नई दिल्ली। बीजेपी के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष को लेकर राजनीतिक गलियारों में चल रही हलचल अब आखिरी दौर में है. मौजूदा अध्यक्ष जेपी नड्डा का कार्यकाल खत्म है और अब सबकी नजरें इस पर टिकी हैं कि अगला अध्यक्ष कौन होगा. तमाम उठापटक और कयासों के गर्म बाजार के बीच यह खबर आई है कि पार्टी नेतृत्व इस संबंध में जल्द ही घोषणा कर सकता है. मीडिया रिपोर्ट्स ने बीजेपी सूत्रों के हवाले से बताया है कि 15 मार्च को या उससे पहले नाम का ऐलान कर दिया जाएगा. इसका कारण भी बताया गया है क्योंकि इसके बाद हिंदू पंचांग के अनुसार शुभ समय बीत जाएगा. लेकिन इन सबके बीच यह चर्चा है कि इतना लेट क्यों हुआ और कौन बीजेपी अध्यक्ष बनेगा.
तो आखिर कब होगा ऐलान?
बताया गया कि बीजेपी अध्यक्ष का नाम अगले पखवाड़े में घोषित किया जा सकता है. पार्टी का संविधान कहता है कि राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव से पहले संगठनात्मक चुनावों को कम से कम 50 प्रतिशत राज्यों में पूरा किया जाना चाहिए. अब तक 36 में से 12 राज्यों में यह प्रक्रिया पूरी हो चुकी है और पार्टी तेजी से इसे अन्य राज्यों में भी पूरा करने की कोशिश में जुटी है. खासतौर पर उन राज्यों में चुनावी प्रक्रिया को प्राथमिकता दी जा रही है. जहां अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं. जैसे तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, असम और गुजरात. हालांकि बिहार में कोई बदलाव नहीं होने की उम्मीद है क्योंकि वहां इसी साल के अंत में चुनाव प्रस्तावित हैं.
फिर चुनाव प्रक्रिया में देरी क्यों?
जेपी नड्डा का कार्यकाल पहले ही समाप्त हो चुका था लेकिन लोकसभा चुनावों के कारण उन्हें विस्तार दिया गया. अब जबकि आम चुनाव पूरे हो चुके हैं तो नए अध्यक्ष की घोषणा टल रही है. देरी का मुख्य कारण राज्यों में संगठनात्मक चुनावों की धीमी गति और राज्यों में असहमति को बताया जा रहा है. पार्टी के संविधान के मुताबिक बूथ, मंडल और जिला स्तर के चुनाव पूरे किए बिना राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव की प्रक्रिया शुरू नहीं हो सकती. इस बीच पार्टी के प्रदेश प्रभारियों को संभावित नामों की सूची जल्द से जल्द सौंपने के निर्देश दिए गए हैं.
बीजेपी के लिए क्यों बड़ा है यह फैसला?
यह बात तो सही है कि बीजेपी के नए अध्यक्ष के सामने कई चुनौतियां होंगी. पार्टी को दक्षिण भारत में अपनी पकड़ मजबूत करनी होगी जहां उसे अपेक्षाकृत कम सफलता मिली है. इसके अलावा नॉर्थ-ईस्ट में भी संगठन को और मजबूती देने की जरूरत है. पार्टी की रणनीति में जातिगत समीकरणों, भाषा विवाद और परिसीमन जैसे मुद्दों को भी ध्यान में रखा जा रहा है. खासकर उत्तर प्रदेश में जहां लोकसभा चुनाव में अपेक्षा से कम सीटें मिली थीं. वहां संगठन को फिर से मजबूत करना एक बड़ी चुनौती होगी.
तो क्या संभावित नाम में से होगा ऐलान..
अभी तक किसी भी नाम पर अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है लेकिन पार्टी हमेशा की तरह चौंका सकती है. एक्सपर्ट्स का साफ कहना है कि एक ऐसा चेहरा चुना जाएगा जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा से भी जुड़ा हो और संगठन को नए सिरे से दिशा देने में सक्षम भी हो. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह की जोड़ी के बाद पार्टी की अगली रणनीति इसी चुनाव से तय होगी. साथ ही डिजिटल माध्यमों के बेहतर उपयोग, युवाओं को पार्टी से जोड़ने और चुनावी तैयारियों को धार देने के लिए नए अध्यक्ष को आक्रामक रणनीति अपनानी होगी.