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क्या पर्यावरण की कीमत पर सौर ऊर्जा का विकास होना चाहिए?

Jitendra Kumar by Jitendra Kumar
02/06/23
in मुख्य खबर, राष्ट्रीय
क्या पर्यावरण की कीमत पर सौर ऊर्जा का विकास होना चाहिए?
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अमरपाल सिंह वर्मा 


बिजली की जरूरत लगातार बढ़ रही है. इस जरूरत को पूरा करने के लिए विश्व भर में पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों से निर्भरता करने पर जोर दिया जा रहा है. नवीन ऊर्जा स्रोतों पर पूरी दुनिया का ध्यान है. इन नए स्रोतों में सौर ऊर्जा प्रमुख है. हाल के कुछ सालों में राजस्थान सौर ऊर्जा उत्पादन का केन्द्र बनता जा रहा है. राज्य के जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर और जोधपुर जिलों में सौ ऊर्जा के विशाल प्लांट लग रहे हैं. कहा जा रहा है कि यह विशाल प्लांट भविष्य की जरूरत के मुताबिक बिजली उत्पादन करेंगे लेकिन इसी के साथ सौर ऊर्जा की वजह से पर्यावरण को नुकसान होने के कारण चिंताएं जताई जा रही हैं. राजस्थान में सौर ऊर्जा प्लांटों के लिए पेड़ों की अंधाधुंध कटाई, जलस्रोतों के सूखने, पक्षी, कीट-पतंगे कम होने पर पर्यावरण विद् फिक्रमंद हैं. सवाल किया जा रहा है कि क्या सौर ऊर्जा का विकास पर्यावरण की कीमत पर होना चाहिए?

सरकारों की नीतियां नवीन ऊर्जा स्रोतों को बढ़ावा देने के पक्ष में हैं. केन्द्र और सभी राज्यों की सरकारें न केवल बड़ी कंपनियों को सोलर प्लांट लगाने के लिए अधिकाधिक सुविधाएं दे रही हैं, बल्कि आम लोगों को भी सौर ऊर्जा का इस्तेमाल करने के लिए प्रेरित किया जा रहा है. सौर ऊर्जा ऐसा माध्यम है, जिससे पर्यावरण को नुकसान नहीं होने की बात कही जाती है. माना जाता है कि कोयले, परमाणु और गैस से जो बिजली बनती है, उससे प्रदूषण होता है. सौर ऊर्जा को अपना कर हम इस प्रदूषण से बच सकते हैं. ऐसे में राजस्थान में सौर ऊर्जा स्रोतों के कारण पर्यावरण को नुकसान का सवाल क्यों उठ रहा है, इस पर विचार किए जाने की आवश्यकता है. लेकिन इससे पहले हम जान लेते हैं कि देश में सबसे ज्यादा सौर ऊर्जा प्लांट राजस्थान में क्यों लग रहे हैं?

राजस्थान में साल के 365 में से 325 दिनों में पर्याप्त धूप उपलब्ध रहती है. कुदरत का यह आशीर्वाद अन्ये राज्यों को नहीं मिला है. राजस्थान मेंं गर्मियों में दिन का पारा 50 डिग्री के नजदीक पहुंच जाता है. पश्चिमी राजस्थान में सौर ऊर्जा प्लांटों के लिए सरकारी और निजी भूमि भी बहुतायत में उपलब्ध है. जो भी कंपनी सौर प्लांट लगाना चाहती है, उसे जमीन आसानी से मिल जाती है. मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की पहल पर राज्य सरकार ने कई नीतिगत बदलाव किए हैं, जिससे राजस्थान सौर ऊर्जा को गति मिली है. गहलोत सरकार ने राजस्थान को सौर ऊर्जा का हब बनाने के लिए नई सौर ऊर्जा नीति 2019 जारी की.

इसके अलावा राजस्थान निवेश प्रोत्साहन स्कीम-2019 (रिप्स) में इस क्षेत्र के लिए विशेष प्रावधान भी किए गए. सरकार की उदार नीति के प्रभाव से राज्य में स्थापित सौर ऊर्जा क्षमता में राजस्थान देश में पहले स्थान पर आ चुका है. भारत सरकार के नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (एमएनआरई) की ओर से वर्ष 2021 में जारी एक रिपोर्ट के अनुसार राज्य की कुल स्थापित सौर ऊर्जा क्षमता 7,738 मेगावाट की है. राजस्थान 7737.95 मेगावाट सौर ऊर्जा की स्थापित क्षमता के साथ कर्नाटक को पीछे छोड़ते हुए देश में पहले पायदान पर आ गया है. गुजरात 5708 मेगावाट क्षमता के साथ तीसरे, तमिलनाडु 4675 मेगावाट क्षमता के साथ चौथे तथा आंध्र प्रदेश 4380 मेगावाट के साथ पांचवे स्थान पर है. एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार राजस्थान ने अब तक 16000 मेगावाट से ज्यादा प्रतिदिन सौर ऊर्जा क्षमता हासिल कर ली है. एक हजार मेगावाट का मतलब एक गीगावाट होता है.

राज्य की भौगोलिक स्थिति सौर ऊर्जा उत्पादन की दृष्टि से बेहद अनुकूल है, जिसके दृष्टिगत प्रदेश में 142 गीगावाट सौर ऊर्जा उत्पादन का आकलन किया गया है. इस लक्ष्य को हासिल करने की दिशा में राज्य सरकार ने कारगर योजना बनाकर प्रभावी कदम उठाए हैं. इस योजना के तहत वर्ष 2024-25 तक 30 गीगावाट सौर ऊर्जा उत्पादन का लक्ष्य निर्धारित किया गया है. 2245 मेगावाट क्षमता वाला दुनिया का सबसे बड़ा सोलर पार्क जोधपुर के भड़ला में 14 हजार एकड़ (करीब 50 हजार वर्ग किमी) में स्थापित किया गया है. इस पार्क में नौ सौ कंपनियां सोलर प्लांट लगाने की ख्वाहिशमंद हैं और 18 बड़ी कंपनियां 36 सोलर प्लांट स्थापित कर चुकी हैं. इसी प्रकार जैसलमेर के नोख मेंं 925 मेगावाट का सोलर पार्क, फलोदी-पोकरण में 750 मेगावाट क्षमता वाला सोलर पार्क बना है. सूर्य की रोशनी से बिजली उत्पादन कर रहे हैं. इसके अलावा जोधपुर में 3150, जैसलमेर में 4435, बाड़मेर में 3150, बीकानेर में 2100 और जालोर में 2000 मेगावाट के सोलर प्लांट लगे हुए हैं.

सोलर प्लांट लगाकर कंपनियां मोटी कमाई कर रही हैं. अपनी जमीनें लीज पर देकर किसान भी पैसा कमा रहे हैं. यह भी दावा है कि जब राजस्थान मेंं सौर ऊर्जा से 142 गीगावाट सौर ऊर्जा उत्पादन लक्ष्य अर्जित कर लिया जाएगा तो देश का ऊर्जा परिदृश्य ही परिवर्तित हो जाएगा लेकिन बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या इस विकास की कीमत हमें पर्यावरण संकट के रूप में चुकानी पड़ेगी? राजस्थान में सौर ऊर्जा प्लांटों के कारण पर्यावरण को नुकसान की बात बार-बार उठ रही है. सौर ऊर्जा के लिए प्रदेश के जलस्रोत सूखने की बात भी सामने आ रही है. एक ताजा मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक ग्रीन एनर्जी के नाम पर प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन हो रहा है. इन प्लांट को साफ और ठंडा रखने के लिए पानी की जरूरत होती है. सौर प्लांटों में हर सप्ताह 4 करोड़ लीटर पानी खर्च हो रहा है.

इस पानी से तीन लाख लोगों की रोजाना प्यास बुझ सकती है. पानी का अंधाधुंध इस्तेमाल होने से प्रदेश के कई इलाकों के प्राकृतिक जलस्रोत सूख गए हैं. सौर प्लांट लगाने के लिए भूमि पर खड़े लाखों खेजड़ी, रोहिड़ा के पेड़ काटे जा रहे हैं. जिससे वहां का तापमान भी बढ़ गया है. कीट-पतंगों, मधुमक्खी, तितली के अस्तित्व पर संकट पैदा हो गया है. पिछले साल जोधपुर जिले में सोलर प्लांट लगाने के लिए बड़ी संख्या में खेजड़ी के पेड़ काटकर जमीन में दफन कर दिए गए. बिश्नोई समाज ने इसके खिलाफ आंदोलन किया और मामले को नेशनल ग्रीन टिब्यूनल में ले गए. ट्रिब्यूनल ने न केवल कंपनी पर दो लाख रुपये जुर्माना ठोका बल्कि यह आदेश भी दिया कि वह काटे गए पेड़ों के बदले में दो हजार पेड़ लगाए.

सोलर प्लांटों के कारण पर्यावरण को जो नुकसान हो रहा है, उसकी पुष्टि बिट्स रांची और महाराज गंगा सिंह यूनिवर्सिटी के पर्यावरण विज्ञान विभाग के संयुक्त शोध में भी की गई है. क्वींसलैंड विश्वविद्यालय द्वारा किए गए एक शोध में भी सौर ऊर्जा उत्पादन से पर्यावरण को नुकसान होने की बात कही गई है. क्वींसलैंड विश्वविद्यालय शोधकर्ताओं का कहना है कि अक्षय ऊर्जा उपकरणों के निर्माण में प्रयुक्त होने वाली धातुओं को प्राप्त करने के लिये तेजी से किये जा रहे खनन के परिणामस्वरूप जैव विविधता को खतरा हो सकता है. नेचर कम्युनिकेशन में प्रकाशित एक शोध के अनुसार लिथियम, कोबाल्ट, तांबा, एल्युमिनियम जैसी धातुओं का प्रयोग सोलर उपकरणों के निर्माण में किया जाता है. ऐसे में इन धातुओं के अंधाधुंध खनन से पर्यावरण और जैव विविधता पर विपरीत असर पड़ेगा.

कुछ वैज्ञानिकों का यह भी कहना है कि सोलर प्लेटें हमारे पर्यावरण के लिए किसी भी प्रकार नुकसानदेह नहीं हैं लेकिन इनके निर्माण की प्रक्रिया और इनमें प्रयोग की जाने वाली धातुओं के खनन से पर्यावरण को जरूर नुकसान होना संभव है. इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि सौर ऊर्जा समय की जरूरत है. कोयले, परमाणु और गैस से बनने वाली बिजली से प्रदूषण फैलता है. कोयले के भंडार तेजी से समाप्त हो रहे हैं, ऐसे में वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों पर तो काम करना ही होगा लेकिन इसके साथ उन आशंकाओं का निवारण भी करना जरूरी है, जिनमेंं पर्यावरण को संकट होने की बात कही जा रही है. सोलर कंपनियां पर्यावरण की रक्षा के लिए उचित कदम उठाएं और इसके लिए नियम-कायदों की पालना करें, इसे भी कड़ाई सुनिश्चित किया जाना चाहिए क्योंकि हमारे लिए जितनी नवीन ऊर्जा जरूरी है, उतना ही पर्यावरण का साफ-सुथरा होना भी अनिवार्य है.

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