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शिवलिंग हटाने का फैसला लिखते ही असिस्टेंट रजिस्ट्रार हुए बेहोश, घबराए जज ने उठाया यह कदम

Jitendra Kumar by Jitendra Kumar
09/08/23
in राज्य, समाचार
शिवलिंग हटाने का फैसला लिखते ही असिस्टेंट रजिस्ट्रार हुए बेहोश, घबराए जज ने उठाया यह कदम

फोटोः साभार गूगल

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नई दिल्ली : कलकत्ता हाईकोर्ट में एक केस का फैसला लिखवाए जाने के दौरान अजीबोगरीब घटना हुई। इससे खलबली मच गई। मामला ऐसा था कि जज को अपना फैसला तक बदलना पड़ गया। एक विवादित भूमि पर स्थापित शिवलिंग को हटाए जाने के कोर्ट के फैसले को लिखवाने के दौरान असिस्टेंट रजिस्ट्रार अचानक बेहोश हो गये। उनकी यह दशा देख जज भी अचंभित हो गये और उन्होंने अपना फैसला ही बदल दिया। जज ने बदले हुए फैसले में मामले को निचली अदालत में सिविल केस की तरह सुनवाई का निर्देश दिया।

पुलिस के कार्रवाई नहीं करने पर हाईकोर्ट में दायर की थी याचिका

बंगाल के मुर्शिदाबाद के बेलडांगा में खिदिरपुर के दो लोगों सुदीप पाल और गोविंद मंडल के बीच भूमि विवाद चल रहा था। मई 2022 में इसको लेकर उनमें मारपीट तक हुई थी। सुदीप पाल का आरोप है कि गोविंद ने भूमि पर रातोंरात शिवलिंग स्थापित कर दी। सुदीप ने इसके बारे में थाने में शिकायती पत्र दिया तो पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की। इस पर सुदीप हाईकोर्ट पहुंच गये।

उनके वकील ने कोर्ट में बताया कि विवादित भूमि पर जानबूझकर शिवलिंग स्थापित की गई है। जबकि गोविंद के वकील ने कहा कि शिवलिंग स्वत: ही भूमि से निकला है।

बहरहाल इस मामले में सुनवाई करने के बाद जस्टिस जॉय सेनगुप्ता ने आदेश दिया कि शिवलिंग को विवादित भूमि से हटा दिया जाय। इस फैसले को जब असिस्टेंट रजिस्ट्रार विश्वनाथ राय लिखवाने लगे तो वे बेहोश होकर गिर पड़े। यह हाल देख जज ने फैसले को ही बदल दिया और निर्देश दिया कि इस मामले पर निचली अदालत में सिविल केस की तरह सुनवाई हो।

उधर, उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश प्रशांत कुमार मिश्रा ने गैर कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) मामले में जमानत का अनुरोध करने संबंधी जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र उमर खालिद की याचिका पर सुनवाई से स्वयं को बुधवार को अलग कर लिया। यह यूएपीए मामला फरवरी 2020 में दिल्ली में हुए दंगों के कथित षड्यंत्र से जुड़ा है। उच्च न्यायालय ने पिछले वर्ष 18 अक्टूबर को खालिद की जमानत याचिका खारिज कर दी थी। खालिद ने अदालत के इस आदेश के खिलाफ उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर की थी, जो सुनवाई के लिए न्यायमूर्ति ए एस बोपन्ना और न्यायमूर्ति मिश्रा की पीठ के समक्ष पेश की गई।

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