क्या आप जानते हैं, पिछले तीन साल के दौरान भारत में कितनी रही बेरोजगारी?

नई दिल्ली। एनएसएसओ यानी नेशनल सैंपल सर्वे ऑर्गनाइजेशन, ये भारत सरकार के सांख्यिकी मंत्रालय के मातहत संगठन है. आसानी के लिए आप इसे सरकार की एक सर्वे एजेंसी कह सकते हैं. इसी सरकारी सर्वे एजेंसी ने कहा है कि भारत में 15 साल और उससे अधिक उम्र के नौजवानों में बेरोजगारी दर 2023 में 3.1 फीसदी रही जो पिछले तीन साल में सबसे कम है.

एनएसएओ की पीएलएफएस यानी पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे रिपोर्ट जो देश में बेरोजगारी की तस्वीर बयां करती है. साथ ही इसके आंकड़े यह भी बताते हैं कि देश में काम मांगने वालों की तादाद कितनी है, काम मांगने वालों में से कितनों को रोजगार मिल पा रहा और कितने लोग ऐसे हैं जो चाहते तो हैं कि काम करें मगर काम नहीं है. इसी सर्वे रिपोर्ट ने बताया है कि 2022 में जो बेरोजगारी दर 3.6 फीसदी और उससे पहले 2021 में 4.2 फीसदी थी, वह अब घटकर तीन फीसदी के करीब आ गई है.

सरकार का कहना है कि देश में बेरोजगारी का परिदृश्य कोविड के बाद की परिस्थितियों से अब उबर रहा है. सरकार इस आंकड़े से इस बात की तस्दीक करना चाह रही है कि केंद्र और राज्य सरकारों ने लॉकडाउन हटा कर जो आर्थिक गतिविधियों को इजाजत दी, इसका असर रोजगार की तस्वीर पर भी पड़ा है.

क्या है बेरोजगारी दर? आसान भाषा में अगर कहें तो बेरोजगारी दर से मुराद आबादी के उस हिस्से से है जिन्होंने काम तो मांगा मगर काम था नहीं.

बेरोजगारी दर – महिला बनाम पुरुष
सर्वे की मानें तो 2023 में महिलाओं के बीच बेरोजगारी दर 3 फीसदी रही जो कि 2022 के 3.3 फीसदी और 2021 के 3.4 फीसदी के आंकड़े से कम थी.

वहीं, पुरुषों के बीच 2023 में बेरोजगारी दर सरकार ने 3.2 फीसदी दर्ज किया है जो कि 2022 के 3.7 फीसदी और 2021 के 4.5 फीसदी के आंकड़े से काफी कम है.

बेरोजगारी दर – शहर बनाम गांव
2023 में शहरी इलाकों में बेरोजगारी दर 5.2 फीसदी रही. वहीं, 2022 में ये दर 5.7 फीसदी जबकि 2021 में 6.5 फीसदी थी.

ग्रामीण इलाकों की अगर बात करें तो यहां 2023 में बेरोजगारी दर शहरी परिस्थितियों से कम रही. 2021 में जो बेरोजगारी दर ग्रामीण इलाकों में 3.3 फीसदी थी. वह 2022 में 2.8 फीसदी जबकि 2023 में घटकर महज 2.4 प्रतिशत रह गई है.

ये तो हुई बेरोजगारी की बात. सरकारी सर्वे एजेंसी अपनी रिपोर्ट में एक एलएफपीआर (LFPR) का जिक्र भी करती है. एलएफपीआर बोले तो लेबर फोर्स पार्टिसिपेशन रेट यानी श्रम बल भागीदारी दर.

अब ये एलएफपीआर क्या है?
देखिए, बेरोजगारी दर तो उस तादाद का प्रतिशत होता है जो काम मांग तो रहे थे मगर उन्हें मिला नहीं. जबकि एलएफपीआर आबादी की वह संख्या है जिसको सर्वेक्षण के दौरान पाया गया कि वह काम मांग रही थी.

इसे और अगर विस्तार दें तो कुछ यूं भी कहा जा सकता है कि देश की वैसी आबादी जो सक्रिय तौर पर आर्थक गतिविधियों में शामिल होना चाहती है, लेबर फोर्स पार्टिसिपेशन रेट यानी एलएफपीआर कहलाती है.

सर्वे में एलएफपीआर के हवाले से सरकार का दावा है कि 15 साल से ऊपर की काम मांगने वाली आबादी की संख्या 2023 में 56.2 फीसदी रही. ये 2022 के 52.8 फीसदी और 2021 के 51.8 फीसदी से कहीं ज्यादा है यानी देश में काम मांगने वालों की संख्या साल दर साल बढ़ रही है.

‘बेरोजगारी दर 40 साल में सबसे अधिक’
खैर, ये तो सरकारी आंकड़ा हो गया. सरकार का दावा है कि बेरोजगारी की दर घट रही है लेकिन कांग्रेस पार्टी लगातार बेरोजगारी और नौजवानों के सवालों पर सरकार पर हमलावार है. राहुल गांधी ने न्याय यात्रा के दौरान मध्य प्रदेश में दावा किया कि देश में फिलहाल बेरोजगारी पिछले 40 बरसों में सबसे अधिक है.

राहुल का तर्क था कि इसके पीछे नोटबंदी, जीएसटी को गलत तरीके से लागू करना और चंद पूंजीपतियों के लिए नीति बनाना शामिल है. कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और फिलहाल केरल के वायनाड से सांसद राहुल गांधी ने तो यहां तक दावा किया कि भारत में बेरोजगारी की असल तस्वीर पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान, बांग्लादेश और भूटान से भी भयानक है.

दूसरे आंकड़े क्या कहते हैं?
भारत में बेरोजगारी के आंकड़े और CMIE के डेटा जैसे एक दूसरे के पर्याय हैं. सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनमी यानी CMIE एक थिंक-टैंक है जो बहुत नज़दीकी से रोजगार और बेरोजगारी तस्वीर को अपनी रिपोर्ट में दर्शाती है.

CMIE के आंकड़ों पर अगर हम गौर करे तो पाते हैं कि शहरी इलाकों में 2023 के दौरान बेरोजगारी दर 8 फीसदी रही. ये 2022 की तुलना में करीब 70 बेसिस पॉइंट अधिक रहा. सीएमआई के मुताबिक 2022 में बेरोजगारी दर 7.33 फीसदी थी तो 2021 में यह 5.98 फीसदी थी.

एक और बात भले 2023 में बेरोजगारी दर 8 फीसदी रही. लेकिन सीएमआई ही के आंकड़े कहते हैं कि जनवरी में इसमें करीब डेढ़ फीसदी की गिरावट आई है. जनवरी महीने में ये दर 6.57 फीसदी रही.

ये जरूर है कि भारत सरकार के सर्वे और सीएमआई के सर्वे के तरीके, मेथोडॉलोजी में अंतर हो सकता है. बावजूद इसके दोनों के सालाना आंकड़ों में काफी अंतर सवाल खड़े करता है.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *