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नई संसद में ‘सेंगोल’ रखे जाने पर विवाद

Jitendra Kumar by Jitendra Kumar
26/05/23
in राष्ट्रीय, समाचार
नई संसद में ‘सेंगोल’ रखे जाने पर विवाद
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चारु कार्तिकेय


केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बुधवार 24 मई को नए संसद भवन के उद्घाटन कार्यक्रम के बारे में जानकारी देते हुए सेंगोल के बारे में बताया. उनके मुताबिक सेंगोल 15 अगस्त, 1947 को भारत को आजादी मिलने के घटनाक्रम का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है जिसे भुला दिया गया था.

शाह के भाषण के अलावा उसी कार्यक्रम में सेंगोल पर एक फिल्म भी दिखाई गई, जिसमें दावा किया गया कि सेंगोल एक तरह का राजदंड है जो चोला साम्राज्य में एक राजा से दूसरे राजा तक सत्ता के हस्तांतरण का प्रतीक हुआ करता था. इस फिल्म के मुताबिक आजादी के समय अंग्रेजों के आखिरी वायसराय लार्ड माउंटबैटन ने तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से पूछा था कि सत्ता का हस्तांतरण किस तरह से होना चाहिए.

नेहरू ने इस बारे में अपने सहयोगी सी राजगोपालाचारी से सलाह ली, जो आगे चलकर भारत के पहले गवर्नर जनरल बने. राजगोपालाचारी ने सेंगोल और चोला साम्राज्य में उससे जुड़ी परंपरा के बारे में बताया. नेहरू के मान जाने के बाद राजगोपालाचारी ने एक विशेष सेंगोल बनाने के लिए तमिलनाडु के एक धार्मिक मठ से मदद मांगी.

मठ के आदेश पर मद्रास के एक प्रसिद्ध स्वर्णकार ने चांदी का सेंगोल बनाया और उस पर सोने की परत चढ़ाई. बन जाने के बाद मठ के वरिष्ठ साधू सेंगोल को दिल्ली ले कर आए और पहले उसे माउंटबैटन को सौंपा, फिर माउंटबैटन से लेकर एक विशेष समारोह में नेहरू को सौंपा गया.

बीजेपी के प्रवक्ता अमित मालवीय ने दावा किया है कि यह समारोह नेहरू के प्रसिद्ध “ट्रिस्ट विद डेस्टिनी” भाषण से ठीक 15 मिनट पहले आयोजित किया गया था. मालवीय के मुताबिक सब जल्दबाजी में हुआ इसलिए इसका कोई आधिकारिक रिकॉर्ड नहीं है, लेकिन बीते कुछ सालों में तमिल मीडिया में हाथ में सेंगोल लिए नेहरू की तस्वीर के साथ इस पूरे घटनाक्रम के बारे में छापा गया है.

बीजेपी के मुताबिक, पद्म भूषण से सम्मानित नृत्यांगना डॉक्टर पद्मा सुब्रमण्यम ने जब इन मीडिया रिपोर्टों को पढ़ा तो उन्होंने यह जानकारी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से साझा की. प्रधानमंत्री ने इन दावों की छानबीन करवाई और सारे तथ्य हासिल करने के बाद सेंगोल को नए संसद भवन में रखने का फैसला लिया.

बीजेपी के कुछ नेताओं ने यह भी दावा किया है कि कांग्रेस ने इस सेंगोल को प्रयागराज में नेहरू परिवार के घर ‘आनंद भवन’ में एक संग्रहालय में रखवा दिया था, जहां इसे नेहरू को भेंट की गई एक सुनहरी ‘वाकिंग स्टिक’ बताया गया था. लेकिन अब सेंगोल को नए संसद भवन के अंदर रखने पर विवाद छिड़ गया है.

वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश ने ट्विटर पर सवाल उठाया कि भारत के पास पहले से सम्राट अशोक के सिंह-स्तंभ के रूप में राजकीय प्रतीक चिन्ह मौजूद है फिर एक नए प्रतीक चिन्ह को क्यों लाया जा रहा है. उन्होंने पूछा, “कितने प्रतीक चिन्ह होंगे?” महात्मा गांधी के परपोते तुषार गांधी ने ट्विटर पर लिखा कि सेंगोल जैसे राजदंड का संसदीय लोकतंत्र में कोई महत्व नहीं था इसलिए नेहरू ने उसे स्वीकार कर संग्रहालय में रख दिया था, लेकिन मौजूदा प्रधानमंत्री उसे नई संसद में रखकर लोकतंत्र का मजाक उड़ा रहे हैं.

चूंकि सेंगोल शिव भक्ति की एक परंपरा का चिन्ह है, इसलिए इसे एक हिंदू प्रतीक चिन्ह के रूप में भी देखा जा रहा है और एक पंथ-निरपेक्ष गणराज्य की संसद के प्रतीक चिन्ह के रूप में इसकी उपयोगिता पर सवाल उठाए जा रहे हैं. राजनीतिक समीक्षक इस पूरी कवायद को बीजेपी द्वारा तमिलनाडु के मतदाताओं को लुभाने के एक प्रयास के रूप में भी देख रहे हैं.

 

 

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