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विज्ञापन क्षेत्र का ‘अ से ज्ञ’ सिखाती है विज्ञापन का जादू

Frontier Desk by Frontier Desk
02/09/25
in लेख
विज्ञापन क्षेत्र का ‘अ से ज्ञ’ सिखाती है विज्ञापन का जादू
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Lokendra Singh
लोकेन्द्र सिंह

लोकेन्द्र सिंह (समीक्षक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में सहायक प्राध्यापक हैं।)

मीडिया शिक्षक डॉ. आशीष द्विवेदी अपनी पुस्तक ‘विज्ञापन का जादू’ में लिखते हैं- “विज्ञापन की दुनिया बड़ी अनूठी और अजीब है। यदि हम इसको समझना चाहते हैं तो शुरुआती दौर से ही उसके अंदर झांकना होगा। जब तक हमारी विज्ञापन को लेकर सारी अवधारणाएं स्पष्ट नहीं हो जातीं, हम विषय की खोह में नहीं जा सकते”। यह सही बात है कि विज्ञापन की अवधारणा को समझना है, तब उसकी दुनिया के हर हिस्से से परिचित होना जरूरी है।

डॉ. आशीष द्विवेदी ने अपनी पुस्तक ‘विज्ञापन का जादू’ में यही काम किया है। वे हमें विज्ञापन की दुनिया के अंदर ले जाते हैं और वहाँ की उन गलियों की सैर कराते हैं, जहाँ विज्ञापन कब, कहाँ, क्यों, कैसे और किसलिए की इबारत दर्ज है। विज्ञापन के संसार का संपूर्ण अक्षर ज्ञान ‘अ से ज्ञ’ इस पुस्तक में है। यह हमें विज्ञापन के इतिहास, उसके वर्तमान एवं भविष्य से भी परिचित कराती है।

इसके साथ ही विज्ञापन के प्रकार एवं स्वरूप की जानकारी भी देती है। विज्ञापन में रुचि रखनेवाले और पत्रकारिता की पढ़ाई करनेवाले विद्यार्थियों के लिए यह अत्यंत उपयोगी पुस्तक है। भाषा में सरलता और सहजता है। एक रोचक विषय को रोचक ढंग से ही प्रस्तुत किया गया है। विज्ञापन के प्रभाव, उपयोग एवं महत्व को समझाने के लिए लोकप्रिय विज्ञापनों का विश्लेषण किया गया है।

पहले अध्याय में डॉ. द्विवेदी ‘विज्ञापन का अनूठा संसार’ घुमाते हैं। जहाँ वह इस बात को स्थापित करते हैं कि “विज्ञापन की छाप या थाप समाज पर इतनी गहरी है कि उसके बगैर बहुतेरी चीजों की कल्पना नहीं हो सकती”। विज्ञापन की विधिवत शुरुआत की जानकारी भी इस अध्याय में मिलती हैं।

हालांकि, यह मानना चाहिए कि विज्ञापन विधा प्रारंभ से ही मानव सभ्यता का हिस्सा रही है। आधुनिक स्वरूप में, करीब ढाई हजार साल पुराने एक विज्ञापन में मकान किराए पर देने का उल्लेख मिलता है। जिसका मजमून कुछ यूं था- “आगामी 1 जुलाई से आरियोपोलियन हवेली में कई दुकानें भाड़े पर दी जाएंगी। दुकानों के ऊपर रहने के कमरे हैं। दूसरी मंजिल के कमरे राजाओं के रहने योग्य हैं- अपने निजी मकान की तरह”।

ढाई हजार साल पहले के विज्ञापन में भी उपभोक्ता के साथ आत्मीय रिश्ता जोड़ने वाली पंचलाइन दिखायी पड़ती है- ‘अपने निजी मकान की तरह’। डॉ. आशीष द्विवेदी लिखते हैं कि “भारत में व्यावसायिक दृष्टि से विज्ञापनों की शुरुआत को 437-38 ई. से माना गया है। दक्षिणी गुजरात से रेशमी वस्त्रों के बुनकर दशपुर राज्य (वर्तमान मंदसौर) में अपना कारोबार बढ़ा रहे थे। इसके लिए उन्होंने विज्ञापन संघ भी बना लिया था। उन्होंने सूर्य मंदिर के शिलालेख पर एक विज्ञापन उत्कीर्ण कराकर अपने रेशमी वस्त्रों की खूबियों का बड़ी रोचकता से वर्णन किया है”।

कई विद्वान इसे विश्व का पहला विज्ञापन भी मानते हैं। हम मध्यप्रदेशवासियों के लिए तो यह गौरव की बात है। यह विज्ञापन संस्कृत भाषा में था, जिस पर अपने रेशमी वस्त्रों की प्रशंसा में लिखा था- “तन पर चाहे कितना भी यौवन फूट पड़ा हो, अंग-अंग पर कांति छितराई हुई हो, आलेपन युक्त अंग हों, होंठ क्यों न तांबूल के समान लाल रचे हों, फूलों से वेणी गुंथी हो और कलियों से माँग भरी हो लेकिन समझदार नारी अपने प्रिय के पास तभी जाती है, जब वह हमारे द्वारा बुने रेशम के वस्त्रों को पहनती है। इसके बिना उसका प्रिय उसे स्वीकार ही नहीं करेगा”।

अच्छा विज्ञापन तैयार करने के क्या सूत्र हैं, इनका उल्लेख भी लेखक ने किया है। इसके साथ ही समाचार पत्रों में प्रकाशित होनेवाले विज्ञापनों का वर्गीकरण और विज्ञापन के अन्य माध्यमों की जानकारी भी इस पुस्तक में मिलती है। विज्ञापन की दुनिया ने समय और तकनीक के साथ अपने पैर पसारे हैं। मोबाइल और इंटरनेट क्रांति के साथ अब विज्ञापन की दुनिया का विस्तार हमारे मस्तिष्क तक हो गया है।

हम सोशल मीडिया या इंटरनेट पर क्या खोज रहे हैं, कहाँ जा रहे हैं, या किस तरह के कंटेंट को देख-पढ़ रहे हैं, उसके आधार पर हमारे मोबाइल/लैपटॉप की स्क्रीन विज्ञापन दिखायी देने लगते हैं। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि आज हम विज्ञापन की अनदेखी नहीं कर सकते क्योंकि विज्ञापन निर्माता कंपनियों की निगाहें हम पर निरंतर हैं। आज हम विज्ञापन के सैलाब में घिरे हुए हैं। प्रत्येक दिशा से विज्ञापन हम तक पहुँच रहे हैं और हमें आकर्षित एवं प्रभावित करने का प्रयास कर रहे हैं।

लेखक ने इस बात की चर्चा भी की है कि आखिर दस-बीस सेकंड के विज्ञापन की क्या खूबी है कि वह अनचाही चीज को खरीदने की प्यास हमारे दिल में जगा देते हैं। विज्ञापन की कॉपी लिखने की कला को उन्होंने उदाहरण सहित समझाने का प्रयास किया है। विज्ञापन की कॉपी लिखना एक अलग ही कौशल है क्योंकि यहाँ हमें कम शब्दों में बहुत कुछ कहना होता है। यह भी ध्यान रखना होता है कि विज्ञापन किस माध्यम से प्रसारित होगा।

खंड-3 में यह पुस्तक हमें उन रचनाधर्मियों से मिलाती है, जो विज्ञापन की जादुई दुनिया के राजा हैं। डेविड ओगिल्वी, लियो बर्नेट, पीयूष पाण्डे, प्रसून जोशी, प्रह्लाद कक्कड़, आर. बाल्कि, भरत दाभोलकर, जोवी पॉल और सैम बलसारा, ये लोग विज्ञापन की दुनिया के जादूगर हैं। इनके बारे में पढ़ने और जानने की प्यास यह पुस्तक अपने पाठकों के भीतर जगाती है। खंड-4 में अमूल, पतंजलि, लक्स, कैडबरी, बिस्लेरी और एमडीएच मसाला की केस स्टडी के माध्यम से लेखक ने ब्रांड निर्माण की कहानी सुनायी है।

इसी अध्याय में विज्ञापन एजेंसियों की कार्यपद्धति की चर्चा की गई है। खंड-5 में सामाजिक और नैतिक मूल्यों के प्रकाश में विज्ञापन में किए जा रहे प्रयोगों की चर्चा की है। यह कहने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि विज्ञापनों ने स्त्रियों की प्रतिमा को विकृत रूप से गढ़ दिया है। ज्यादातर विज्ञापन स्त्री को एक उत्पाद के रूप में प्रस्तुत करते हैं। इस चिंताजनक पहलू पर लेखक ने पाठकों का ध्यान आकर्षित किया है।

पुस्तक के खंड-6 में विज्ञापन से जुड़ी महत्वपूर्ण संस्थाओं की जानकारी दी गई है। जबकि परिशिष्ट में विज्ञापन को केंद्र में रखकर लिखे गए लेखों को शामिल किया गया है। आईआईएम की प्राध्यापक रीतिका खेड़ा ने लक्ष्य आधारित विज्ञापनों के दौर पर लिखा है। धीरेंद्र अस्थाना एवं शिशिर शर्मा ने विज्ञापन की दुनिया में फिल्मी सितारों और खिलाड़ियों के वर्चस्व का विश्लेषण किया है। क्षमा शर्मा के लेख में महिला मनोविज्ञान को बहुत ही खूबसूरती से समझाया गया है।

वहीं, विज्ञापन एवं मनोविज्ञान की विशेषज्ञ प्रो. पुन्नीता हर्ने ने बताया है कि विज्ञापन एक उपभोक्ता संस्कृति और सामाजिक बदलाव के वाहक भी हैं। इस पुस्तक में एक लेख मेरा भी शामिल है, जिसमें मैंने यह समझाने का प्रयास किया है कि सकारात्मक सृजन से विज्ञापन अधिक प्रभावशाली हो जाते हैं। कुल मिलाकर लेखक डॉ. आशीष द्विवेदी ने विज्ञापन की दुनिया को प्रत्येक दृष्टिकोण से दिखाने का प्रयास किया है। यह पुस्तक किताबघर, नईदिल्ली से प्रकाशित है।

लेखक : डॉ. आशीष द्विवेदी
पुस्तक : विज्ञापन का जादू
मूल्य : 350 रुपये (पेपरबैक)
पृष्ठ : 222
प्रकाशक : किताबघर, नई दिल्ली 

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