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महिलाओं को आरक्षण अब नहीं तो कब!

Jitendra Kumar by Jitendra Kumar
08/03/23
in मुख्य खबर, राष्ट्रीय
महिलाओं को आरक्षण अब नहीं तो कब!
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के. कविता


लोकसभा और विधानसभा में महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण अब नहीं तो कब? इस सवाल का जवाब शायद मौजूदा सत्ताधारी गठबंधन की ओर से मिल सकता है, क्योंकि लोकसभा में न सिर्फ NDA निर्णायक बहुमत में है, बल्कि सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी समेत अधिकांश छोटे-बड़े राजनीतिक दल भी महिला आरक्षण के समर्थन में हैं। महिला आरक्षण के लिए संविधान संशोधन बिल लाए बिना संसद और विधानसभाओं में महिलाओं का समुचित प्रतिनिधित्व संभव नहीं हो सकता।

पहली बार महिला आरक्षण बिल 1996 में तत्कालीन प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा की सरकार के दौरान आया था। बाद में 1998, 1999 और 2008 में भी यह बिल पेश किया गया। 2008 में इस विधेयक को राज्यसभा में पेश किया गया, जहां से उसे स्थायी समिति में भेजा गया था। 2010 में उच्च सदन ने इसे पारित कर दिया था। उसके बाद इसे लोकसभा को भेज दिया गया। हालांकि यह विधेयक 2014 में 15वीं लोकसभा की समाप्ति के साथ ही खत्म हो गया। इस मुद्दे पर 4 समितियां बनाई गईं लेकिन उनकी रिपोर्ट पर कभी कोई कार्रवाई नहीं हुई। 2010 में राज्यसभा में पारित होने पर लोकसभा में अगर बीजेपी इस बिल का समर्थन कर देती तो अब तक यह कानून बन चुका होता।

NDA की प्रचंड बहुमत वाली केंद्र सरकार ने 9 दिसंबर को लोकसभा में एक सवाल के जवाब में आंकड़े देकर बताया कि आंध्र प्रदेश, असम, गोवा, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, केरल, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, मणिपुर, ओडिशा, सिक्किम, तमिलनाडु और तेलंगाना में 10 फीसदी से भी कम महिला विधायक हैं। हाल ही में हुए गुजरात विधानसभा चुनाव में केवल 8.2 प्रतिशत महिलाएं विधायक बन सकी हैं, जबकि हिमाचल प्रदेश में इस बार केवल एक महिला विधायक बनी हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 17वीं लोकसभा में महिला सांसदों की हिस्सेदारी 14.94 प्रतिशत और राज्यसभा में 14.05 प्रतिशत है जबकि राजनीति में महिलाओं की भागीदारी का वैश्विक औसत 25.5 फीसदी है। तस्वीर साफ है कि देश की आधी आबादी का प्रतिनिधित्व महज 14-15 प्रतिशत ही है।

ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट 2021 के अनुसार, राजनीतिक सशक्तीकरण सूचकांक में भारत के प्रदर्शन में गिरावट आई है और महिला मंत्रियों की संख्या वर्ष 2019 के 23.1 फीसदी से घटकर वर्ष 2021 में 9.1 फीसदी तक पहुंच गई है। भारत में लैंगिक समानता की खाई इतनी चौड़ी है कि अगर इस सत्र में महिला आरक्षण लागू होता है तो भी वर्ष 2063 तक हम लैंगिक समानता का लक्ष्य हासिल कर पाएंगे। तेलंगाना सरकार ने विधानसभा में एक प्रस्ताव पारित किया है, जिसमें कहा गया है कि जब भी लोकसभा महिला आरक्षण विधेयक को पारित करेगी, बीआरएस इसका पूर्ण समर्थन करेगी। इसके अलावा तेलंगाना की बीआरएस सरकार ने स्थानीय निकाय चुनावों में महिलाओं के लिए 50 फीसदी आरक्षण देकर भारत का ऐसा पहला राज्य बनने का गौरव हासिल किया है।

करीब 13 लाख महिला प्रतिनिधि पंचायतों और शहरों के स्थानीय निकायों में चुनकर आई हैं। यह अपने आप में महिला सशक्तीकरण की दिशा में क्रांतिकारी कदम है। शुरुआत में तो लोगों ने बहस उठाई कि ये महिलाएं ‘बीवी ब्रिगेड’ बनकर रह जाएंगी, लेकिन यह आशंका लंबे समय तक नहीं टिक पाई। विभिन्न सर्वेक्षणों से संकेत मिलता है कि पंचायती राज संस्थानों में महिला प्रतिनिधियों ने गांवों में समाज के विकास और समग्र कल्याण में सराहनीय कार्य किया है। उनमें से कई पंचायतों से आगे विधानसभा और लोकसभा स्तर पर भी बढ़िया काम कर सकती हैं।

अब समय आ गया है कि राजनीतिक दलों को अपने आंतरिक ढांचे में भी महिलाओं के लिए पर्याप्त जगह बनाकर अपनी प्रतिबद्धता दिखानी चाहिए। महिला आरक्षण विधेयक सदियों से जारी महिला उत्पीड़न को रोकने के लिए भी एक कारगर औजार साबित होगा। सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस जेके माहेश्वरी की बेंच ने भी इस मुद्दे पर दाखिल याचिका में महिला आरक्षण को ‘काफी महत्व का मुद्दा’ माना है। हमारा संकल्प है कि संसद के मौजूदा सत्र में महिला आरक्षण विधेयक पेश कर उसे पारित करने की मांग के साथ भारत जागृति फाउंडेशन के बैनर तले दिल्ली के जंतर-मंतर से संघर्ष की शुरुआत करेंगे।


(लेखिका तेलंगाना विधानसभा में MLC हैं)

 

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