प्रेम करना जहां गुनाह है और बच्चे पैदा करना जुर्म-(कविता)

प्रेम
——-
प्रेम करना जहां गुनाह है
और बच्चे पैदा करना जुर्म
कितनी गर्म होगी वहां की हवा!
खिलने की कल्पना से ही
सिहर उठते होंगे फूल
कांपती होंगी कलियां;
दहशत कायम करने का सबसे सुगम उपाय है
लगाना हर तरह की अभिव्यक्ति पर लगाम
जड़ तत्व और तम गुण की पैदाइश
हुकूमत को मंजूर नहीं मुस्कान
आंखों में पानी; मगर मुहब्बत को चाहिए स्वतंत्रता
हर उस बंधन से जो करती है
मस्तिष्क को निश्चेतन
हृदय को भावनाहीन,
जैसे पक्षियों को विचरने के लिए चाहिए
सारा आकाश नहीं मंजूर उन्हें कोई बंधन
धरती उजाड़, बुलबुलों के चहकने से
उमड़ती हैं भावनाएं
जगती है मन में आस
जो नहीं मानतीं फरमान
वहशी हुक्म,जब घोर यातनाएं सहना
और सलाखों के पीछे जाना
लगता है आसान, महसूस होता है कैसा भी दंड कमजोर
तभी मन में जागता है संकल्प
और करता है कोई प्रेम।
-रणविजय सिंह सत्यकेतु-
हिंदुस्तान टाइम्स 
इलाहाबाद

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *