जो राम के बिना भारत की कल्पना करते हैं, वो भारत को नहीं जानते : अमित शाह

नई दिल्ली: लोकसभा में राम मंदिर पर धन्यवाद प्रस्ताव पर शनिवार को नियम 193 का तहत चर्चा हो रही है. इस नियम में चर्चा के बाद वोटिंग का प्रावधान नहीं है. इस बीच अमित शाह ने कहा कि राम मंदिर आंदोलन से अनभिज्ञ होकर कोई भी इस देश के इतिहास को पढ़ ही नहीं सकता. 1528 से हर पीढ़ी ने इस आंदोलन को किसी न किसी रूप में देखा है.

लोकसभा में देश के गृह मंत्री अमित शाह ने राम मंदिर पर लाए गए धन्यवाद प्रस्ताव पर कहा कि मैं आज अपने मन की बात और देश की जनता की आवाज को इस सदन के सामने रखना चाहता हूं, जो वर्षों से कोर्ट के कागजों में दबी हुई थी. मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद उसे आवाज भी मिली और अभिव्यक्ति भी मिली. 22 जनवरी का दिन अन्याय की लड़ाई के अंत का दिन है. 22 जनवरी का दिन ऐतिहासिक है. साथ ही साथ उन्होंने कहा कि जो लोग इतिहास को नहीं पहचानते वो अपना अस्तित्व को खो देते हैं.

उन्होंने कहा कि 22 जनवरी का दिन सहस्त्रों वर्षों के लिए ऐतिहासिक बन गया है. जो इतिहास और ऐतिहासिक पलों को नहीं पहचानते, वो अपने अस्तित्व को खो देते हैं. 22 जनवरी का दिन करोड़ों भक्तों की आशा, आकांक्षा और सिद्धि का दिन है. ये दिन समग्र भारत की आध्यात्मिक चेतना का दिन बन चुका है. इन दिन महान भारत की यात्रा की शुरुआत का दिन है. ये दिन मां भारती विश्व गुरु के मार्ग पर ले जाने को प्रशस्त करने वाला दिन है.

जब राम मंदिर निर्माण के लिए कोर्ट का निर्णय आया तब कई लोग अनुमान लगा रहे थे कि इस देश में रक्तपात हो जाएगा, दंगे हो जाएंगे. मगर मैं आज इस सदन में कहना चाहता हूं कि ये भाजपा की सरकार है, नरेन्द्र मोदी जी इस देश के प्रधानमंत्री हैं. कोर्ट के निर्णय को भी जय-पराजय की जगह, न्यायालय के आदेश में परिवर्तित करने का काम मोदी जी के दूरदर्शी विचार ने किया.

1990 में जब इस आंदोलन ने गति पकड़ी तो उससे पहले से ही ये भाजपा का देश के लोगों से वादा था. हमने पालमपुर कार्यकारिणी में प्रस्ताव पारित करके कहा था कि राम मंदिर निर्माण को धर्म के साथ नहीं जोड़ना चाहिए, ये देश की चेतना के पुनर्जागरण का आंदोलन है. इसलिए हम राम जन्मभूमि को कानूनी रूप से मुक्त कराकर वहां पर राम मंदिर की स्थापना करेंगे.

अनेक राजाओं, संतों, निहंगों, अलग-अलग संगठनों और कानून विशेषज्ञों ने इस लड़ाई में योगदान दिया है. मैं आज 1528 से 22 जनवरी, 2024 तक इस लड़ाई में भाग लेने वाले सभी योद्धाओं को विनम्रता के साथ स्मरण करता हूं.

राम मंदिर आंदोलन से अनभिज्ञ होकर कोई भी इस देश के इतिहास को पढ़ ही नहीं सकता. 1528 से हर पीढ़ी ने इस आंदोलन को किसी न किसी रूप में देखा है. ये मामला लंबे समय तक अटका रहा, भटका रहा. पीएम मोदी के समय में ही इस स्वप्न को सिद्ध होना था और आज देश ये सिद्ध होता देख रहा है.

भारत की संस्कृति और रामायण को अलग करके देखा ही नहीं जा सकता. कई भाषाओं, कई प्रदेशों और कई प्रकार के धर्मों में भी रामायण का जिक्र, रामायण का अनुवाद और रामायण की परंपराओं को आधार बनाने का काम हुआ है.

देश की कल्पना राम और रामचरितमानस के बिना नहीं की जा सकती- शाह

अमित शाह ने कहा कि इस देश की कल्पना राम और रामचरितमानस के बिना नहीं की जा सकती. राम का चरित्र और राम इस देश के जनमानस के प्राण हैं. जो राम के बिना भारत की कल्पना करते हैं, वो भारत को नहीं जानते. राम प्रतीक हैं कि करोड़ों लोगों के लिए आदर्श जीवन कैसे जीना चाहिए, इसीलिए उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम कहा गया है.

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