डॉलर से क्यों हो रहा मोहभंग?

नई दिल्ली : दशकों से रिजर्व करंसी के तौर पर राज कर रहे डॉलर के अस्तित्व पर संकट मंडरा रहा है। खबर है कि कई विकासशील देश डी-डॉलराइजेशन की बात कर रहे हैं। इनका मानना है कि अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता को कम किया जाना चाहिए। इतना ही नहीं चीन और ब्राजील ने तो इस ओर कदम भी बढ़ा दिए हैं। सवाल है कि आखिर क्या है डी-डॉलराइजेशन और अगर इसे अमल में लाया गया, तो क्या असर होगा?

बीते महीने ही चीन और ब्राजील एक दूसरे की मुद्रा के जरिए ही व्यापार कर रहे थे। बुधवार को अर्जेंटीना ने भी कह दिया कि वह चीन को अमेरिकी डॉलर के बजाए युआन में भुगतान करेगा।

डॉलर के खिलाफ सुर क्यों?

कई देश अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करने की बात कह रहे हैं। ब्राजील के राष्ट्रपति लुई इनाशियो लुला दा सिल्वा तो दुनिया के व्यापार पर अमेरिका दबदबे की भी आलोचना कर चुके हैं। चीन और रूस भी डी-डॉलराइजेशन की बात करते हैं। खबरें आई थी कि ईरान रूस संयुक्त रूप से एक नई क्रिप्टोकरंसी की तैयारी कर रहे हैं, जो भुगतान के काम आएगी।

उठ चुके ये कदम

एक मीडिया रिपोर्ट में अमेरिकन इंस्टीट्यूट फॉर इकोनॉमिक रिसर्च के हवाले से बताया गया है कि ईरान और रूस ने स्विफ्ट जैसे अंतरराष्ट्रीय डॉलर ट्रेडिंग सिस्टम से कटने के कारण आर्थिक रूप से काफी उथल पुथल का समना किया है। ऐसे में देश अब दूसरे विकल्प तलाश रहे हैं। भारत और मलेशिया हाल ही में व्यापार के लिए रुपया में लेनदेन पर तैयार हुए हैं। सऊदी अरब के वित्त मंत्री भी कह चुके हैं कि अमेरिकी डॉलर के अलावा अन्य किसी मुद्रा में व्यापार के लिए तैयार हैं।

मार्च में ही नई दिल्ली में आयोजित एक कॉन्फ्रेंस में ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका के बीच सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया गया। उस दौरान डॉलर के स्थान पर वैकल्पिक मुद्रा लॉन्च करने की संभावनाओं पर भी चर्चा की गई।

डॉलर के जाने का क्या होगा असर?

अमेरिकन इंस्टीट्यूट फॉर इकोनॉमिक रिसर्च डी-डॉलराइजेशन की रणनीति को एकदम सटीक नहीं बताते हैं। कहा जा रहा है कि डॉलर जैसी स्थापित मुद्रा से अलग हटने से किसी देश के नेटवर्क इफेक्ट प्रभावित होगा। साथ ही इससे कई तरह के अवरोध भी आएंगे।

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