कार्यक्रम के समापन सत्र में बतौर मुख्य अतिथि प्रोफेसर प्रेमचन्द्र शास्त्री उपाध्यक्ष उत्तराखण्ड संस्कृत अकादमी ने एस.सी.ई.आर.टी. द्वारा आयोजित इस संगोष्ठी की सराहना करते हुए कहा कि यह संस्कृत विषय को आगे बढ़ाने में मील का पत्थर साबित होगा। उन्होंने संस्कृत में निहित वैज्ञानिकता को नई पीढ़ी तक पहुंचाये जाने पर बल दिया। समापन सत्र में विशिष्ट अतिथि के रूप में प्रान्तीय संगठन मन्त्री संस्कृत भारती योगेश विद्यार्थी ने कहा संस्कृत विश्व की प्राचीनतम वैज्ञानिक भाषा है। आधुनिक युग के संसाधनों का प्रयोग करते हुए इसका प्रचार प्रसार विश्व पटल पर किया जाना चाहिये।
समापन सत्र की अध्यक्षता करते हुए आर.के. कुँवर निदेशक अकादमिक शोध एवं प्रशिक्षण उत्तराखण्ड ने कहा कि नई शिक्षा नीति के अन्तर्गत प्रत्येक विषय के राज्य की पाठ्यचर्या में ज्ञान परम्परा के अन्तर्गत प्राचीन ग्रन्थों में निहित ज्ञान को पाठ्यचर्या का हिस्सा बनाये जाने की बात कही गयी है। इस दिशा में यह कार्यशाला अपने उद्देश्यों को पूर्ण करने में सफल सिद्ध होगी। इस अवसर पर प्रदीप रावत विभागाध्यक्ष पाठ्यक्रम एवं अनुसंधान विभाग ने संगोष्ठी में मौजूद सभी विद्वानों को धन्यवाद देते हुए कहा कि परिषद द्वारा समय-समय पर इस प्रकार की संगोष्ठियां आयोजित की जायेंगी। उन्होंने प्रसन्नता व्यक्त की कि इस संगोष्ठी में विज्ञान विषय के शिक्षकों के द्वारा भी संस्कृत साहित्य का अध्ययन कर उनमें निहित वैज्ञानिकता का विश्लेषण किया गया।
संगोष्ठी के अन्तिम दिन विशेषज्ञों के द्वारा पाँच सत्रों में शोध पत्र प्रस्तुत किये गये। प्रथम सत्र में संस्कृत साहित्य में चिकित्सा विज्ञान और आयुर्वेद विषय पर राजेन्द्र चन्द्र पाण्डे, मोती प्रसाद साहू तथा डॉ. राजेश चन्द्र पाण्डे ने शोध पत्र प्रस्तुत किये। इस सत्र की अध्यक्षता डॉ. ममता त्रिपाठी असिस्टेण्ट प्रोफेसर गार्गी कॉलेज दिल्ली विश्वविद्यालय ने की तथा सत्र का संचालन रोशन गौड़ के द्वारा किया गया।नेशनल फ्रंटियर, राष्ट्रहित की आवाज उठाने वाली प्रमुख वेबसाइट है।
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