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राहुल गांधी को ये ‘कंजूसी’ न पड़ जाए भारी

Jitendra Kumar by Jitendra Kumar
05/01/23
in मुख्य खबर, राष्ट्रीय
राहुल गांधी को ये ‘कंजूसी’ न पड़ जाए भारी
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मनीष शर्मा। भारत जोड़ने के लिए सड़क पर उतरे कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी की मेहनत में अंतिम चरण की कंजूसी भारी चूक साबित हो सकती है। देश की राजनीति में बड़ा कद और भारी वजूद रखने वाले उत्तर प्रदेश के हिस्से में यात्रा के मात्र 130 किलोमीटर और राहुल के करीब 25 घंटे ही आए हैं। यात्रा गाजियाबाद से होकर बागपत के रास्ते शामली होते हरियाणा में प्रवेश कर जाएगी, लेकिन क्या यह तीन जिले दिल्ली की दूरी तय करने को काफी हैं? शायद, नहीं…! राजनीतिक विश्लेषकों के साथ-साथ अन्य राजनीतिक दलों का आकलन भी कुछ ऐसा ही है कि तीन जिले और 25 घंटों के बूते 75 जिलों की 80 लोकसभा सीटों की हसरत पूरी नहीं हो सकती।

राहुल गांधी ने नहीं किया रात्रि प्रवास
भारत जोड़ो यात्रा मंगलवार को गाजियाबाद से चली तो राहुल गांधी लोनी से ही दिल्ली लौट गए, जबकि मवीकलां में उनका रात्रि प्रवास था। ऐसा ही यात्रा के अगले दिन बुधवार को हुआ। शामली के एलम में रात्रि प्रवास का प्रस्तावित कार्यक्रम ऐनवक्त पर रद कर राहुल बड़ौत से दिल्ली रवाना हो गए। पश्चिमी उत्तर प्रदेश को सूबे की राजनीति की धड़कन माना और कहा जाता रहा है, लेकिन तीन जिलों में राहुल के टूटे-टूटे करीब 25 घंटे नाकाफी होने के संकेत दे रहे हैं। राहुल मंगलवार को गाजियाबाद में करीब ढाई घंटा, बुधवार को बागपत में करीब 12 घंटे रहे। गुरुवार को वह शामली के एलम से हरियाणा बार्डर तक का सफर करीब 10 घंटे में पूरा करेंगे। इसके साथ राहुल यात्रा के दौरान करीब 25 घंटे ही उप्र में बिताएंगे।

 

दंगों के बाद ऐसा रहा माहौल

जरा पीछे मुड़कर देखें तो 2013 में दंगे के बाद भाजपा के हाथ में सत्ता की चाबी सौंपने का आधार तैयार करने वाले मुजफ्फरनगर को भी मायूसी हाथ लगी। यहां याद दिलाना जरूरी है कि दंगे के एक सप्ताह बाद राहुल खुद अपनी मां सोनिया गांधी के साथ मुजफ्फरनगर पहुंचे थे। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को भी मुजफ्फरनगर का रुख करना पड़ा था। तब केंद्र में यूपीए की सरकार थी। इसके बाद वर्ष 2014 में हुए लोकसभा चुनाव में पासा पलटा और सत्ता में राजनीतिक बदलाव की धुरी मुजफ्फरनगर ही बना था।

रालोद मुखिया खुद कैंप किए रहे
राजनीतिक माइलेज के लिहाज से भाजपा और अन्य दलों के लिए मुजफ्फरनगर और मेरठ का महत्व इससे ही समझा जा सकता है कि हाल ही में हुए खतौली के विधानसभा उप चुनाव में भाजपा ने जहां अपने अहम चेहरों को मैदान में उतार रखा था, वहीं रालोद अध्यक्ष जयन्त चौधरी खुद कई दिन कैंप किए रहे। पश्चिम उत्तर प्रदेश की राजधानी कहे जाने वाले मेरठ को भी यात्रा से अछूता रखा गया। जबकि, राहुल के पिता समेत इनके अन्य पूर्वजों ने मेरठ को हमेशा तवज्जो दी।

अमेठी से लगातार जीत के बाद भाजपा से हारे थे राहुल गांधी
पश्चिम में पूर्वांचल का सहारा प्रदेश के 75 जिलों में से सिर्फ तीन जिलों में यात्रा निकालना सवाल इसलिए भी खड़ा करता है कि यूपी के जिन क्षेत्रों में कांग्रेस की थोड़ी बहुत मौजूदगी बची है, वह पूर्वांचल और अवध क्षेत्र में हैं। इनमें अमेठी, रायबरेली, फूलपुर, मिर्जापुर, प्रतापगढ़, बाराबंकी, प्रयागराज, डुमरियागंज, कुशीनगर, गोरखपुर, देवरिया, बांसगांव, फैजाबाद, बहराइच, श्रावस्ती, गोंडा, सिद्धार्थनगर, राजगंज, अंबेडकरनगर, बस्ती, संत कबीरनगर, आजमगढ़, घोषी, सलेमपुर, बलिया, जौनपुर, गाजीपुर, चंदौली, वाराणसी और भदोही सीट शामिल हैं। यात्रा में भी पूर्वांचल और अवध क्षेत्र के इन जिलों का सहारा लिया गया। यात्रा में शामिल बसों पर लगे इन जिलों के बैनर इसकी गवाही दे रहे हैं। बावजूद इसके यहां अभी अन्य दलों के नेता सांसद हैं। राहुल खुद अमेठी से लगातार जीतने के बावजूद भाजपा की समृति ईरानी से चुनाव हार गए थे।

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