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घास की चिता पर जली थी झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की निर्जीव देह

Jitendra Kumar by Jitendra Kumar
19/06/22
in मुख्य खबर, राष्ट्रीय, साहित्य
घास की चिता पर जली थी झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की निर्जीव देह
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गौरव अवस्थी


1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम में जान की कुर्बानी देने वाले योद्धाओं की शौर्य गाथाएं खूब गाईं गईं। सैकड़ों लोकगीत, नाटक, उपन्यास और अनेक भाषाओं में शूरवीरों के जीवन चरित्र लिखे गए लेकिन ब्रिटिश हुकूमत के अत्याचारों के डर से लोकगीत दबी जुबान ही गाए जाते थे। खुलकर इन्हें गाने की हिम्मत अच्छे-अच्छों में नहीं थी। स्वाधीन भारत में अंग्रेजों के छक्के छुड़ाने वाली झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की वीरता-शूरता का इतिहास लिखना आसान था। महाश्वेता देवी से लेकर सैकड़ों लेखकों ने लेखनी चलाई लेकिन ‘सिपाही विद्रोह’ या ‘गदर’ कहे गए 1857 के भीषण संग्राम पर गुलामी के दौर में कलम उठाना उतना ही खतरे से खाली नहीं था, जितना सिपाही विद्रोह में कृपाण उठाना।

यह वह दौर था जब अंग्रेज लेखक अपने अत्याचारों पर पर्दा डालने के लिए गदर का मनमाना इतिहास लिखकर भारतीयों की हिंसात्मक कार्यवाही को बढ़ा-चढ़ा कर पेश कर रहे थे। अप्रतिम वीर और भारतीय जनमानस पर अमिट छाप छोड़ने वाली झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के बारे में दुष्प्रचार किया जा रहा था कि विद्रोह के समय अंग्रेजों को सहायता देनी कबूल की। उनके चरित्र को इस तरह चित्रित किया गया कि मानो झांसी की रानी बिना चाहे ही अंग्रेजों से लड़कर वीर नारी बन गई हों।

ऐसे वक्त में आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी गदर के संबंध में अंग्रेजी लेखकों द्वारा लिखे जा रहे/ लिखे गए ‘झूठे’ इतिहास को कैसे बर्दाश्त कर सकते थे? उन्हें सरस्वती का संपादन संभाले हुए एक साल ही बीता था। प्रेस मालिकों के नियम और अंग्रेजी कानूनों के डर के बीच अंग्रेज़ों के झूठ के पदार्फाश और झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की वीरता-शूरता को हिंदी भाषी समाज के सामने लाने की उत्कंठा अंदर से रोज-ब-रोज जोर मार ही रही थी। उसी बीच उन्हें झांसी की रानी पर मराठी लेखक दत्तात्रेय बलवंत‌ पारसनीस की मराठी में लिखी पुस्तक ने रास्ता दिखाया। पुस्तक पढ़ने के बाद झांसी की रानी की वीरता पर अंग्रेज हुकूमत द्वारा फैलाए गए भ्रम को दूर करने के लिए पारसनीस की नीति अपनाते हुए ही उन्होंने 1904 में सरस्वती के जनवरी और फरवरी अंक में पर क्रमश: दो लेख ‘झांसी की रानी लक्ष्मी बाई’ प्रकाशित किए।

द्विवेदी जी ने सरस्वती में लिखे गए अपने पहले लेख के साथ झांसी के किले और रानी के महल के दो चित्र भी लगाए। दूसरी किस्त के साथ झांसी के म्यूटिनी के स्मारक का चित्र और एक चित्र रानी के युद्ध का, जिसमें रानी एक हाथ में तलवार और दूसरे में भाला लिए अंग्रेजों पर वार करती हुई दिखाई गई हैं। चित्र के नीचे कैप्शन दिया गया कि ग्वालियर के एक पुराने चित्र से सरस्वती के लिए यह फोटोग्राफ उतारा गया है। इन लेखों को सुंदर ढंग से सजाकर छापने में द्विवेदी जी ने काफी परिश्रम भी किया।

उन्होंने पारसनीस की चार सौ पृष्ठ की पुस्तक के आधार पर लेखों में विद्रोही सिपाहियों को दुष्ट कहा। बच्चों की प्रचारित हत्या की निंदा की और झांसी की रानी की वीरता की प्रशंसा। द्विवेदी जी ने पारसनीस के प्रमाण संग्रह और इतिहास के अध्ययन की प्रशंसा करते हुए लेख की शुरूआत पारसनीस की पुस्तक के प्रभाव का महत्व स्वीकार करते हुए इस तरह की-‘इस पुस्तक को पढ़कर लक्ष्मीबाई का अतुल पराक्रम, उनका अतुल धैर्य और उनकी अतुल वीरता आंखों के सम्मुख आ जाती है। ऐसी वीर नारी इस देश में क्या और देशों में भी शायद ही हुई होगी।’ हालांकि, सर एडविन अर्नाल्ड ने लक्ष्मी बाई की उपमा फ्रांस की प्रसिद्ध बाला जोन आप आर्क से दी है। लक्ष्मीबाई को परास्त करने वाले सर ह्यूरोज ने भी रानी की वीरता की प्रशंसा की है। द्विवेदी जी लिखते हैं कि ऐसी पुस्तक लिख कर पारसनीस ने इस देश के साहित्य का बड़ा उपकार किया। वह पारसनीस की प्रशंसा करते हुए हिंदी पाठकों से सिफारिश करते हैं कि मराठी न आती हो तो इस एक ही पुस्तक को पढ़ने के लिए ही सही मराठी सीखें जरूर।

पारसनीस की किताब के हवाले से द्विवेदीजी ने झांसी की रानी की वीरता और संग्राम का बखान करते हुए झांसी की लड़ाई के बारे में लिखा-’23 मार्च 1818 को यह आरंभ हुआ झांसी को चारों ओर से अंग्रेजी सेना ने घेर लिया। 24 और 18 पौंडर्स नाम की तोपें शहर की दीवार पर चलने लगीं और दूसरी तोपों से बम के गोले शहर के भीतर फेंके जाने लगे। झांसी के चारों ओर जो दीवार है उसकी चौड़ाई कोई 16 फुट है। उस पर और किले के बुर्ज पर रानी साहब ने सब मिलाकर कोई 50 पर लगा दीं। उनमें से भवानी शंकर, कड़क बिजुली, घनगर्ज, नालदार आदि तोपे बड़ी ही भयंकर थीं। रानी साहब खुद युद्ध की देखभाल करने लगी और समय-समय पर अपने योद्धा और सेना नायकों को उत्साहित करने लगीं। उनके युद्ध कौशल का ही कमाल था कि अंग्रेजों ने झांसी की सेना की वीरता और युद्ध कौशल की प्रशंसा की। सर ह्यूरोज ने रानी की प्रशंसा करते हुए लिखा-‘स्त्रियां तक तोपखाने में काम करती थीं और गोला-बारूद लाने में सहायता देती थीं। अंग्रेज 11 दिन का झांसी का घेरा डाले रहे। विकट युद्ध हुआ तथापि रानी साहब के धैर्य और दृढ़ निश्चय के सामने दूसरे पक्ष की कुछ न चली।’

लेख के इस एक अंश से आपको उनके अंग्रेज हुकूमत के प्रति दृष्टिकोण का अंदाज करना आसान होगा–‘महाप्रबल और परम दयालु अंग्रेजी सरकार’ से शत्रुता करने का फल झांसी वालों को मिला। लड़ाई में जो सैनिक मारे गए, उनके अलावा अंग्रेजी फौज ने शहर में पहुंचकर प्रलय आरंभ कर दिया। एक और शहर में उसने आग लगा दी और दूसरी ओर से लड़के और स्त्रियों को छोड़कर बिजन बोल दिया। सात दिन तक लूटमार और फूंक-फांक होती रही। आठवें दिन प्रजा को अभय वचन दिया गया और जिनका कोई वारिस न था, ऐसे मृतकों के ढेर रास्ते में फूंक दिए गए। ये तमाम लोग जो मारे गए थे, निहत्थे थे और उन्होंने न तो किसी कत्लेआम में भाग लिया था न ले सकते थे।’

लेख में झांसी की रानी की वीरता का उल्लेख इस तरह है-‘उनके साथ उनकी दासी मुंदर भी एक घोड़े पर थी। उस पर एक गोरे ने प्राणहारक आघात किया। वह चिल्ला उठी। रानी साहब ने उसको मारने वाले के कंठ में एक निमिष मात्र अपनी तलवार रख दी। अंग्रेजी सेना के वीरों ने रानी साहब को कोई महाशूर सेनानायक समझकर चारों ओर से घेर लिया। इस पर भी वह जरा भयभीत नहीं हुईं। उनकी तलवार अपना काम बड़ी भी भीषणता से बराबर करती रही परंतु एक कोमल और अल्पवयस्क अबला अनेक वीरों के बीच कब तक सजीव रह सकती है? एक अंग्रेज योद्धा ने उनके सिर पर पीछे से तलवार का वार किया जिससे उनके सिर का दाहिना भाग छिल गया और एक आंख निकल आई। इस योद्धा ने रानी साहब की छाती पर किर्च का भी प्रहार किया परंतु धन्य रानी लक्ष्मीबाई की वीरता, धन्य उनका धैर्य और धन्य उनका साहस! इस दशा को प्राप्त होकर भी उन्होंने इस वीर से पूरा बदला लिया। उसे तत्काल ही उन्होंने धरा तीर्थ को भेजकर अपना जीवन सार्थक किया!! धन्य वह शौर्य और धन्य वह पराक्रम!

घायल रानी ने सरदार रामचंद्रराव के साथ एक झोपड़ी में प्रवेश किया। 18 जून 1858 को ग्वालियर के पास समरांगण में भारतवर्ष का महा शौर्यशाली दिव्य स्त्री रत्न खो गया। रानी साहब के सेवक और सरदारों ने एक घास की गंजी से घास लाकर उसकी चिता बनाई और उसी पर रानी साहब की निर्जीव देह रखकर उसे अग्निदेवता के अर्पण कर दिया।’ मुगल शासकों को लोहे के चने चबवाने वाले महाराणा प्रताप ने भले घास की रोटियां खाईं थीं लेकिन यह किताब प्रामाणिक रूप से बताती है कि अंग्रेजों से लड़ते-लड़ते वीरगति को प्राप्त करने वाली झांसी की रानी लक्ष्मी बाई की देह घास की चिता पर ही पंचतत्व में विलीन हुई थी। इतिहास में रुचि रखने वाले लोग भले ही इस तथ्य को जानते हों लेकिन नई पीढ़ी इस इतिहास से शायद ही परिचित होंगे।

पारसनीस से प्रभावित आचार्य द्विवेदी लिखते हैं कि यह बहुत अच्छा क्रांतिकारी साहित्य है। वैसा साहित्य है, जिसे पढ़कर भारत के नौजवान अंग्रेजी अंग्रेजी राज्य से नफरत करना सीखते थे और जिन्हें संवैधानिक तरीकों पर या अहिंसात्मक तरीकों पर विश्वास नहीं था वे लक्ष्मीबाई की तरह हथियार को उठाकर अंग्रेजों से लड़ने का प्रयत्न करते थे। आचार्य द्विवेदी झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के वास्तविक इतिहास को जानने- समझने के लिए हिंदी भाषी समाज को पारसनीस की मराठी पुस्तक पढ़ने का मंत्र दे रहे थे। वह भी भाषण या मौखिक नहीं बल्कि लेख में बाकायदा लिखकर। उस दौर में झांसी की रानी के वास्तविक इतिहास से हिंदी भाषी समाज को परिचित कराने के थोड़े से होने वाले प्रयासों में एक प्रयास आचार्य द्विवेदी का भी था। यह भारत के उन महान योद्धाओं के प्रति उनकी अपनी श्रद्धा का भी प्रमाण है। आइए! हम सब मिलकर शूरवीर झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के प्रति अपनी श्रद्धा अर्पित करें।

जय प्रथम स्वाधीनता संग्राम!
जय झांसी की रानी लक्ष्मीबाई!!

 

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