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इलेक्टोरल बॉन्ड से चुनावी चंदा लोकतंत्र के लिए खतरा, सुप्रीम कोर्ट क्या करेगा फैसला?

Jitendra Kumar by Jitendra Kumar
31/10/23
in राष्ट्रीय, समाचार
इलेक्टोरल बॉन्ड से चुनावी चंदा लोकतंत्र के लिए खतरा, सुप्रीम कोर्ट क्या करेगा फैसला?

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नई दिल्ली : राजनीतिक दलों को इलेक्टोरल बॉन्ड से चुनावी चंदा मिलता है। ऐसा जनवरी 2018 से चल रहा है। इसे लेकर विवाद रहा है, क्योंकि इलेक्टोरल बॉन्ड के माध्यम से मिलने वाले चंदे में दानकर्ता की पहचान गुप्त रखी जाती है। कई व‍िशेषज्ञ मानते हैं क‍ि चंदा लेने का यह तरीका लोकतंत्र के लिए खतरनाक है।

वेस्टमिंस्टर विश्वविद्यालय में सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेमोक्रेसी की डायरेक्टर निताशा कौल फाइनेंशियल टाइम्स के लिए लिखे एक आर्टिकल में बताती हैं कि भारत में चुनाव किस हद तक महंगा होता जा रहा है। वह आंकड़ों के हवाले से लिखती हैं कि 2019 के आम चुनाव में 2014 की तुलना में दोगुना खर्च हुआ था। भारत का आखिरी आम चुनाव 2016 के यूएस प्रेसिडेंट इलेक्शन से ज्यादा महंगा था। इससे पता चलता है कि चुनाव में रुपयों की बोलबाला बढ़ा है। चुनाव में पैसा खर्च करने के लिए राजनीतिक दलों को चंदा लेने होता है, जो अब चुनावी बॉन्ड से आता है। चुनावी बॉन्ड को लेकर कौल की राय है कि यह पारदर्शिता के नाम पर अस्पष्टता को वैध बना रहा है। लेन-देन को जिस तरह से गुप्त रखा गया है, उससे न तो दाता और न ही राजनीतिक दल को दाता की पहचान बताने की आवश्यकता है।

इसके अलावा, ऐसा लगता है कि अधिकांश चुनावी बांड कॉर्पोरेट संस्थाओं और धनी व्यक्तियों द्वारा खरीदे जा रहे हैं, क्योंकि मार्च 2018 और जुलाई 2019 के बीच खरीदे गए कुल इलेक्टोरल बॉन्ड का 91 प्रतिशत से अधिक हिस्सा उच्चतम मूल्य वर्ग के बॉन्डों का था। बता दें कि पार्टियों को चंदा देने के लिए एक हज़ार, दस हज़ार, एक लाख, दस लाख और एक करोड़ रुपए तक का बॉन्ड खरीदा जा सकता है।

ज्यादातर पैसा भाजपा को जा रहा है

पांच राज्यों में आगामी विधानसभा चुनावों से पहले, अक्‍तूबर की शुरुआत में चुनावी बांड की 28वीं किश्त की बिक्री को मंजूरी दी गई थी। दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट में इलेक्टोरल बॉन्ड स्कीम की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली याचिकाओं की सुनवाई चल रही है।

याचिकाकर्ताओं में ADR (एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स) भी शामिल है, जिसका कहना है कि मार्च 2018 में चुनावी बॉन्ड की पहली किस्त की खरीद हुई थी। वित्तीय वर्ष 2017-18 में खरीदे गए सभी चुनावी बांड का 95 प्रतिशत भाजपा को प्राप्त हुआ। 2018-19 में भाजपा को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा प्राप्त बांड से लगभग चार गुना अधिक मूल्य के बांड प्राप्त हुए थे।

इन आंकड़ों के आलोक में कौल कहती हैं कि “जब भाजपा के नीति निर्धारण और पूंजीपति उद्योगपतियों के बीच कथित सांठगांठ की जांच की जाती है, तो सरकार की जवाबदेही को लेकर सवाल उठते हैं। बड़े गुमनाम राजनीतिक दान अपने साथ मनी लॉन्ड्रिंग और रिश्वतखोरी की संभावनाएं लेकर आते हैं।”

जनता को जानने का हक नहीं

2016-17 से 2021-22 के बीच भाजपा को कुल जितना राजनीतिक चंदा मिला है, उसका 52% चुनावी बांड से आया है। यह 52 प्रतिशत 5,271.97 करोड़ रुपये है। दिलचस्प यह है कि चुनावी बॉन्ड से भाजपा को अकेले जितना चंदा मिला है, उससे कई गुना कम सभी पार्टी को संयुक्त रूप से मिला है। 2016-17 से 2021-22 के बीच भाजपा के अलावा सभी राजनीतिक दलों को चुनावी बॉन्ड से 1,783.93 करोड़ रुपये मिले हैं। ये आंकड़े ADR की रिपोर्ट से लिए गए हैं।

चुनावी बॉन्ड से सबसे अधिक चंदा पाने वाली पार्टी सत्ता में है और केंद्र सरकार के अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी का कहना है कि जनता को राजनीतिक दलों को मिल रहे पैसे का सोर्स जानने का हक नहीं है। बीते रविवार को अटॉर्नी जनरल ने सुप्रीम कोर्ट में लिखित दलील देकर बताया कि नागरिकों का जानने का अधिकार (right to know) उचित प्रतिबंधों के अधीन है। वेंकटरमणी ने कहा कि कुछ भी जानने का कोई सामान्य अधिकार नहीं हो सकता।

सरकार का पक्ष रखते हुए अटॉर्नी जनरल ने तर्क दिया कि नागरिकों को संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (ए) के तहत राजनीतिक दलों को इलेक्टोरल बॉन्ड स्कीम के तहत मिलने वाले चंदे का सोर्स जानने का अधिकार नहीं है।

वेंकटरमणी से पहले बतौर अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल भी सुप्रीम कोर्ट में केंद्र का पक्ष रखते हुए इलेक्टोरल बॉन्ड स्कीम का समर्थन कर चुके हैं। साल 2019 में जब याचिकाकर्ताओं ने कहा कि मतदाताओं को राजनीतिक दलों के चंदे का स्रोत जानने का अधिकार है तो वेणुगोपाल ने सुप्रीम कोर्ट में ही कहा, “मतदाताओं को यह जानने का अधिकार नहीं है कि राजनीतिक दलों के पास कहां से पैसा आ रहा है।”

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