नई दिल्ली : चंद्रयान 3, जिसके जरिए भारत अंतरिक्ष में सफलता का एक और परचम लहराने के लिए तैयार है। दोपहर 2 बजकर 35 मिनट पर इसे आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन स्पेस सेंटर से रवाना किया जाएगा। अब जब चर्चा में चंद्रयान 3 है, तो इसे अंतरिक्ष में ले जाने की जिम्मेदारी उठाने वाले लॉन्च व्हीकल एमके-3 के बारे में भी जानना जरूरी है। इसकी सबसे खास बात है कि इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन यानी ISRO की तरफ से तैयार किया गया अब तक का सबसे शक्तिशाली रॉकेट है।
क्या है LVM-3?
ताकत, आकार और क्षमता के चलते इसे ‘बाहुबली’ रॉकेट भी कहा जा रहा है। इस तीन स्तरीय रॉकेट में दो सॉलिड फ्यूल बूस्टर्स होते हैं और एक लिक्विड फ्यूल कोर स्टेज उसे ताकत देता है। अब इनका काम समझते हैं। सॉलिड फ्यूल बूस्टर रॉकेट को शुरुआती स्तर पर आगे बढ़ाने में या थ्रस्ट में मदद करते हैं। जबकि, लिक्विड फ्यूल कोर रॉकेट को ऑर्बिट में पहुंचाने के लिए थ्रस्ट को बनाए रखता है। यह रॉकेट 4 हजार किलो तक पेलोड को अंतरिक्ष में ले जा सकता है।
ISRO का कहना है, ‘43.5 मीटर लंबे इस त्रिस्तरीय लॉन्च व्हीकल ने भारत को GTO में 4000 किलो तक के कम्युनिकेशन सैटेलाइट पहुंचाने में आत्मनिर्भर बना दिया है।’ पहले इस रॉकेट को GSLV-Mk3 के तौर पर जाना जाता था। इसरो ने तीन बार मिशन में सफल होने के बाद इसे बदलकर LVM-3 कर दिया। खास बात है कि शुक्रवार को यह रॉकेट चंद्रयान-3 के जरिए चौथी बार ऑर्बिट में पेलोड पहुंचाने के मिशन पर रवाना हो रहा है।
कैसे काम करता है?
यह रॉकेट कंबसशन साइकिल के जरिए चलता है। यह अपने कोर और स्ट्रैप-ऑन इंजन के लिए लिक्विड फ्यूल्ड इंजनों को तैनात करता है। अब रॉकेट के कोर स्टेज को दो विकास इंजन से ताकत मिलती है, जो 720+720 kN का थ्रस्ट या जोर तैयार करते हैं। इस प्रक्रिया में दो सॉलिड प्रोपैलेंट बूस्टर से लॉन्च के शुरुआती चरणों में अतिरिक्त जोर मिलता है।
LVM-3 के ऊपरी हिस्से में CE-20 इंजन होता है, जो तय ऑर्बिट में पेलोड को पहुंचाने के लिए जोर देता है। खास बात है कि CE-20 भारत में ही विकसित क्रायोजैनिक इंजन है।
विशाल आकार और इतिहास
रॉकेट का कुल वजन 642 टन बताया जा रहा है। साथ ही इसकी ऊंचाई 43.5 मीटर है। LVM-3 का इस्तेमाल पहले भी कई सैटेलाइट्स को लॉन्च करने के लिए किया जा चुका है। इनमें GSAT-19 कम्युनिकेशन सैटेलाइट, एस्ट्रोस्टेट एस्ट्रोनॉमी सैटेलाइट, चंद्रयान-2 शामिल है। खास बात है कि इस रॉकेट का ही इस्तेमाल गगनयान मिशन में किया जाएगा, जो भारत की पहला मानव अंतरिक्षयान होगा।
