“अहं ब्रह्मास्मि” मैं लिखना चाहता हूँ शाम के समय भटक चुके पंछी की यात्रा अनवरत वापस नीड़ तक पहुंचने तक, उलझने, आत्मविश्वास, ईर्ष्या, लोभ, निराशा, जय और सबसे ज़्यादा असफ़लता,…
“भोग और स्वतन्त्रता” मेरी कल्पना में विचरती है एक पूर्ण निर्वस्त्र स्त्री अपनी पूरी ठसक के साथ अपने रास्ते नापती है दूसरे किनारे पर रहते हैं ढेर सारे पुरुष ……