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समलैंगिकता पर RSS के रुख और मोहन भागवत के बयान के मायने

Jitendra Kumar by Jitendra Kumar
15/01/23
in मुख्य खबर, राष्ट्रीय
समलैंगिकता पर RSS के रुख और मोहन भागवत के बयान के मायने
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मगध के सम्राट जरासंध के दोनों सेनापति हंस और दिंभक क्या समलैंगिक थे? समलैंगिकता को लेकर दुनियाभर में छिड़ी बहस के बीच आरएसएस का हमेशा से अलग रुख रहा है. जिस समुदाय को समाज में घृणा के नजरिए से देखा जाता है, उनके प्रति संघ प्रमुख मोहन भागवत के हालिया बयान का मतलब हमदर्दी है या फिर इसमें कुछ और संदेश छिपा है?

संघ प्रमुख ने कहा कि उन्हें भी समाज का हिस्सा माना जाना चाहिए. यह भारत के लिए यह कोई नया नहीं है. LGBTQ भी बायोलॉजिकल है और यह उनके जीवन जीने का एक तरीका है.आरएसएस चीफ ने महाभारत काल के दो योद्धाओं का उदाहरण देते हुए यह बताने की कोशिश की कि इस तरह के संबंध हमारे देश में कोई नई बात नहीं है. उन्होंने जरासंध के दो सेनापति हंस और दिंभक का जिक्र किया. पहले महाभारत का वह प्रसंग जान लीजिए.

हिंदू धर्मग्रंथ महाभारत का श्लोक है-

“हता हंस इति प्रोक्तमथ केनापि भारत| तत्छुत्वा डिंभको राजन् यमुनाम्भस्यमज्जत||
बिना हंसेन लोकेस्मिन नाहं जीवितुमुत्सहे| इत्येतां मतिमास्थाय दिंभको निधनं गतः||”

इस श्लोक में वही प्रसंग है, जिसका जिक्र आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने समलैंगिकता के संदर्भ में किया है. LGBTQ समुदाय के प्रति भागवत का बयान समलैंगिकों के प्रति संघ की हमदर्दी और मानवता की ओर इशारा करता है.

महाभारत के इस श्लोक में बताया गया है कि किसी सैनिक ने चिल्लाकर कहा- हंस मारा गया है. यह सुनकर दिंभक भी उसे मरा हुआ जान यमुना में कूद कर जान दे देता है. दिंभक कहता है कि हंस के बिना मैं संसार में जीवित नहीं रह सकता और आत्महत्या कर लेता है. अपने दोनों सेनापतियों के बारे में ऐसा सुनकर जरासंध भी हताश होकर अपने नगर लौट जाता है.

कौन थे हंस-दिंभक और क्या है कहानी?
द्वापर युग में मगध के राजा थे- जरासंध, जो मथुरा नरेश कंस के ससुर थे. कृष्ण द्वारा कंस के वध के बाद जरासंध ने मथुरा पर 17 बार आक्रमण किया. हंस और दिंभक जरासंध के सेनापति थे. दोनों जरासंध के राइट हैंड थे. जरासंध को कमजोर करने के लिए दोनों सेनापतियों को छीनना जरूरी था. इसके बाद जो हुआ, वो आप ऊपर पढ़ चुके हैं.

बाद में मल्लयुद्ध में भीम ने जरासंध का वध किया था. और फिर श्रीकृष्ण ने जरासंध के बंदी बनाए गए राजाओं को मुक्त कर उसके बेटे को राजा बना दिया. मोहन भागवत ने जरासंध के सेनापतियों का जिक्र करते हुए कहा, “जब भगवान श्रीकृष्ण ने अफवाह फैला दी कि हंस युद्ध में मारा गया है तो दिंभक ने यमुना नदी में कूदकर जान दे दी. दोनों ही सेनापति बहुत करीब थे. उन्होंने कहा, ऐसी प्रवत्ति के लोग जब से मनुष्य सभ्यता है तब से अस्तित्व में हैं.”

संघ प्रमुख के बयान के क्या मायने हैं?
पांचजन्य को दिए गए साक्षात्कार में मोहन भागवत के इस बयान के अलग-अलग मायने निकाले जा रहे हैं. कोई इसे समलैंगिक समुदायों के प्रति हमदर्दी के तौर पर देख रहा है तो कोई इसे मानवता और इंसानियत से जोड़ कर देख रहा है.

संघ के ग्रेटर नोएडा प्रचार प्रमुख राकेश सिंह कहते हैं कि संघ शुरुआत से ही समाज के हर वर्ग को जोड़ रहा है. संघ प्रमुख के बयान के पीछे का संदेश कितना व्यापक है, यह कहना तो मुश्किल है, लेकिन इतना तय है कि वो इस वर्ग से जुड़े लोगों से घृणा नहीं करने का संदेश दे रहे हैं.

राकेश सिंह कहते हैं कि हमारी सनातनी संस्कृति किसी भी वर्ग-समुदाय से घृणा करने का संदेश नहीं देती. संघ छोटे से छोटे वर्ग को जोड़कर रखना चाहता है, ताकि समाज में सम्मान के साथ उनका जीवन सुनिश्चित रहे. वो कहते हैं, “मेरा विचार है कि समलैंगिकता को बढ़ावा न दिया जाए, लेकिन उनसे नफरत भी न की जाए. उन्हें भी समाज का हिस्सा समझा जाए.”

संघ से ही जुड़े मीडिया शिक्षक डॉ निरंजन कुमार कहते हैं कि आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत का बयान समलैंगिकों के प्रति संघ की हमदर्दी और मानवता की ओर इशारा करता है. जिस LGBTQ समुदाय से समाज घृणा करता है, संघ प्रमुख उनके प्रति हमदर्दी की अपील करते हैं तो यह बड़ी बात है. इससे समाज में एक अच्छा संदेश जाएगा.

क्या सच में समलैंगिक थे हंस और दिंभक?
हंस और दिंभक समलैंगिक थे या नहीं, इस पर कोई ठोस जानकारी नहीं है. लेकिन वेदव्यास रचित महाभारत में उन दोनों के काफी करीबी होने का उल्लेख है. जानकार बताते हैं कि उन दोनों के बीच दोस्ती से कुछ ज्यादा था. महाभारत में सभापर्व के 14वें अध्याय में जरासंध और उनके सेनापति हंस और दिंभक का जिक्र आता है, जिस भाग का एक श्लोक आपने ऊपर पढ़ा.

महाभारत में भगवान कृष्ण भी युधिष्ठिर से उन दोनों की बहादुरी की चर्चा करते हुए कहते हैं कि अगर वे दोनों जिंदा होते तो जरासंध तीनों लोकों को हरा सकता था. केवल मैं ही नहीं कह रहा, बल्कि तमाम राजा यह बात मानते थे.

श्रीकृष्ण और जरासंध के बीच 17वें युद्ध के समय बलराम को जरासंध का सेनापति कड़ी चुनौती दे रहा था. इस बीच सैनिकों ने कृष्ण के इशारे पर अफवाह फैलाई कि हंस का वध हो गया है. यह सुनकर दिंभक को इतना दुख हुआ कि उसने यमुना में कूदकर आत्महत्या कर ली. हालांकि उन दोनों के समलैंगिक संबंधों के बारे में स्पष्ट पुष्टि नहीं है.

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