावरे और कहावतें की भरमार है। डॉ शांति प्रकाश वर्मा ने उनके गद्य से छांटकर मुहावरे और कहावतों का पूरा कोष ही तैयार कर दिया। मुहावरा कोष लगभग 110 प्रश्न का है और कहावतें कुल 16 पृष्ठों में। मिश्रा जी ने अपने लेखों में संस्कृत की जिन सूक्तियों और श्लोकों का उदाहरण दिया है, उनकी संख्या 220 है। उर्दू और फारसी की सूक्तियां कुल 66 हैं।

(‘भारतीय साहित्य के निर्माता प्रताप नारायण मिश्र’ लेखक-रामचंद्र तिवारी, पृष्ठ-68)

उनके निधन पर पूर्ववर्ती साहित्यकार बालकृष्ण भट्ट ने असमय निधन पर प्रताप नारायण मिश्र के प्रताप का उल्लेख कुछ यूं किया था-‘प्रातः स्मरणीय बाबू हरिश्चंद्र को जो हिंदी का जन्मदाता कहे तो प्रताप मिश्र को निसंदेह उस स्तनअधन्या दूध मोहि बालिका का पालन पषण करता कहना पड़ेगा क्योंकि हरिश्चंद्र के उपरांत उसे अनेक रोग दोष से सर्वथा नष्ट न हो जाने से बचा रखने वाले यही देख पड़े’।

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने 1906 की सरस्वती में एक निबंध ‘पंडित प्रताप नारायण मिश्र’ लिखा था। वह लिखते हैं-‘मैं कोई संदेह नहीं कि प्रताप नारायण में प्रतिभा थी और थोड़ी नहीं बहुत थी। विधता होने से कविता शक्ति में कोई विशेषता नहीं आ सकती उल्टे हानि चाहे उससे कुछ हो जाए। प्रताप नारायण की कविता में प्रतिभा का प्रमाण अनेक जगह मिलता है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने भारतेंदु युग के प्रमुख निबंधकार प्रताप नारायण मिश्र और बालकृष्ण भट्ट जी की एक साथ चर्चा करते हुए लिखा है-‘पंडित प्रताप नारायण मिश्र और पंडित बालकृष्ण भट्ट ने हिंदी गद्य साहित्य में वही काम किया है जो अंग्रेजी गद्य साहित्य में एडिशन और स्टील ने किया था’।

(हिंदी साहित्य का इतिहास- पृष्ठ 467)

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

About

नेशनल फ्रंटियर

नेशनल फ्रंटियर, राष्ट्रहित की आवाज उठाने वाली प्रमुख वेबसाइट है।

Follow us

  • About us
  • Contact Us
  • Privacy policy
  • Sitemap

© Copyright 2025 Uma Shankar Tiwari - All Rights Reserved .

  • होम
  • मुख्य खबर
  • समाचार
    • राष्ट्रीय
    • अंतरराष्ट्रीय
    • विंध्यप्रदेश
    • व्यापार
    • अपराध संसार
  • उत्तराखंड
    • गढ़वाल
    • कुमायूं
    • देहरादून
    • हरिद्वार
  • धर्म दर्शन
    • राशिफल
    • शुभ मुहूर्त
    • वास्तु शास्त्र
    • ग्रह नक्षत्र
  • कुंभ
  • सुनहरा संसार
  • खेल
  • साहित्य
    • लेख
    • कला संस्कृति
  • टेक वर्ल्ड
  • करियर
    • नई मंजिले
  • घर संसार

© Copyright 2025 Uma Shankar Tiwari - All Rights Reserved .