- मसूरी की ऐतिहासिक मस्जिद पर चला बुलडोजर
- कार्रवाई के बाद मुस्लिम समुदाय में आक्रोश, लगाया जाम
- सुबह पांच बजे भारी पुलिस बल की मौजूदगी में हुई कार्रवाई
- प्रबंधन समिति ने ऐतिहासिक धरोहर पर प्रहार बताया
- प्रशासन ने कहा, पालिका भूमि से हटाया गया अतिक्रमण
देहरादून/मसूरी। मसूरी के लक्ष्मणपुरी क्षेत्र में शनिवार तड़के एक धार्मिक ढांचे को हटाने की प्रशासनिक कार्रवाई के बाद विवाद गहरा गया। सुबह लगभग पांच बजे भारी पुलिस बल की मौजूदगी में बुलडोजर चलाकर मस्जिद परिसर में बने अंतिम नमाज स्थल (टिनशेड) को ध्वस्त कर दिया गया। कार्रवाई के बाद मुस्लिम समुदाय में भारी आक्रोश फैल गया और बड़ी संख्या में लोगों ने राष्ट्रीय राजमार्ग पर जाम लगाकर प्रदर्शन किया।
मस्जिद प्रबंधन समिति के सचिव मोहम्मद शाहिद ने आरोप लगाया कि प्रशासन ने बिना पर्याप्त संवाद के कार्रवाई की। उनका कहना है कि प्रशासन की और से जारी नोटिस का समय पर जवाब दिया गया था और मस्जिद से संबंधित सभी आवश्यक दस्तावेज भी उपलब्ध करा दिए गए थे। समिति के अनुसार प्रशासन ने पहले मीनार हटाने के निर्देश दिए थे, जिसे उन्होंने स्वयं हटवा दिया था। इसके बावजूद शनिवार सुबह भारी पुलिस बल के साथ कार्रवाई कर दी गई और समिति के किसी सदस्य या स्थानीय व्यक्ति को मौके पर जाने तक की अनुमति नहीं दी गई।
प्रबंधन समिति का दावा है कि यह कोई नई संरचना नहीं थी, बल्कि मसूरी की ऐतिहासिक और धार्मिक विरासत का हिस्सा थी। उनके अनुसार वर्ष 1911 से यहां मुस्लिम कब्रिस्तान मौजूद है और वर्ष 1929 में तैयार मसूरी के आधिकारिक नक्शे में भी इस कब्रिस्तान और मस्जिद का उल्लेख दर्ज है।
महान स्वतंत्रता सेनानी अब्बास तैयबजी भी इसी कब्रिस्तान में दफन
समिति का यह भी कहना है कि इसी कब्रिस्तान में देश के महान स्वतंत्रता सेनानी अब्बास तैयबजी की कब्र स्थित है। समिति के मुताबिक वर्ष 1947 के दौरान मूल मस्जिद क्षतिग्रस्त हो गई थी। बाद में वर्ष 2009 में कब्रिस्तान आने वाले लोगों और जनाजे की नमाज (अंतिंम नमाज) अदा करने वालों को बारिश और धूप से बचाने के लिए वहां टिनशेड लगाया गया था। उनका कहना है कि जिस ढांचे को हटाया गया, वह नियमित मस्जिद नहीं बल्कि अंतिम नमाज (जनाजा नमाज) के लिए उपयोग किया जाने वाला स्थल था।
प्रशासन पर धार्मिक भावनाओं की अनदेखी करने का आरोप
कार्रवाई के विरोध में मुस्लिम समुदाय के लोगों ने प्रशासन पर धार्मिक भावनाओं की अनदेखी करने का आरोप लगाया। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि यदि भूमि वास्तव में सरकारी थी तो दशकों तक इस संबंध में कोई विवाद या कार्रवाई क्यों नहीं हुई। उनका कहना है कि धार्मिक स्थलों से जुड़े मामलों में सरकार को संवेदनशीलता दिखाते हुए बातचीत के माध्यम से समाधान निकालना चाहिए था।
कानूनी प्रक्रिया के तहत हुई कार्यवाहीः उपजिलाधिकारी
वहीं प्रशासन ने कार्रवाई को पूरी तरह कानूनी प्रक्रिया के तहत बताया है। मसूरी के उपजिलाधिकारी राहुल आनंद ने कहा कि संबंधित भूमि न तो वक्फ बोर्ड की है और न ही किसी निजी व्यक्ति अथवा समुदाय के स्वामित्व में है। संयुक्त जांच में यह भूमि नगर पालिका परिषद मसूरी की पाई गई है। उन्होंने बताया कि राजस्व विभाग, नगर पालिका परिषद, छावनी परिषद और वक्फ बोर्ड के अभिलेखों की जांच के बाद यह स्पष्ट हुआ कि संबंधित संरचना पालिका की भूमि पर बनी थी और अतिक्रमण की श्रेणी में आती थी।
एसडीएम के अनुसार प्रशासन ने संबंधित पक्ष को तीन बार नोटिस जारी कर स्वेच्छा से संरचना हटाने के निर्देश दिए थे, लेकिन नोटिसों का पालन नहीं किया गया। इसके बाद नियमानुसार पुलिस बल की मौजूदगी में अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई की गई।
