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वो भूली दास्ताँ… मुंशी चंद्रिका प्रसाद : जीवन पर्यंत नमक का त्याग करने वाले सत्याग्रही

Frontier Desk by Frontier Desk
15/08/25
in लेख
वो भूली दास्ताँ… मुंशी चंद्रिका प्रसाद : जीवन पर्यंत नमक का त्याग करने वाले सत्याग्रही
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गौरव अवस्थी

उनका जन्म जरूर बछरावां क्षेत्र के राजामऊ नामक कस्बे में हुआ था लेकिन उनकी सोच हमेशा प्रजा के पक्ष में ही रही। वह चाहते तो आसान जिंदगी गुजर बसर करते लेकिन उन्होंने राष्ट्रीय आंदोलन में शामिल होने का कठिन रास्ता चुनना पसंद किया। नमक सत्याग्रह से इस कदर प्रभावित हुए की जीवन पर्यंत नमक का सेवन न करने की प्रतिज्ञा ली और पूरी भी की। राष्ट्रीय आंदोलन में प्रतिभा के चलते उनकी शिक्षा अधूरी ही छूट गई लेकिन शिक्षा का महत्व वह बखूबी जानते थे। इसलिए उन्होंने बछरावां क्षेत्र में भावी पीढियों के लिए अपना पूरा जीवन न्योछावर कर दिया। कई शिक्षा के संस्थान स्थापित किए और पूरा जनपद उन्हें ‘गुरुजी’ उपनाम से संबोधित करने लगा।

ऐसे स्वाधीनता संग्राम सेनानी को जनपद, प्रदेश और देश के लोग मुंशी चंद्रिका प्रसाद के नाम से जानते हैं। आज भी उनके नाम और काम की चर्चा आते ही सभी का सिर श्रद्धा से झुक जाता है। 6 मार्च 1904 को बांके बिहारी श्रीवास्तव और श्रीमती पार्वती देवी के घर जन्मे मुंशी जी माँ चंद्रिका देवी से काफी मान-मनौती के पैदा हुए थे। इसलिए माता-पिता ने उनका नाम चंद्रिका प्रसाद ही रखा। राष्ट्रीय आंदोलन की वजह से उनकी पढ़ाई बीच में ही छूट गई। किशोर उम्र में आर्य समाज से प्रभावित होने के कारण गुरुजी ‘शुद्धि आंदोलन’ में सक्रिय रहे। 1930 में अछूतोद्धार एवं खादी फंड के लिए बछरावां में महात्मा गांधी को थैली भेंट की। जिला परिषद रायबरेली द्वारा संचालित हरिजन पाठशाला में अध्यापन कार्य भी किया। देश सेवा के लिए अविवाहित रहने का संकल्प लिया।

Munshi Chandrika Prasad

सेवा से त्यागपत्र देकर 1930 के नमक सत्याग्रह में खुलकर भाग लेने के कारण उन्हें जेल यात्रा भी करनी पड़ी। १९३०, ३१, ३२, ३३, ३४, ३८, ४०, ४१ और ४० कुल ९ बार जेल यात्रायें कीं। सभी राष्ट्रीय आंदोलन में बढ़ चढ़कर भाग लेने के कारण 7 साल से अधिक समय तक जेल के सींखचों के पीछे रहे। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भूमिगत रहकर कार्य करते रहे। ब्रिटिश हुकूमत ने उन पर ₹2000 का इनाम भी घोषित किया। अंततः गिरफ्तार कर लिए गए। 1938-39 में सुदौली रियासत के किसान अत्याचारों के विरुद्ध संघर्ष की कमान भी संभाली। महात्मा गांधी, पं जवाहर लाल नेहरू, बाबू सुभाष चंद्र बोस राजर्षि पुरुषोत्तम दास टण्डन, रफीअहमद किदवई, बाबू सम्पूर्णानन्द, पं कमलापति त्रिपाठी, श्री चन्द्रभानु गुप्ता, पं विश्वम्भर दयालु विपाठी आदि के आप घनिष्ठ संपर्क में भी रहे। इन राष्ट्रीय नेताओं का उनके यहाँ आना-जाना रहा।

शिक्षा अधूरी छूट जाने के बाद भी वह शिक्षा के प्रति समर्पित रहे और उन्होंने बछरावां कस्बे में श्री गांधी विद्यालय की स्थापना की। इसके बाद युवाओं की उच्च शिक्षा की व्यवस्था के लिए बछरावां डिग्री कॉलेज भी खोला। उनके जीवन का एकमात्र उद्देश्य था कि बछरावां क्षेत्र का हर लड़का-लड़की शिक्षित बने। बछरावां में ही उन्होंने गणेश शंकर विद्यार्थी पुस्तकालय भी स्थापित किया। बछरावां में ही उन्होंने माधव आश्रम स्थापित किया, जहां राम जानकी मंदिर और शिव मंदिर हैं। युवाओं के लिए उन्होंने व्यायाम शाला की भी शुरुआत की।

देश के आजाद होने के बाद कांग्रेस के टिकट पर 1957 में बछरावां विधानसभा क्षेत्र से विधायक चुने गए विधानसभा सदस्य होने के दौरान मिलने वाले वेतन और भत्ते विद्यालय को ही दान कर देते थे। वह जिला परिषद के सदस्य बछरावां नगर पंचायत के अध्यक्ष भी बने। 3 दिसंबर 1990 को गुरु जी ने अपने द्वारा स्थापित आश्रम में मंदिर के सामने ही अंतिम सांस ली।

बछरावां डिग्री कॉलेज में प्राचार्य रहते हुए डॉ राम नरेश जी ने महाविद्यालय परिसर में गुरु जी की आदमकद प्रतिमा स्थापित कराई। ऋषि कल्प नाम से अभिनंदन ग्रंथ निकाला और निधन पर पुण्य श्लोक नामक श्रद्धांजलि पुस्तक निकाली थी। जनपद में आज भी उनका नाम श्रद्धा से लिया जाता है।

  • गौरव अवस्थी
    9415034340

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