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क्या प्रियंका गांधी ही कांग्रेस का चेहरा बनेंगी?

Jitendra Kumar by Jitendra Kumar
27/03/23
in मुख्य खबर, राष्ट्रीय
क्या प्रियंका गांधी ही कांग्रेस का चेहरा बनेंगी?
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नई दिल्ली : अपने भाई की सांसदी छीन जाने के बाद प्रियंका गांधी ने रविवार को सरकार के ख़िलाफ़ जिस बेखौफ़ी के साथ हुंकार भरी है उससे एक सवाल उठ रहा है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस क्या प्रियंका गांधी को ही अपना चेहरा बनाने वाली है? ये सवाल उठने की एक बड़ी वजह ये भी है कि चुनावों से पहले समूचे विपक्ष को एकजुट करने का कांग्रेस को अनायास ही जो मौका मिला है, उसमें प्रियंका एक बड़ी सूत्रधार बन सकती हैं. वैसे भी सिर्फ कांग्रेस में ही नहीं बल्कि अन्य विपक्षी दलों के कई नेता भी ये मानते आये हैं कि सियासी जमीन पर राहुल गांधी की बनिस्बत प्रियंका गांधी कुछ ज्यादा परिपक्व व मजबूत नजर आती हैं.

बेशक उन्होंने अब तक कोई चुनाव नहीं लड़ा है लेकिन उन्हें एक खूबी जन्म से ही मिली है जिसे हम विरासत कहते हैं. वह ये कि आम लोगों को उनमें दादी इंदिरा गांधी की झलक नजर आती है. इसमें भी कोई शक नहीं कि उनके भाषण देने का अंदाज़ लोगों को उनकी दादी की याद दिला देता है. इसलिये इन भाई-बहन की राजनीतिक सक्रियता को निष्पक्षता के साथ सियासी तराजू पर अगर तौला जाये तो अधिकांश लोग यही मानेंगे कि अपनी बातों के जरिये खुद को लोगों से ‘कनेक्ट’ करने की कला में प्रियंका अपने भाई से काफी आगे हैं.

लेकिन बड़ा सवाल ये है कि जो विपक्ष राहुल गांधी के मसले पर लोकतंत्र को बचाने के लिए फिलहाल एकजुट नजर आ रहा है, क्या वही प्रियंका गांधी को अपना चेहरा बनाने पर इतनी आसानी से राजी हो पायेगा? ये एक ऐसा सवाल है जिसका माकूल जवाब देने की स्थिति में फिलहाल कोई भी नहीं है. इसलिये कि विपक्ष में पीएम पद का उम्मीदवार बनने के लिए एक नहीं कई दावेदार हैं. लिहाज़ा, मुख्य विपक्षी दल होने के नाते कांग्रेस को अगर अपना लक्ष्य हासिल करना है तो उसे पीएम पद की उम्मीदवारी का मोह पूरी तरह से त्यागने का जज़्बा दिखाना होगा.

हालांकि समूचे विपक्ष का एकमात्र लक्ष्य भी यही है कि अगले चुनाव में मोदी सरकार को किस तरह से हटाया जाए. लेकिन पीएम मोदी की लोकप्रियता और संघ व बीजेपी के जमीनी स्तर पर बेहद मजबूत का डर को देखते हुए ये बदलाव लाना भी इतना आसान नहीं है. लोग कह सकते हैं कि नहीं, राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा ने बदलाव लाने का माहौल बनाने में काफी हद तक सफलता पाई है. लेकिन राजनीति की इस सच्चाई से भला कैसे आंख मूंद सकते हैं कि समूचे विपक्ष के एकजुट हुए बगैर बीजेपी को बराबरी की टक्कर दे पाना बेहद मुश्किल है. लोकतंत्र में नंबर गेम ही सब कुछ होता है और मौजूदा माहौल में बिखरा हुआ विपक्ष उस जादुई आंकड़े को छूने का सपना अगर पाले बैठा है तो वह दिन में तारे देखने जैसा ही है.

पुराने अनुभव बताते हैं कि विपक्ष को राजनीति के पुराने आजमाये हुए फार्मूले को अपनाने की ही इस समय सख्त जरुरत है. इसकी दो मिसाल सबके सामने हैं- पहली 1977 और दूसरी 1989 की. इमरजेंसी खत्म होने के बाद हुए लोकसभा चुनावों में विपरीत विचारधाराओं वाले सारे दल एक बैनर तले आ गये थे. तमाम सोशलिस्ट नेताओं और जनसंघ ने मिलकर चुनाव लड़ा था और उन्हें इंदिरा गांधी सरकार को बेदखल करने में उम्मीद से भी ज्यादा कामयाबी मिली थी. उसके बाद साल 1989 के चुनावों में बोफोर्स मामले को लेकर कांग्रेस से बगावत करने वाले वीपी सिंह ने अन्य क्षेत्रीय दलों को एक मंच पर लाकर राष्ट्रीय मोर्चा बनाया, जिसे सफलता तो मिली लेकिन सरकार बनाने लायक बहुमत नहीं मिल पाया.

वाम मोर्चे के समर्थन के बावजूद बहुमत का आंकड़ा नहीं जुट पाया था. लेकिन उस वक़्त अटल-आडवाणी वाली बीजेपी ने सूझबूझ वाला फैसला लेते हुए ऐलान किया कि वो नेशनल फ्रंट की सरकार बनवाने के लिए उसे बाहर से समर्थन देगी. यानी वह सरकार में शामिल नहीं होगी. चूंकि तब बीजेपी का भी मकसद यही था कि राजीव गांधी सरकार को दोबारा सत्ता में आने से रोका जाये, लिहाजा उसने विपरीत विचारधारा वाले दलों से समझौता करने में कोई परहेज़ नहीं किया. जबकि तब भी 531 सीटों वाली लोकसभा में 197 सीटें लाकर कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी और पांच साल पहले महज़ दो सीटों पर सिमटने वाली बीजेपी ने तब 85 सीटें हासिल की थीं. लेकिन कांग्रेस और बीजेपी सियासी दरिया के दो ऐसे किनारे हैं, जिनका मेल होना नामुमकिन है.

इस तथ्य से भी इनकार नहीं कर सकते कि सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी होने के नाते विपक्ष को एकजुट करने की पहल कांग्रेस को ही करनी होगी लेकिन इसके लिए उसे बाकियों को ये भरोसा दिलाना होगा कि पीएम पद के लिए कांग्रेस अड़ेगी नहीं और इसका फैसला चुनाव-नतीजों के बाद ही होगा. फिलहाल समूचे विपक्ष का मकसद ये होना चाहिये कि मिलकर चुनाव लड़ा जाये और सीटों का बंटवारा करने में किसी तरह के अहंकार को आड़े न आने दिया जाये. इस कवायद में प्रियंका गांधी की भूमिका अहम साबित हो सकती है, इसलिये कांग्रेस नेतृत्व को चाहिये कि अन्य दलों के नेताओं से संपर्क साधने और उन्हें एकजुट करने में वे अब प्रियंका को ही आगे रखें.

रविवार को राजघाट पर प्रियंका गांधी ने अपने भाषण में जिन तीखे तेवरों के साथ प्रधानमंत्री मोदी को ‘कायर’ कहने की हिम्मत दिखाई है, वह इसका सबूत है कि वे अपनी दादी के नक्शे-कदम पर चलते हुए कांग्रेस का ऐसा सबसे बड़ा चेहरा बनने की तरफ आगे बढ़ रही है, जो कार्यकर्ताओं में नया जोश भरने वाला साबित हो सकता है.

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