नई दिल्ली: पीएम मोदी और अमित शाह की अगुवाई में बीजेपी (BJP) दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की कर रही है. मोदी के धुर विरोधी भी उनकी मेहनत और काबिलियत का लोहा मानते हैं. भारत के विपक्षी दल जहां 2024 की चुनावी लड़ाई में इस बार मिलकर किस्मत आजमाने जैसे पुराने तरीकों पर अटके हुए हैं. वहीं मोदी खुद की खींची लकीर को और बड़ा करते हुए 2047 की बात कर रहे हैं. गुजरात से लेकर दिल्ली की सत्ता तक मोदी का फोकस नतीजे देने पर रहता है. 2014 में अपने पहले कार्यकाल (Modi1.o) में स्वच्छ भारत मिशन से शुरुआत करके उनका फोकस ‘विकसित भारत’ बनाने पर पहुंच चुका है. वो लगातार इस दिशा में काम कर रहे हैं.
पीएम मोदी ने दूसरे कार्यकाल (Modi 2.o) में 2047 तक ‘विकसित भारत’ के रोड मैप का खाका खींच दिया. एक ओर विकसित भारत संकल्प यात्रा से आम जनमानस के जीवन स्तर में सुधार लाया जा रहा है वहीं दूसरी ओर वो मानो पार्टी संगठन को और मजबूती देते हुए अगले दशक नहीं बल्कि अगले 50 सालों में पार्टी के भविष्य का मास्टर प्लान बना रहे हैं. सियासी जानकारों का कहना है कि बदलाव स्वीकार नहीं करने वाले खत्म हो जाते हैं. ऐसे में बीजेपी ने ‘पार्टी विद डिफरेंस’ के नारे की नींव पर नई बुलंदिया छूने के लिए इस पार्टी में बीते एक दशक यानी पिछले करीब 10 सालों में ताबड़तोड़ सियासी प्रयोग किए हैं. आइए उनके बारे में बताते हैं.
BJP की सामाजिक-राजनीतिक इंजीनियरिंग
तीन राज्यों के विधानसभा चुनावों में मिली सफलता के बाद उसने सभी जगहों पर नए चेहरे को मौका दिया है. बताया जा रहा है कि BJP ने इसके जरिए दूसरी पंक्ति के नेताओं को आगे लाने का सियासी प्रयोग किया है. इसके साथ BJP ने एक मजबूत प्रतीकात्मक आधार भी तैयार किया है और नई सोशल इंजीनियरिंग (BJP Social Engineering) गढ़ कर नया संदेश देने की कोशिश की है.
एक तीर से कई निशाने
सियासी जानकारों की मानें तो छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान में मुख्यमंत्री और उप मुखमंत्री के तौर पर आदिवासी, दलित, ब्राह्मण और राजपूत चेहरों को उतार कर BJP ने एक संदेश दिया. पार्टी ने इसके साथ ही तीनों राज्यों में नए नेतृत्व को लेकर भी नई पॉलिटिकल पिच तैयार कर सबको चौंका दिया. जानकार बताते हैं कि संघ और BJP आलाकमान ने इन फैसलों से के पीछे कई संदेश दिए हैं. पार्टी से बड़ा कोई नहीं है. मातृ संगठन आरएसएस अभी उतना ही ताकतवर है. वो जिसे चाहे फर्श से अर्श तक पहुंचा सकता है.
दूसरी पीढ़ी होगी तैयार, क्या अबकी पार 400 पार?
आने वाले सालों में BJP की दूसरी और नई लीडरशिप तैयार हो गई है. इसका असर आगामी 2024 के लोकसभा चुनावों (Lok Sabha Election 2024) में भी देखने को मिल सकता है. सियासी पंडितों का कहना है कि ब्राह्मणों और बनियों की पार्टी कही जाने वाली BJP ने तीन राज्यों में शीर्ष नेतृत्व के चयन में नए चेहरों को लाकर ना सिर्फ अपनी पुरानी छवि से बाहर आने की कोशिश की है, बल्कि पिछड़े, दलित-एसटी वर्ग को लुभाने और विपक्ष की जातीय जनगणना की मांग की धार को कुंद करने का प्रयास किया है. इसके साथ ही BJP ने नए और युवा चेहरों को शीर्ष पदों पर बैठाकर पार्टी के नए काडरों को भी साधने की कोशिश की है.
RSS-BJP का संयुक्त फैसला
वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक राजीव श्रीवास्तव कहते हैं कि यह बदलाव सिर्फ BJP का अकेले का फैसला नहीं है. आरएसएस के बड़े नेता मंथन करने के बाद इस नतीजे पर पहुंचे कि अब दूसरी पंक्ति के नेताओं को आगे बढ़ाया जाना चाहिए. इसकी शुरुआत उत्तर प्रदेश से हो गई थी. 2014 में वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी को कानपुर से चुनाव लड़वाया गया. 2019 में उनकी जगह किसी और को मौका दिया गया. उत्तर प्रदेश की राजनीति में स्थापित नेता कलराज मिश्र हों, केशरी नाथ त्रिपाठी, ओमप्रकाश सिंह हों, इनकी जगह दूसरे नेताओं को मौका दिया गया. कुछ नेताओं को राज्यपाल बनाकर सम्मानित भी किया गया. इनकी जगह दूसरी पंक्ति के नेताओं को मौका दिया गया. योगी, केशव मौर्या, दिनेश शर्मा, स्वतंत्र देव और ब्रजेश पाठक जैसे नेताओं 50 से 60 साल की उम्र वालों को आगे लाया गया.
