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जयंती- पुण्यतिथि विशेष- शिक्षा के प्रति समर्पण से मिली ‘महात्मा’ और ‘महामना’ की पहचान 

Jitendra Kumar by Jitendra Kumar
28/12/22
in मुख्य खबर, राष्ट्रीय, साहित्य
जयंती- पुण्यतिथि विशेष- शिक्षा के प्रति समर्पण से मिली ‘महात्मा’ और ‘महामना’ की पहचान 
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गौरव अवस्थी


भारत में शिक्षा की दृष्टि से दिसंबर माह की 2 तारीखों (23 और 25 ) का अपना अलग ही महत्त्व है। 23 दिसंबर शिक्षा खासकर स्त्री शिक्षा के लिए देशभर में आर्य कन्या विद्यालय की स्थापना को आंदोलन का रूप देने वाले स्वामी श्रद्धानंद के बलिदान से जुड़ी है और 25 दिसंबर काशी हिंदू विश्वविद्यालय स्थापित करने वाले महामना मदन मोहन मालवीय की जयंती के लिए प्रसिद्ध। भारतीय समाज में इन दोनों ही शिक्षाविदों के प्रति आज भी सम्मान का भाव स्वयमेव जागृत रहता है। अपने इस परमार्थ कार्य के लिए आर्य समाजी संत मुंशीराम को ‘महात्मा’ की उपाधि मिली और मदन मोहन मालवीय को ‘महामना’ की। सन्यास धारण करते समय महात्मा की पदवी त्याग कर मुंशीराम ने अपना नाम श्रद्धानंद रख लिया।

एक की जन्मभूमि जालंधर है तो दूसरे की प्रयागराज। स्वामी श्रद्धानंद का जन्म वर्ष 1856 में जालंधर के तलवण गांव में हुआ और महामना का 1861 में प्रयागराज में। गुरुकुल कांगड़ी की स्थापना के बाद सन्यास ग्रहण कर दिल्ली में शुद्धि आंदोलन का सूत्रपात करने वाले स्वामी श्रद्धानंद 23 दिसंबर 1926 को शहीद हो गए। एक सिरफिरे मुस्लिम युवक ने रोगग्रस्त स्वामी श्रद्धानंद को सीने में तीन गोलियां मार कर सदा सर्वदा के लिए हम सब से जुदा कर दिया। महामना ने 12 नवंबर 1946 को इस दुनिया से विदा ली।

गुलाम भारत में शिक्षा के लिए समर्पित दोनों ही महापुरुषों का जीवन अतुलनीय-अनुकरणीय है। दोनों के रास्ते भिन्न थे पर उद्देश्य एक। स्वामी श्रद्धानंद महर्षि दयानंद सरस्वती से प्रेरित थे तो महामना स्वप्रेरित। दोनों ही महापुरुषों ने गुलामी के दौर में भारतीय समाज को शिक्षित करने के लिए अपनी-अपनी तरह से प्रयास किए। स्वामी श्रद्धानंद का प्रयास 1898 और महामना का प्रयास 1904 से शुरू हुआ। यानी जन्म समय का अंतर उनके इन प्रयासों में भी साथ-साथ चलता रहा। इन प्रयासों के फलस्वरूप ही देश को गुरुकुल कांगड़ी और काशी हिंदू विश्वविद्यालय जैसी प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थाएं न केवल प्राप्त हुई‌ बल्कि भारतीय समाज खासकर हिंदू पढ़ लिख कर जागृत भी हुए और प्रगति पथ पर अग्रसर भी।

दोनों संस्थाओं के इतिहास बताते हैं कि गुरुकुल कांगड़ी और काशी हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना में कुछ समानताएं हैं तो कई भिन्नताएं। पहले चर्चा समानताओं की। काशी हिंदू विश्वविद्यालय के लिए 1300 एकड़ भूमि दान में मिली तो गुरुकुल कांगड़ी को 1200 बीघे। काशी नरेश महाराज प्रभु नारायण सिंह ने काशी हिंदू विश्वविद्यालय के लिए और नजीबाबाद में रहने वाले धर्मनिष्ठ रईस अमीन चौधरी और मुंशी अमन सिंह ने 1200 का अपना कांगड़ी ग्राम गुरुकुल के लिए दान कर दिया। दोनों ही संस्थाओं को समय-असमय पतित पावनी गंगा की बाढ़ का सामना करना पड़ा। गंगा में बाढ़ की वजह से काशी हिंदू विश्वविद्यालय का शिलान्यास पूजन स्थल ही बदलना पड़ा था वहीं गुरुकुल कांगड़ी को गंगा की भीषण बाढ़ के चलते अपना स्थान ही पूर्व से पश्चिम की तरफ खिसकाना पड़ा। यह भी समान ही है कि शिक्षा को समर्पित दोनों ही महापुरुषों ने समाज के सामने हाथ पसारे। दोनों ही संस्थाएं प्रमुख त्योहारों पर ही अस्तित्व में आईं। कांगड़ी में गुरुकुल होली के दिन (4 मार्च 1902) खुला और काशी हिंदू विश्वविद्यालय की वसंत पंचमी (14 जनवरी 1916) को शिला पूजी गई।

अब बात भिन्नता की। काशी हिंदू विश्वविद्यालय का सपना पूरा करने में महामना के साथ राजा-महाराजा और ब्रिटिश गवर्नर थे और गुरुकुल की स्थापना का स्वामी श्रद्धानंद का सपना आमजनों एवं आर्य समाजियों के भरपूर सहयोग से पूरा हुआ। महामना विश्वविद्यालय के लिए राजाओं के दरबारों में गए। ब्रिटिश गवर्नरों से मिले। हैदराबाद के निजाम का महामना को दान में ‘जूती’ देने का किस्सा आम ही है। यह भी ऐतिहासिक तथ्य है कि जनवरी 1909 में कुंभ मेले में देशभर से आए लोगों के बीच महामना ने काशी हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना का संकल्प दोहराया। एक वृद्धा ने महामना को एक पैसा देकर दान की शुरुआत की। कहते हैं कि वृद्धा का यह आशीर्वाद रूपी दान ही महामना को ‘बड़ों’ तक ले गया।

दूसरी तरफ स्वामी श्रद्धानंद गांव-गांव और नगर-नगर गले में शिक्षा के लिए भिक्षा की झोली बांधकर घूमे। जिसने जो दिया उसे स्वीकार करते हुए स्वामी श्रद्धानंद तब तक घर छोड़कर विभिन्न राज्यों का भ्रमण करते रहे जब तक गुरुकुल की स्थापना के लिए पर्याप्त धनराशि एकत्र नहीं हो गई। स्वामी श्रद्धानंद ने जालंधर की अपनी 30 हजार कीमत की कोठी गुरुकुल को दान में दी। हिंदुओं के हितार्थ शुरू किए गए ‘सदधर्म प्रचारक’ समाचार पत्र का प्रेस और अपना पूरा पुस्तकालय भी उन्होंने गुरुकुल कांगड़ी को दान में दे दिया।

अंग्रेज हुकूमत काशी हिंदू विश्वविद्यालय पर मेहरबान थी। काशी हिंदू विश्वविद्यालय के शिलान्यास अवसर पर कई ब्रिटिश गवर्नर और राजा, महाराजा, सामंत गवर्नर जनरल वायसराय के स्वागत और महामना के सहयोग के लिए उपस्थित थे। 13 दिसंबर 1921 को प्रिंस ऑफ वेल्स ने विश्वविद्यालय का औपचारिक उद्घाटन किया वहीं आरंभ से ही सरकार के प्रभाव से स्वतंत्र रहने वाली गुरुकुल कांगड़ी को ब्रिटिश हुकूमत चिरकाल तक राजद्रोही संस्था मानती रही। अंग्रेज हुकूमत मानती थी कि गुरुकुल प्रयत्न पूर्वक ऐसे राजनीतिक सन्यासियों का दल तैयार कर रहा है, जिसका उद्देश्य हुकूमत के सामने हिंदुस्तान में भयानक संकट पैदा करना है।

इंग्लैंड के तत्कालीन प्रधानमंत्री मिस्टर रेम्जे मैकडॉनल्ड ने ब्रिटेन में प्रकाशित होने वाले समाचार पत्र ‘डेली क्रॉनिकल’ पत्र में गुरुकुल के खिलाफ एक लेख भी लिखा। इस लेख में ब्रिटिश हुकूमत के गुप्तचर विभाग की उस रिपोर्ट का भी हवाला दिया गया, जिसमें कहा गया था-‘गुरुकुल की दीवारों पर ऐसे चित्र लगे हैं जिसमें अंग्रेजी राज से पहले के भारत की स्थिति को तथा अंग्रेजों के कोलकाता आने की स्थिति को दिखलाया गया है। 1857 ईसवी के लखनऊ के राज विद्रोह के चित्र भी गुरुकुल में लगाए गए हैं। बिजनौर के जिला मजिस्ट्रेट मिस्टर एफ. फोर्ड का वह बड़ा चित्र भी गुरुकुल में लगा है, जिसमें वह अंग्रेजों के खिलाफ सेना का संचालन कर रहा है..’

ब्रिटिश हुकूमत की इसी दृष्टि के चलते गुरुकुल कांगड़ी को सरकारी तौर पर विश्वविद्यालय का दर्जा प्राप्त नहीं हो पाया। आजादी के बाद 1962 में गुरुकुल कांगड़ी को डीम्ड यूनिवर्सिटी का दर्जा मिला। गुरुकुल कांगड़ी के हिस्से में ही यह उपलब्धि दर्ज है कि हिंदी माध्यम से उच्च शिक्षा और वैज्ञानिक विषयों के अध्ययन अध्यापन यहां ही पहले पहल प्रारंभ हुआ। यहां के अध्यापक और प्राध्यापकों ने विज्ञान विषयों की 17 पुस्तकों का हिंदी में प्रथम बार प्रणयन किया। इसी से शिक्षा के क्षेत्र में में गुरुकुल कांगड़ी का योगदान काशी हिंदू विश्वविद्यालय से अधिक माना या बताया जाता है।

यह भी ऐतिहासिक तथ्य है कि महात्मा गांधी का दोनों ही शिक्षण संस्थाओं में पधारना हुआ। 14 जनवरी 1916 को काशी हिंदू विश्वविद्यालय के शिलान्यास अवसर पर महात्मा गांधी को भी आमंत्रित किया गया था। इस अवसर पर उन्होंने अपना ऐतिहासिक भाषण देकर ब्रिटिश सरकार और ब्रिटिश सरकार की उपाधियों एवं हीरे जवाहरात से लदे राजा-महाराजा की तीव्र भर्त्सना की थी। दूसरी तरफ वर्ष 1913 में कुंभ के मौके पर हरिद्वार आए महात्मा गांधी गुरुकुल गए और महात्मा मुंशीराम (स्वामी श्रद्धानंद इसी नाम से जाने जाते थे) के पैर छूकर उन्हें सम्मान दिया था। महात्मा गांधी के दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटने के फैसले के पहले दक्षिण अफ्रीका के फीनिक्स स्थित सत्याग्रह आश्रम के विद्यार्थी भारत भेज दिए गए थे। भारत में इन छात्रों को सर्वप्रथम गुरुकुल कांगड़ी में ही ठहराया गया था। माना तो यह भी जाता है कि मोहनदास करमचंद गांधी को सबसे पहले गुरुकुल के एक कार्यक्रम में दिए गए मानपत्र के माध्यम से ही ‘महात्मा’ का संबोधन दिया गया था। इसके बाद भी महात्मा मुंशीराम (स्वामी श्रद्धानंद) की हत्या करने वाले सिरफिरे मुस्लिम युवक अब्दुल रशीद को महात्मा गांधी ने निर्दोष साबित करने की कोशिश की थी । उन्होंने यह कोशिश क्यों की, यह आज तक रहस्य है। यह अलग बात है कि सिरफिरे युवक को स्वामी श्रद्धानंद की हत्या में अंततः: सजा सुनाई गई।

इतिहास के अनेक तथ्यों के आधार पर कहा जा सकता है कि मातृभाषा हिंदी के माध्यम से गुरुकुल में शिक्षा की व्यवस्था देने वाले स्वामी श्रद्धानंद का संघर्ष और संकल्प एक मायने में महामना से कहीं से भी कम नहीं था। एक तरह से बड़ा ही था पर समाज (गुलाम और आजाद भारत दोनों) में मान-प्रतिष्ठा महामना के काशी हिंदू विश्वविद्यालय को ही अधिक मिली। यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि इस आलेख का मंतव्य किसी के काम को कमतर आंकना या बड़ा बताना नहीं है। केवल इतिहास में दर्ज तथ्यों को प्रकट करके दोनों ही महापुरुषों को उनके अपने काम के माध्यम से याद करने की एक कोशिश भर की गई है। आकलन की जिम्मेदारी आप पर।

शिक्षा क्षेत्र के दोनों ही महापुरुषों को शत-शत नमन

 

 

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