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आतंक के एक और अध्याय का अंत

Jitendra Kumar by Jitendra Kumar
07/05/23
in राष्ट्रीय, समाचार
आतंक के एक और अध्याय का अंत
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तरनतारन। खालिस्तान कमांडो फोर्स का प्रमुख और कुख्यात आतंकी परमजीत सिंह पंजवड़की पाकिस्तान के शहर लाहौर में हत्या कर दी गई। जिस आतंकी को भारत की पुलिस 30 साल से ढूंढ रहा थी, उसे लाहौर में शूटरों ने ढेर कर दिया। खालिस्तान कमांडो फोर्स (केसीएफ) के प्रमुख परमजीत सिंह पंजवड़ उन कुछ उग्रवादी नेताओं में से था, जिसने 1990 के दशक के दौरान पंजाब में उग्रवाद की रीढ़ बनाई थी। उसने पंजाब में खालिस्तान के समर्थन की लहर जागृत कर दी थी।

यह पाकिस्तान में एक और आतंकवादी की हत्या थी, वो आतंकी जो भारत में वांछित था। लेकिन, यह भारत का इकलौता ऐसा मोस्ट वांटेड आतंकी नहीं है, जिसकी अज्ञात हमलावरों ने पाकिस्तान के अंदर गोली मारकर हत्या की है। पिछले एक साल के अंदर दो ऐसे अन्य आतंकवादियों की हत्या हो चुकी है, जिनकी भारत को बरसों से तलाश थी। इसमें पहला आतंकी हिजबुल मुजाहिदीन का शीर्ष कमांडर बशीर मीर उर्फ इम्तियाज आलम, जबकि दूसरा जैश एक मोहम्मद के टॉप आतंकी जहूर मिस्त्री था। इसके साथ ही तीन साल पहले खालिस्तान लिबरेशन फोर्स के नेता हरमीत सिंह उर्फ ​​हैप्पी पीएचडी की लाहौर के पास हत्या कर दी गई थी। अब एक बार फिर से पाकिस्तान में एक आतंकी की हत्या कर दी गई।

बैंक में काम करने वाला बना मोस्ट वांटेड आतंकी

परमजीत सिंह पंजवड़ उग्रवादियों में शामिल होने से पहले केंद्रीय सहकारी बैंक में काम करता था। केसीएफ के पूर्व प्रमुख सुखदेव सिंह सुखा उर्फ ​​जनरल लाभ सिंह पंजवड़ भी उसी गांव का था और उनके परिवार से संबंध हैं। पंजवड़ के विद्रोही बनने के लिए लाभ सिंह प्रेरणा का मुख्य स्रोत था। उसको देखकर बैंक में काम करने वाला एक साधारण सा आदमी देश का मोस्ट वांटेड आतंकी बन गया।

उग्रवादियों के गढ़ कहे जाने वाले तरनतारन जिले के पंजवार गांव में जन्मे परमजीत सिंह पंजवड़ 60 साल का था। यह गांव भारत-पाकिस्तान सीमा से ज्यादा दूर नहीं है। आतंकवाद के दौरान पंजवड़ अकसर चोरी-छिपे पाकिस्तान जाया करता था। वह पंजाब में बैठे-बैठे पाकिस्तान के साथ मिलकर देश की शांति को भंग कर रहा था।

लंबी है पंजवार के गुनाहों की लिस्ट

मनबीर सिंह चेहरू ने 1986 में खालिस्तान कमांडो फोर्स की स्थापना की थी। इसका मकसद बैंक डकैती, अपहरण व फिरौती के जरिये हथियारों के लिए धन जुटाना था। 1986 में मनबीर के मारे जाने के बाद पंजवड़ का चचेरा भाई लाभ सिंह इसका चीफ बना। 1990 में उसके मारे जाने के बाद पंजवड़ खुद को केसीएफ का चीफ घोषित कर दिया। इससे पहले वह सहकारी को आपरेटिव बैंक की सोहल शाखा में काम करता था। परजीत सिंह पंजवड़ के गुनाहों की लिस्ट बहुत लम्बी है।

पंजवड़ सीमा पार से भारत में अवैध हथियारों और ड्रग्स की सप्लाई का रैकेट चलाता था। उसे पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई का संरक्षण प्राप्त था। आईएसआई पंजवड़ का इस्तेमाल पंजाब प्रांत में खालिस्तानी अलगाववाद को बढ़ाने और आतंकी वारदातों को अंजाम देने में करती थी। उसने 30 जून 1999 में चंडीगढ़ पासपोर्ट कार्यालय के पास बम ब्लास्ट कराया था।

अधिकारियों के अनुसार कई हिंसक कृत्यों में भाग लेने के अलावा, उग्रवादियों और एआईएसएसएफ नेताओं के बीच मतभेदों के बीच अमृतसर में अखिल भारतीय सिख छात्र संघ (एआईएसएसएफ) के तत्कालीन महासचिव हरमिंदर सिंह संधू की हत्या करने की मुख्य आतंकवादी संगठनों की संयुक्त योजना को अंजाम देने के पीछे पंजवड़ का हाथ था।

सिख लेखक और विचारक सरबजीत सिंह घुमन ने कहा कि सोहन सिंह के नेतृत्व वाली पंथिक समिति में केसीएफ के प्रतिनिधि के रूप में, पंजवड़ ने सिख आतंकवादी और राजनीतिक समूहों द्वारा 1992 के विधानसभा चुनावों का बहिष्कार सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उसने पंजाब की राजनीति को भी बदलने की कोशिश की।

पाकिस्तान भागा था पंजवार

परमजीत सिंह पंजवड़ के खिलाफ जब पुलिस ने एक्शन लिया तो वह जान बचाने के लिए आतंकवाद के गढ़ पंजाब में शरण ली। जब पंजाब में आतंकवाद के लिए परिस्थितियां अब अनुकूल नहीं रहीं, तो वह स्थायी रूप से पाकिस्तान भाग गया और फिर कभी वापस नहीं आया। अधिकारियों के मुताबिक, पंजवड़ अनधिकृत रूप से पाकिस्तान में रह रहा था। भारत में पंजवड़ को सबसे बड़ा आतंकी घोषित कर दिया गया। 30 साल से वांछित रहा पंजवड़ पाकिस्तान में रह कर अपने गुनाहों का जाल बुनता रहा।

पिछले साल हुई थी पत्नी की मौत

पिछले साल सितंबर में, पंजवड़ ने अपनी पत्नी पलजीत कौर को खो दिया। उसकी पत्नी मृत्यु के समय जर्मनी में अपने बेटों शाहबाज़ सिंह और मनवीर सिंह के साथ थीं। उसका परिवार जर्मनी में रह रहा था। अमेरिकी गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी और दल खालसा ने उनकी पत्नी को श्रद्धांजलि देने के लिए शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के सहयोग से स्वर्ण मंदिर परिसर में एक समारोह का आयोजन भी किया था। कंवरपाल ने कहा था कि पंजवड़ की पत्नी को उसे देश छोड़ना पड़ा क्योंकि उसे यहां उत्पीड़न और यातना का सामना करना पड़ा।

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