G20 समिट की 5 चीजें जिनकी जमकर हो रही चर्चा, हर तस्वीर में छिपा है खास मैसेज

नई दिल्ली : भारत की अध्यक्षता में G20 समिट सफलतापूर्वक संपन्न हो चुका है. आज अंतिम सत्र को पीएम मोदी ने संबोधित किया और समापन पर ब्राजील के राष्ट्रपति लूला डी सिल्वा को G20 की अध्यक्षता सौंप दी. इस समिट की सफलता के साथ ही 5 ऐसी चीजें भी हैं, जिनकी जमकर चर्चा हो रही है. इसमें नटराज की विशाल मूर्ति, कोणार्क और नालंदा का झलक, कंट्री प्लेट पर ‘INDIA’ नाम की बजाय भारत और साबरमती आश्रम. जानिए… इन पांचों तस्वीरों में क्या मैसेज छिपा है.

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नटराज मूर्ति दे रही ये मैसेज

भारत मंडपम में कन्वेंशन हॉल के प्रवेश द्वार पर 28 फुट ऊंची नटराज की प्रतिमा लगाई गई थी. यह प्रतिमा भगवान शिव को ‘नृत्य के देवता’ और सृजन और विनाश के रूप में परिभाषित करती है. भारत मंडपम में नटराज की प्रतिमा का लगाने के पीछे धार्मिक और ऐतिहासिक दोनों कारण थे. नटराज का ये स्‍वरूप शिव के आनंद तांडव का प्रतीक है. नटराज की प्रतिमा में आपको भगवान शिव की नृत्‍य मुद्रा नजर आएगी. साथ ही वो एक पांव से दानव को दबाए हैं. ऐसे में शिव का ये स्‍वरूप बुराई के नाश करने और नृत्‍य के जरिए सकारात्‍मक ऊर्जा का संचार करने का संदेश देता है.

परिवर्तन और शक्ति का प्रतीक है कोणार्क चक्र

भारत मंडपम की वेलकम स्टेज के बैकग्राउंड पर एक बडे़ से पहिए की झलक दिखाई दी थी. ये ओडिशा का कोणार्क चक्र है. इसे जी-20 समिट में प्रदर्शन करने के कई अहम मायने हैं. कोणार्क चक्र को 13वीं सदी में राजा नरसिंहदेव-प्रथम के शासन में बनाया गया था. 24 तीलियों वाले चक्र को भारत के राष्ट्रीय झंडे में भी इस्तेमाल किया गया है. कोणार्क चक्र लगातार बढ़ते समय की गति, कालचक्र के साथ-साथ प्रगति और निरंतर परिवर्तन का प्रतीक है. यह लोकतंत्र के पहिये के एक शक्तिशाली प्रतीक के रूप में कार्य करता है. ये पहिए बताते हैं कि कैसे पूरी दुनिया सूर्य की ऊर्जा से चलती है.

भारत के गौरवशाली इतिहास की गाथा है नालंदा यूनिवर्सिटी

यह विश्वविद्यालय 5वीं सदी से 12वीं सदी के बीच अस्तित्व में था. इसकी विरासत महावीर और बुद्ध के युग से चली आ रही है, जो ज्ञान के प्रसार में प्राचीन भारत की प्रगति को दर्शाती है. इसमें विविधता, योग्यता, विचारों की स्वतंत्रता, सामूहिक शासन, स्वायत्तता और ज्ञान की परंपरा पर बल रहा है, जो लोकतंत्र के मूल सिद्धातों के अनुरूप है. राष्ट्रपति ने कहा कि विश्व के सबसे पुराने प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालयों में से एक नालंदा भारत के उन्नत और शैक्षणिक अनुसंधान का एक जीवंत प्रमाण है. G20 की प्रेसीडेंसी थीम ‘वसुधैव कुटुंबकम’ के साथ ही सामंजस्यपूर्ण विश्व के निर्माण की प्रतिबद्धता की प्रेरणा यहीं से मिली है. नालंदा की विरासत समृद्ध लोकतंत्र की निरंतर याद दिलाती रहती है, जो न सिर्फ हमारे देश के अतीत का अभिन्न अंग रही है, बल्कि वर्तमान और भविष्य को भी आकार देती रही है.

पहली बार कंट्री प्लेट पर दिखा ‘भारत’ नाम

इंडिया बनाम भारत को लेकर छिड़ी बहस के बीच G20 समिट के पहले सत्र में PM मोदी की टेबल पर रखी कंट्री प्लेट में देश का नाम इंडिया नहीं बल्कि भारत लिखा हुआ था. इससे पहले G-20 या ऐसे जितने भी अंतर्राष्ट्रीय समिट होते थे, उनमें देश के लिए इंडिया नाम का इस्तेमाल होता था. पिछले साल इंडोनेशिया के बाली में जब प्रधानमंत्री मोदी G-20 के समिट में शामिल हुए थे, तब उनके सामने INDIA ही लिखा गया था. इसके जरिए सरकार ने साफतौर पर ये मैसेज दे दिया है कि देश के नाम को लेकर सरकार का क्या रुख है.

साबरमती आश्रम से दिया ये संदेश

समिट के दूसरे दिन  G20 देशों के नेता राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के समाधि स्थल राजघाट पहुंचे, जहां प्रधानमंत्री मोदी ने उनका स्वागत किया. इस दौरान वेलकम स्टेज के बैकग्राउंड पर साबरमती आश्रम की तस्वीर लगी हुई थी. पीएम मोदी ने पहले सभी मेहमानों का खादी का अंगवस्त्र पहनाया, इसके बाद साबरमती आश्रम के बारे में जानकारी दी. बता दें कि 1915 में गांधीजी के दक्षिण अफ्रीका से लौटने के बाद भारत में उनका पहला आश्रम 25 मई 1915 को अहमदाबाद के कोचरब क्षेत्र में स्थापित किया गया था, लेकिन गांधीजी रहने के लिए ऐसी जगह की तलाश कर रहे थे जहां वे खेतीबाड़ी, पशु पालन, गौशाला, खादी का काम आदि कर सकें. करीब दो साल बाद 17 जून 1917 को साबरमती के किनारे उनका आश्रम स्थांतरित कर दिया गया.

22 मार्च 1933 को गांधीजी ने खुद ही साबरमती आश्रम छोड़ दिया और प्रण लिया की जबतक देश स्वतंत्रता नहीं हो जाता है तबतक वे वापस इस आश्रम में नहीं लौटेंगे. 15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र देश बना और जनवरी 1948 में गांधीजी की हत्या कर दी गई और वे यहां कभी नहीं लौट सके. इसके जरिए पीएम मोदी ने वैश्विक नेताओं को शांति, सत्य, अहिंसा और समर्पण का संदेश दिया

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