शत्रु से संवाद–(कविता)

शत्रु से संवाद ————————————              1. तुम्हारे प्रति मेरा सम्मान बुनता है तुम्हारे दर्प के ताने बाने तुम बड़प्पन के भाव में सगर्व बह जाते…

“अहं ब्रह्मास्मि” मैं लिखना चाहता हूँ -(कविता)

“अहं ब्रह्मास्मि” मैं लिखना चाहता हूँ शाम के समय भटक चुके पंछी की यात्रा अनवरत वापस नीड़ तक पहुंचने तक, उलझने, आत्मविश्वास, ईर्ष्या, लोभ, निराशा, जय  और सबसे ज़्यादा असफ़लता,…

“भोग और स्वतन्त्रता” मेरी कल्पना में विचरती है एक पूर्ण निर्वस्त्र स्त्री-(कविता)

“भोग और स्वतन्त्रता” मेरी कल्पना में विचरती है एक पूर्ण निर्वस्त्र स्त्री अपनी पूरी ठसक के साथ  अपने रास्ते नापती है दूसरे किनारे पर रहते हैं ढेर सारे पुरुष ……

क्षुधा, भोजन, संतुष्टि…… चक्की के दो पाट हम दोनों (कविता)

क्षुधा, भोजन, संतुष्टि…… चक्की के दो पाट हम दोनों पीसने में जीवन के अनंत दिवस बिरवे घिसती हूँ प्रतिक्षण मैं तुम भी बीतते हो हर पल, पोसने में ढेर सारे…

काई लगे हरे आँगन में चुपके से उतरती वैशाख की गर्म सी धूप–(कविता)

काई लगे हरे आँगन में चुपके से उतरती वैशाख की गर्म सी धूप ओसार की उंगलियाँ थाम…., छिड़क चुकी है शरारतों की बूँदें  नींद की गर्म तासीर पर अल सुबह…