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’57 की क्रांति के गुमनाम योद्धा वीर हनुमान सिंह

शौर्य दिवस (18 जनवरी) पर विशेष

Jitendra Kumar by Jitendra Kumar
18/01/22
in मुख्य खबर, राष्ट्रीय, साहित्य
’57 की क्रांति के गुमनाम योद्धा वीर हनुमान सिंह

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गौरव अवस्थी


पिछले दिनों पत्रकार-इतिहासकार सुधीर सक्सेना की पुस्तक ‘छत्तीसगढ़ में मुक्तिसंग्राम और आदिवासी’ पढ़ते हुए 57 की क्रांति में छत्तीसगढ़ में विद्रोह की ज्वाला भड़काने वाले वीर नारायण सिंह के साथ हनुमान सिंह की वीरगाथा सामने आई। गाथा में इस बात का जिक्र पढ़कर मन और गौरवान्वित हो गया कि अंग्रेजी सेना के शिविर में ही सार्जेंट कैप्टन सिडवेल की तलवार के वार से हत्या करने वाले 5 फीट 4 इंच लंबे बलिष्ठ वीर हनुमान सिंह बैसवारे ( उत्तर प्रदेश के रायबरेली-उन्नाव के विशेष भू-भाग को मिलाकर बना क्षेत्र) के ही रहने वाले थे।

पुस्तक में संदर्भ के तौर पर इतिहासकार डॉ राम कुमार बेहार किताब ‘छत्तीसगढ़ का इतिहास’ को भी उद्धृत किया गया। इतिहास कि इन किताबों में दर्ज संक्षिप्त कथा बताती है कि बैसवारे के इस गुमनाम योद्धा वीर हनुमान सिंह ने छत्तीसगढ़ में महाविद्रोह के समय रायपुर (छत्तीसगढ़ की राजधानी) में आज से 163 साल पहले 18 जनवरी 1858 को अंग्रेजी सेना के कैंप में कैप्टन सिडवेल को तलवार के वार करके मार डाला था। कैप्टन सिडवेल के नेतृत्व में नागपुर से 100 सैनिकों की अंग्रेजी पल्टन को छत्तीसगढ़ में विद्रोह दबाने के लिए रायपुर भेजा गया था। इसी पल्टन‌ में बैसवारे के वीर हनुमान सिंह मैगजीन लश्कर के रूप में शामिल थे। छत्तीसगढ़ के प्रथम स्वाधीनता संग्राम के महानायक पहाड़ी अंचल सोनाखान के जमींदर वीर नारायण सिंह को 10 दिसंबर 1857 को खुलेआम रायपुर के प्रमुख चौराहे पर तोपों से उड़ा दिया गया। वीर नारायण सिंह को चौराहे पर तोपों से उड़ाकर छत्तीसगढ़ अंचल में महाविद्रोह को दबाने की चेष्टा अंग्रेज हुकूमत ने की थी।

अंग्रेजों ने यह मान लिया था कि अब छत्तीसगढ़ अंचल में विद्रोह नहीं होगा लेकिन उन्हें यह अंदाज नहीं था कि क्रांति की ज्वाला उनके अपने सैन्य शिविर में ही धधक रही है। वीर नारायण सिंह की शहादत पर वीर हनुमान सिंह का खून खौल उठा और बदला लेने के लिए ही उन्होंने 18 जनवरी 1858 की रात अपने दो साथियों की मदद से कैप्टन सिडवेल को तलवार से 9 वार करके मौत की नींद सुला दिया था। सिडवेल को मारने के बाद वीर हनुमान सिंह ने सैन्य शिविर में घूम घूम कर बदला लेने का ऐलान किया और भारतीय सिपाहियों को विद्रोह में शामिल होने के लिए खुले रुप में साथ देने के लिए ललकारा लेकिन कोई दूसरा सिपाही उनकी जैसी हिम्मत नहीं जुटा पाया। सिडवेल की हत्या के बाद अंग्रेजी सेना के शिविर में हड़कंप मच गया। अंग्रेजी सेना ने हनुमान सिंह का साथ देने वाले दोनों सिपाहियों को पकड़ लिया लेकिन वीर हनुमान सिंह साथियों का साथ ना मिलने पर छत्तीसगढ़ अंचल के पहाड़ी जंगलों में छिप गए।

सिडवेल की हत्या के बाद भी वीर हनुमान सिंह का अंग्रेजों से बदला लेने का जज्बा कम नहीं हुआ। 2 दिन बाद 20 जनवरी 1858 की आधी रात को वीर हनुमान सिंह तलवार लेकर अकेले ही शेर की मांद में शेर के शिकार का जज्बा रखते हुए रायपुर के डिप्टी कमिश्नर लेफ्टिनेंट चार्ल्स इलियट की हत्या के इरादे से उसके बंगले में घुसे और इलियट जिस कमरे में सो रहा था, उसका दरवाजा तोड़ने का प्रयास किया लेकिन दरवाजे के मजबूत होने से प्रयास असफल रहा। इसके बाद अपनी खून की प्यासी तलवार के साथ वीर हनुमान सिंह छत्तीसगढ़ के जंगलों और पहाड़ों में गुम हो गए। उसके बाद उनका कोई भी पता नहीं चला। चार्ल्स इलियट के आदेश पर ही वीर नारायण सिंह को रायपुर के चौराहे पर तोपों से उड़ा दिया गया था। इसीलिए वीर हनुमान सिंह इलियट को भी मार डालना चाहते थे लेकिन उनके मजबूत इरादों पर एलियट के बंगले के मजबूत दरवाजों ने पानी फेर दिया।

अंग्रेज हुकूमत ने उनको पकड़ने के लिए हजारों जासूसों और गुप्तचरों का जाल बिछाया। ₹500 का इनाम भी घोषित किया (यह आज के 5‌ लाख रुपए से ज्यादा ही है) लेकिन अंग्रेज सेना वीर हनुमान सिंह को पकड़ने में कभी भी कामयाब नहीं हो सकी। बैसवारे के महानायक राना बेनी माधव बक्श सिंह की तरह ही वीर हनुमान सिंह भी अंग्रेजों के हत्थे नहीं चढ़े। राना बेनी माधव की तरह बाकी का जीवन उन्होंने जंगलों-पहाड़ों में ही गुजार कर जीवन लीला पूरी की। रायपुर के डिप्टी कमिश्नर लेफ्टिनेंट चार्ल्स इलियट के साथ उस रात बंगले में ही सोए हुए लेफ्टिनेंट स्मिथ ने उस रात के भयानक मंजर के बारे में लिखा भी-“यदि उस रात हम लोग जगाए ना गए होते तो लेफ्टिनेंट इलियट और मैं तो सोए सोए ही काट डाले गए होते और बंगले के अंदर अन्य निवासियों का भी यही हाल हुआ होता।”

सिडवेल की हत्या के तुरंत बाद अंग्रेज सेना ने वीर हनुमान सिंह के दो साथ ही सिपाहियों को कैद कर लिया था। डिप्टी कमिश्नर लेफ्टिनेंट चार्ल्स इलियट की अदालत में सुनवाई चली और 2 दिन बाद ही रायपुर के चौराहे पर सरेआम वीर हनुमान सिंह के नेतृत्व में अल्पकालिक विद्रोह में साथ देने वाले उनके 17 साथियों-गाजी खान (हवलदार), अब्दुल हयात, ठाकुर सिंह, पन्नालाल, मातादीन, ठाकुर सिंह, अकबर हुसैन, बुलेहू दुबे, लल्ला सिंह, बदलू, परमानंद, शोभाराम, दुर्गा प्रसाद, नजर मोहम्मद, देवीदीन और जय गोविंद (सभी गोलंदाज) को 22 जनवरी 1957 को खुलेआम फांसी पर चढ़ा कर सजा-ए-मौत दे दी गई। (रायपुर गजेटियर पेज 71)

वीर हनुमान सिंह छत्तीसगढ़ में सन’ 57 की क्रांति के अग्रणी नायकों में गिने-माने जाते हैं। हालांकि महाविद्रोह की चर्चा जब भी चलती है, तब छत्तीसगढ़ अंचल से वीर नारायण सिंह का ही नाम लिया जाता है, जबकि हनुमान सिंह का दुस्साहस और शौर्य वीर नारायण सिंह से ज्यादा बड़ा था। वीर नारायण सिंह ने अंग्रेजी हुकूमत द्वारा अपनी ज़मीदारी छीने जाने के विरोध में विद्रोह किया था लेकिन वीर हनुमान सिंह तो एक साधारण सिपाही थे। उनकी संपत्ति अंग्रेजों ने जब्त नहीं की थी। इतिहास में उन्हें वीर नारायण सिंह से ज्यादा नहीं तो कम भी आंका नहीं जाना चाहिए था लेकिन इतिहास ने वीर हनुमान सिंह के साथ न्याय नहीं किया। इतिहासकार मानते हैं कि अगर अंग्रेजी सेना के भारतीय सिपाहियों ने साथ दिया होता तो वीर हनुमान सिंह की बहादुरी से छत्तीसगढ़ अंचल में एक बार फिर क्रांति की ज्वाला भड़क उठती। अंग्रेजों को छत्तीसगढ़ छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ता।

रायबरेली-उन्नाव के विशेष भू-भाग को मिलाकर बना बैसवारा अपने शौर्य और वीरता के लिए जाना जाता है। प्रथम स्वाधीनता संग्राम में राना बेनी माधव सिंह (शंकरपुर-रायबरेली) और राजा राव राम बक्श सिंह (बक्सर-उन्नाव) की शौर्य गाथा यहां जन-जन के मन में बसी है। 1857 के विद्रोह में बेगम हजरत महल का साथ देने वाले राना बेनी माधव बख्श सिंह के किले को अंग्रेजों ने तोपों से उड़ा दिया था। राना बेनी माधव बहराइच होते हुए हिमालय की वादियों में खो गए। अंग्रेज हुकूमत उनका कोई पता नहीं लगा पाई। राजा राव राम बक्स सिंह अंग्रेजों ने बक्सर में पेड़ पर सरेआम फांसी पर लटकाकर विद्रोह को कुचलने की हिमाकत की थी।

’57 की क्रांति के इस गुमनाम योद्धा ने छत्तीसगढ़ अंचल में अकेले ही क्रांति की लौ जलाकर अपना और बैसवारे का नाम इतिहास में हमेशा-हमेशा के लिए अमर कर दिया। समय रहते समाज और सरकार की ओर से वीर हनुमान सिंह के इतिहास को ढूंढने का उद्यम किया जाता तो आज वह अपने बैसवारे में ही गुमनाम न होते। होना तो यह चाहिए था कि 18 जनवरी (अंग्रेजी सैन्य अफसर सिडवेल की हत्या की तारीख) को उत्तर प्रदेश और छत्तीसगढ़ अंचल में शौर्य दिवस के रूप में मनाया जाता। दुर्भाग्यवश अपने इस महान सपूत के बारे में बैसवारे के लोग भी डेढ़ सौ वर्ष से ज्यादा समय बीत जाने के बावजूद अपरिचित ही हैं जबकि जरूरत थी कि वीर हनुमान सिंह की गौरव गाथा का गान राना बेनी माधव सिंह एवं राजा राव राम बक्स सिंह की तरह ही इस अंचल में जन-जन के बीच गाया जाता। आजादी का अमृत महोत्सव चल रहा है। इस अमृत महोत्सव में भी आजादी का यह महानायक विस्मृत ही है। न छत्तीसगढ़ की सरकार ने वीर हनुमान सिंह को वह सम्मान दिया और न उत्तर प्रदेश सरकार ही सम्मान देने के बारे में सोच पाई है। समाज तो सोया हुआ है ही।

बैसवारे के इस गुमनाम योद्धा को शौर्य दिवस (18 जनवरी 1858) पर कोटि-कोटि नमन!!

 

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