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बीजेपी ने एक्टिव किए JDU को तोड़ने वाले ‘सियासी मोहरे’

Jitendra Kumar by Jitendra Kumar
16/07/23
in राज्य, समाचार
बीजेपी ने एक्टिव किए JDU को तोड़ने वाले ‘सियासी मोहरे’
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पटना: एनडीए से अलग होने के बाद लगातार जेडीयू बिखर रहा है। शुरुआत जेडीयू संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा ने की थी। जेडीयू में हंगामा खड़ा कर खुद किनारे हो गए और अपनी पार्टी राष्ट्रीय लोक जनता दल (RLJD) बना ली। बाद के दिनों में करीब दर्जन भर नेताओं ने नीतीश से किनारा कर लिया। जिन नेताओं ने जेडीयू का साथ छोड़ा, उनमें अधिकतर उपेंद्र कुशवाहा के स्वजातीय थे। अब एनडीए में चिराग पासवान की एंट्री हो चुकी है। साल 2020 के असेंबली इलेक्शन में उन्होंने नीतीश कुमार का खेल बिगाड़ दिया था। 80 से 115 सीटों तक जीत का रिकॉर्ड कायम करने वाले जेडीयू के सिर्फ 43 उम्मीदवार विधानसभा चुनाव में जीत पाए थे। जेडीयू नेताओं की ही यह स्वीकारोक्ति है कि चिराग पासवान ने उनका खेल बिगाड़ा था। अब तो खेल बिगाड़ने के लिए जीतन राम मांझी भी साथ हैं और उपेंद्र कुशवाहा भी।

लोकसभा चुनाव आते-आते जेडीयू टूट जाएगा?
माना जा रहा है कि लोकसभा चुनाव करीब आते ही जेडीयू में भगदड़ मचेगी। जेडीयू के ज्यादातर नेता बीजेपी या उसके सहयोगी दलों का हाथ थाम लेंगे तो बचे-खुचे नेता आरजेडी के साथ हो जाएंगे। जेडीयू में तब सिर्फ नीतीश कुमार ही बचेंगे। ऐसा मानने और कहने वालों के अपने तर्क भी हैं। वे बताते हैं कि बीजेपी जैसी राष्ट्रीय स्तर की पार्टी के साथ रहते अकेले लोजपा (आर) के अध्यक्ष चिराग पासवान ने नीतीश का खेल बिगाड़ दिया था तो अब तो कई लोग नीतीश के दुश्मन बन कर सामने हैं। उपेंद्र कुशवाहा ने जिस तरह जेडीयू में अपनी उपेक्षा और नीतीश को पार्टी के सिद्धांतों से भटकने का आरोप लगाया, उससे कुशवाहा बिरादरी के वोटर खासा नाराज हैं। नीतीश को अब कुशवाहा बिरादरी का शायद ही साथ मिले।

नीतीश कुमार का पुख्ता जनाधार

साल 1994 से ही बिहार में कुर्मी और कुशवाहा बिरादरी को लेकर बना लव-कुश समीकरण शुरू से ही नीतीश कुमार के साथ रहा है। सच कहा जाए तो यह समीकरण नीतीश कुमार के नेतृत्व को देख कर ही बना था। इसकी मदद से ही 2005 के विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू को विधानसभा में खासा सीटें आईं और बीजेपी के सहयोग से वे सीएम बन गए। तब से लगातार लव-कुश समीकरण नीतीश के लिए कारगर रहा है। अब इस समीकरण के वोटों के दो दावेदार मैदान में हैं। कुशवाहा वोटों के ठेकेदार उपेंद्र कुशवाहा बन गए हैं तो कुर्मी वोटों में जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष रह चुके पूर्व केंद्रीय मंत्री और अब भाजपा के सदस्य आरसीपी सिंह सेंधमारी के लिए सक्रिय हो गए हैं।

चिराग के चाचा करेंगे नीतीश का बंटाधार

विधानसभा चुनाव में चिराग पासवान ने अपने दम पर नीतीश को पानी पिला दिया था। उन्हें भी इस बात का रंज है कि नीतीश के दबाव में ही एनडीए से उनको हटना पड़ा। नीतीश ने अपनी चाणक्य बुद्धि से चिराग की पार्टी लोजपा को ही बाद में तोड़ दिया। एक गुट में अकेले चिराग रह गए तो दूसरे गुट में उनके चाचा पशुपति कुमार पारस पार्टी के चार अन्य सांसदों को लेकर अलग हो गए। इसका तात्कालिक लाभ पारस को मिला भी। वे केंद्र में मंत्री बना दिए गए। चिराग ताकते रह गए। चिराग के मन में इन्हीं सब बातों को लेकर भारी गुस्सा है। वे हर वक्त नीतीश की आलोचना में ही लगे रहते हैं। नीतीश को नीचा दिखाने के लिए चिराग ने विधानसभा के उपचुनावों में भाजपा उम्मीदवारों के लिए प्रचार किया। उन्होंने कभी बीजेपी के खिलाफ कोई कदम नहीं उठाया, बल्कि वे खुद को पीएम नरेंद्र मोदी का हनुमान बताते रहे। अब फिर चाचा-भतीजा साथ आ रहे हैं तो नीतीश का बंटाधार तय है।

जीतन राम मांझी को मिला है मौका

पूर्व सीएम और हम (HAM) के नेता जीतन राम मांझी भी अब एनडीए का हिस्सा बन गए हैं। नीतीश से अपने को वे कभी कम नहीं कूतते हैं। उन्हें तेजस्वी यादव से भी नफरत है। अपने बेटे संतोष मांझी उर्फ संतोष सुमन को वे सीएम पद के लिए तेजस्वी से अधिक योग्य मानते हैं। नीतीश कुमार ने जब महागठबंधन की बैठक में यह ऐलान किया कि अगला विधानसभा चुनाव तेजस्वी के ही नेतृत्व में लड़ा जाएगा तो जीतन राम मांझी भड़क गए थे। उन्होंने अपने गुस्से का इजहार किया था कि उनका बेटा सीएम पद के लिए तेजस्वी से अधिक योग्य है। पढ़ा-लिखा है। तब से ही नाराज चल रहे मांझी ने आखिरकार महागठबंधन का साथ छोड़ दिया और अब एनडीए का हिस्सा बन गए हैं।

कैसे बिगड़ेगा महागठबंधन का खेल

साल 2019 के लोकसभा चुनाव में जेडीयू और लोजपा के साथ भाजपा नीत एनडीए ने चुनाव लड़ा। तब बीजेपी का वोट शेयर 37.4 प्रतिशत था। साल 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी का वोट शेयर 31.34 प्रतिशत था। यानी 2014 से करीब 6 प्रतिशत अधिक वोट बीजेपी को 2019 में मिले थे। साल 2014 में बीजेपी के साथ चिराग पासवान की एलजेपी और उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक समता पार्टी ही थीं। साल 2019 में भाजपा के साथ जेडीयू और लोजपा थे। एनडीए को 2014 में 38 प्रतिशत वोट मिले तो 2019 में 45 प्रतिशत। इस बार बिहार में एनडीए का विस्तार हुआ है। एनडीए को अपना पुराना आधार बरकरार रखने के लिए 10-15 प्रतिशत वोटों की जरूरत है। चिराग और पारस के अलावा मांझी और उपेंद्र कुशवाहा के साथ आ जाने से बीजेपी आसानी से अपना लक्ष्य हासिल कर लेगी। पार्टी में तोड़फोड़ से जेडीयू को अगर नुकसान होता है तो इसका फायदा बीजेपी को ज्यादा मिलेगा।

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