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क्यों सूखे रहते हैं सिक्किम में पानी के पाइप!

सिक्किम में काम करने वाले शोधकर्ताओं ने पाया है कि सिक्किम में हाशिए पर रहने वाले लोग पानी के सप्लाई को खुद स्थापित कर रहे हैं और उनकी देखरेख के लिए निजी स्तर पर काम कर रहे हैं।

Jitendra Kumar by Jitendra Kumar
23/04/23
in मुख्य खबर, राज्य
क्यों सूखे रहते हैं सिक्किम में पानी के पाइप!

सुंबुक में आड़े-तिरछे पाइपों की जून 2022 की एक तस्वीर। कनेक्टिविटी के बावजूद, यहां हर किसी को यहां साफ पानी उपलब्ध नहीं है। (फोटो: अबृति मोक्तन)

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सुंबुक की रहने वाली बिद्या को पानी लाने के लिए रोज़ाना अपने घर से तीन किलोमीटर दूर थुलो धारा या बड़े झरने तक जाना पड़ता है। पानी लाने में उनके तीन से चार घंटे खर्च हो जाते हैं। बिद्या के पड़ोस में एक नया घर बन रहा है, उस घर को देखते हुए वह बताती हैं कि पानी लाने का काम केवल महिलाएं करती हैं।

पानी की कमी को देखते हुए, हमने पूछा कि उसके पड़ोसी आखिर गारा कैसे तैयार करते हैं, मतलब सीमेंट और कंक्रीट का मिश्रण कैसे तैयार करते हैं। इस पर बिद्या के पड़ोसी बालशेरिंग कहते हैं कि इसके लिए पानी खरीदने के अलावा हमारे पास दूसरा विकल्प ही नहीं है।

सुंबुक, दक्षिणी सिक्किम में नामची ज़िले का एक वार्ड है। यहां के ज़्यादातर लोग खुद के प्राइवेट वाटर कनेक्शनों पर निर्भर हैं। यहां के लोग या तो सार्वजनिक जल स्रोतों से पानी लेते हैं या निजी स्रोतों से, जिसके लिए उन्हें पैसे देने पड़ते हैं। यह एक अनौपचारिक व्यवस्था है। इसमें लोग उन भूस्वामियों को पैसे देते हैं, जिनकी भूमि पर झरने हैं या उनके पास कई पाइप कनेक्शन हैं। इस तरह से, पानी जैसी मूलभूत जरूरत के लिए लोगों को अपनी जेब ढीली करनी पड़ती है।

बिद्या और बालशेरिंग के साथ हमारी बातचीत ने सिक्किम की ग्रामीण जल आपूर्ति प्रणाली को प्रभावित करने वाले दो प्रमुख मुद्दों पर प्रकाश डाला। मई और जुलाई 2022 के बीच अपने फील्ड रिसर्च के दौरान हमने इन मुद्दों का डॉक्यूमेंटेशन भी किया था। इन मुद्दों में पहला यह है कि हिमालयी झरनों से हर किसी की पानी की जरूरत पूरी नहीं हो रही है। दूसरा मुद्दा यह है कि निजी अनौपचारिक बुनियादी ढांचे और स्थानीय लोगों की देखरेख में जो नेटवर्क काम कर रहा है, वह ग्रामीण जल आपूर्ति की धुरी है।

हमारा शोध इस आम धारणा को झुठलाता है कि पूर्वोत्तर भारत का यह छोटा सा राज्य पानी के मामले में समृद्ध है। इसके अलावा, हमारे शोध में हाशिए पर रहने वाले ग्रामीण समुदायों के बीच, पानी की कमी को बढ़ावा देने वाले कारकों को बेहतर ढंग से समझने की तत्काल आवश्यकता पर प्रकाश डाला गया है

हमारा शोध यह भी दर्शाता है कि विशिष्ट क्षेत्रों के लिए अलग तरह से प्रयास करना कितना महत्वपूर्ण है। मैदानों में जो तरीका काम करता है, जरूरी नहीं है कि वही तरीका पहाड़ों में भी सफल हो जाएगा।

पाइप और टैंक हर जगह हैं, लेकिन उनमें पानी बहुत कम है
सुंबुक के अलावा, हमने अपने अध्ययन में दक्षिणी सिक्किम के मेलिडारा और राज्य के पश्चिमी भाग में स्थित युकसाम को भी शामिल किया। आपस में गुंथे हुए पाइप, ग्रामीण सिक्किम की एक अलग तस्वीर पेश करते हैं। इससे यह पता चलता है कि हर घर, एक-दूसरे से, पानी की आपूर्ति की वजह से काफी अच्छे से जुड़ा हुआ है।

सुंबुक में रहने वाले करीब 20 लोगों से हमारी बातचीत हुई। इस दौरान एक बात स्पष्ट तौर पर उभर कर सामने आई कि हर जगह, ठीक तरह से बुनियादी ढांचे की पहुंच नहीं हो पाई है। ज्यादातर टैंक या तो काम नहीं कर रहे या उनसे होने वाली आपूर्ति अनियमित है।

ये ग्रामीण वंचित वर्ग से ताल्लुक रखते हैं। इनके पास इतनी सामाजिक और आर्थिक पूंजी नहीं है कि ये अपने लिए हर जरूरी बुनियादी संसाधन आसानी से जुटा सकें। मसलन, बिद्या जैसों को पानी लाने के लिए काफी लंबा चलना भी पड़ता है और इसके लिए पैसे भी देने पड़ते हैं।

सुंबुक में पानी के लिए आत्मनिर्भरता

सुंबुक के दायरे में आने वाले गांव राज्य के सूखाग्रस्त हिस्से में आते हैं। क्लाइमेट फैक्टर्स यानी जलवायु से जुड़े कारक हालांकि पानी की पहुंच को प्रभावित करते हैं। लेकिन हमने यह भी पाया कि पावर डाइमेंशन, मसलन, भूमि का स्वामित्व, जल स्रोत से दूरी और आर्थिक वर्ग, जैसी स्थितियां भी पानी की पहुंच को काफी प्रभावित करती हैं।

केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं के बावजूद पानी की आपूर्ति अनियमित है
सुंबुक एक वार्ड है। ऐसे कई वार्ड मिलकर, सुंबुक कार्तिकेय ग्राम पंचायत इकाई (जीपीयू) का गठन करते हैं। सुंबुक कार्तिकेय जीपीयू में, पंचायतें (ग्राम परिषदें) जल-वितरण प्रणाली की निगरानी करती हैं और जल आपूर्ति योजनाओं के कार्यान्वयन के लिए सर्वेक्षण करती हैं। जल जीवन मिशन (जेजेएम) के तहत यह सब पंचायतों का दायित्व है। जेजेएम, भारत सरकार की एक प्रमुख योजना है जिसे प्रत्येक ग्रामीण घर में पीने का पानी उपलब्ध कराने के उद्देश्य से 2019 में शुरू किया गया था। सुंबुक की पंचायतें वर्तमान में जेजेएम-मैंडेटेड विलेज एक्शन प्लांस तैयार कर रही हैं। इसके तहत, ऐसे दस्तावेज तैयार किये जा रहे हैं जिनमें पानी की आपूर्ति के लिए विकसित किए जाने वाले बुनियादी ढांचों का विवरण है।

वाटर गवर्नेंस का एक अन्य महत्वपूर्ण हिस्सा, ग्रामीण विकास विभाग (आरडीडी) है, जो ग्रामीण पेयजल आपूर्ति के लिए जिम्मेदार एक राज्य स्तरीय नोडल एजेंसी है।

सुंबुक में, मुख्य जल स्रोत, जहां से आरडीडी पानी की आपूर्ति करता है, तुक खोला (छोटी नदियां), माजुवा (छोटी धाराएं) और कुछ झरने हैं। हालांकि, कठिन पर्वत स्थलाकृति यानी माउंटेन टोपोग्राफी, घरों के दूर-दूर होने, भूस्खलन के कारण पाइपलाइन कनेक्शनों में व्यवधान और लीन सीजन के दौरान स्रोतों से मिलने वाले पानी की मात्रा में कमी के कारण सुंबुक में जल आपूर्ति अनियमित है।

जल आपूर्ति में कमी की भरपाई लोगों और समुदायों के स्तर पर होती है
इस अंतर को भरने के लिए, स्थानीय समुदाय, सामूहिक रूप से, सार्वजनिक (नदियों, धाराओं और तालाबों, जो निजी स्वामित्व वाली भूमि पर नहीं हैं) और निजी (निजी भूमि वाले झरने) स्रोतों से, खुद के खर्च पर, पानी निकालने के लिए काम करते हैं।

सुंबुक में, हमने सड़कों के किनारे ऐसी कई पाइपलाइनें देखीं, जो पेड़ों और यहां तक कि चोटियों और चट्टानों के आर-पार होकर गुजर रही थीं। स्थानीय लोग, व्यक्तिगत जोखिम उठाकर, विशेषकर मानसून के दौरान, इन पाइपलाइनों का रखरखाव और प्रबंधन करते हैं।

एक वार्ड में, एक समूह ने मिलकर, अनौपचारिक पहल करके, इस दिशा में एक उदाहरण स्थापित कर दिया। हमने इस समूह से बात की। साल 1995 में तीन परिवारों को खिम्बू धारा- जो कि निजी भूमि पर एक झरना है- से नल वाला पानी उपलब्ध कराया गया था। यहीं से यह काम शुरू हुआ था। कुछ वर्षों के दौरान परिवारों की संख्या बढ़कर नौ हो गई। हर घर में, एक पाइप कनेक्शन होता है और दिन में एक खास समय पर रोटेशन के आधार पर पानी खींचा जाता है। वे जरूरत के समय, दूसरों के साथ पानी की आपूर्ति भी साझा करते हैं। अब, वे 600,000 रुपये में झरने को खरीदने की प्रक्रिया में हैं।

डेनहांग ने कहा कि पूरा पैसा चुकता करने के बाद, जीवन भर हम, इस स्रोत से पानी ले पाएंगे। इसके बाद हमें इस स्रोत के भूस्वामी को किराया नहीं देना पड़ेगा। उन्होंने यह भी बताया कि किराया लगातार बढ़ रहा है और अन्य संभावित उपभोक्ताओं के साथ प्रतिस्पर्धा भी है, ऐसे में यही स्थायी समाधान है।

यह स्थिति इस बात पर रोशनी डालती है कि कैसे पानी की पहुंच, न केवल प्राकृतिक स्रोतों और भौतिक बुनियादी ढांचे की उपलब्धता से निर्धारित होती है, बल्कि औपचारिक और अनौपचारिक शासन संरचनाओं द्वारा भी तय होती है। ऐसे घर जो जल आपूर्ति नेटवर्क के ब्लाइंड स्पॉट में आते हैं, वे सामाजिक-आर्थिक साधनों से रहित हैं।

जल जीवन मिशन यानी जेजेएम के अनुसार, 12 अप्रैल, 2022 तक सिक्किम में लगभग 82 फीसदी ग्रामीण परिवारों ने पानी के कनेक्शन का उपयोग किया है। राज्य के कुछ हिस्सों में, यह ढांचागत विकास अकेले पानी की उपलब्धता की गारंटी नहीं देता है।

निर्णय लेने की प्रक्रिया में, स्थानीय समुदाय के सदस्यों को शामिल करना एक महत्वपूर्ण कारक है। यह ग्राम सभाओं (ग्राम परिषद की बैठकों) में सर्वेक्षण और उपस्थिति में उनकी भागीदारी के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है। जल प्रबंधन के लिए बेहतर पारदर्शिता और भागीदारी तंत्र, बेहतर पहुंच यानी एक्सेस का मार्ग प्रशस्त करेगा।

यह देखते हुए कि सिक्किम में पानी की पहुंच को प्रभावित करने वाले कई कारक भारत के अन्य हिस्सों में भी समान हैं, वास्तव में वैश्विक स्तर पर भी ऐसी स्थितियां हैं, जहां पानी की पहुंच अत्यधिक संघर्षपूर्ण है और वितरण न्यायसंगत नहीं है, ऐसे में, यहां की सीखों को को बहुत दूर तक लागू किया जा सकता है।


साभार – द् थर्ड पोल

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