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विपक्षी एकता पर भारी, राहुल की PM पद की उम्मीदवारी!

Jitendra Kumar by Jitendra Kumar
01/01/23
in राष्ट्रीय, समाचार
विपक्षी एकता पर भारी, राहुल की PM पद की उम्मीदवारी!
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2022 खत्म होने के साथ प्रधानमंत्री पद के विपक्षी दावेदारों को कांग्रेस का संदेश दो टूक है. कमलनाथ ने साफ कर दिया है कि 2024 में कांग्रेस की ओर से राहुल गांधी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार होंगे. हालांकि पार्टी का यह रुख चुनाव पूर्व विपक्षी एकता की गुंजाइश को और कमजोर कर सकता है. बीजेपी के खिलाफ विपक्षी एकता में बड़ा पेंच प्रधानमंत्री पद के चेहरे को लेकर है. नीतीश कुमार, स्टालिन, फारुख अब्दुल्ला, महबूबा सईद जैसे नेता चुनाव पूर्व विपक्षी गठबंधन के लिए कांग्रेस का साथ जरूरी मानते हैं. लेकिन ममता बनर्जी और चंद्रशेखर राव कांग्रेस से दूरी बनाए हुए हैं.

अखिलेश यादव को नीतीश कुमार का साथ तो पसंद है लेकिन विपक्षी एकता के लिए कांग्रेस को साथ लेने की उनकी कोशिशों से वे इत्तफाक नहीं रखते. मायावती भी इस मुद्दे पर खामोश हैं. संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान कांग्रेस द्वारा आहूत विपक्षी दलों की बैठक में आप पार्टी भले शामिल हुई हो लेकिन अरविंद केजरीवाल के कांग्रेस की अगुवाई कुबूल करने की उम्मीद कम है.

बिहार में बीजेपी का साथ छोड़ने के बाद विपक्षी एकता के लिए सक्रिय हुए नीतीश कुमार अन्य नेताओं के साथ सोनिया और राहुल गांधी से भी इस सिलसिले में मुलाकातें कर चुके हैं.वे जिस फार्मूले पर आगे बढ़े हैं , उसमे नेता पद का सवाल चुनाव नतीजों के बाद पर छोड़ा गया है. खुद नीतीश भी इस कुर्सी के दावेदार हैं. भविष्य में मुख्यमंत्री की कुर्सी वे तेजस्वी के लिए छोड़ने के संकेत देते रहते हैं. जाहिर है कि वे केंद्र में अपने लिए संभावनाएं तलाश रहे हैं. बीजेपी विरोधी कई क्षत्रप ऐसी ही सोच रखते हैं. उन्हें गठबंधन सरकार की स्थिति में अपने लिए उम्मीद नजर आती है.

राहुल की पदयात्रा ने दी कांग्रेसियों के सपनों को उड़ान
उधर कांग्रेस के नेता राहुल गांधी की पदयात्रा के संभावित नतीजों को लेकर काफी उत्साहित हैं. उनकी राय में इस लंबी पदयात्रा ने राहुल गांधी की नई छवि निर्मित की है. उन्हें वे अकेले नेता दिखते हैं जो मोदी और बीजेपी सरकार के खिलाफ गंभीरता से लड़ते नजर आ रहे हैं. यात्रा में उमड़ती भीड़ ने उन्हें राहुल के मोदी के विकल्प के तौर पर उभरने का भरोसा पैदा किया है. इसी भरोसे के चलते अन्य विपक्षी दलों को भरोसे लिए बिना वे राहुल गांधी को प्रधानमंत्री पद के चेहरे के तौर पर पेश करने की बात कर रहे हैं. क्या अन्य विपक्षी नेता इसे स्वीकार करेंगे? इसे नीतीश की प्रतिक्रिया से समझा जा सकता है.

एक और उन्होंने कहा कि राहुल गांधी की उम्मीदवारी में कोई हर्ज नहीं है. दूसरी ओर यह कहकर कि इस सवाल पर अन्य दलों से विचार करेंगे, गाड़ी के आगे काठ रखा दिया. राहुल की उम्मीदवारी पर एक राजी होने का सीधा मतलब होगा कि नीतीश कुमार, ममता बनर्जी और चंद्रशेखर राव जैसे नेता प्रधानमंत्री पद की अपनी चाहत को एक और कार्यकाल के लिए दफ़न करें. इसका दूसरा संदेश यह भी होगा कि बीजेपी विरोधी खेमा 2024 के चुनाव में मोदी के मुकाबले राहुल की अगुवाई में मैदान में होगा.

क्यों विपक्षी कुबूल करेंगे राहुल की अगुवाई?
बेशक कांग्रेसियों की पसंद और इकलौती उम्मीद राहुल गांधी हो सकते हैं. लेकिन अन्य विपक्षी चुनाव पूर्व उनकी अथवा कांग्रेस की अगुवाई कुबूल करेंगे इसकी संभावना नजर नहीं आती. इसकी वजह सिर्फ इतनी ही नहीं है कि वे मोदी को उखाड़ने के लिए विपक्षी एकता के नाम पर अपने आधार वोट बैंक में कांग्रेस को हिस्सेदारी दें, बल्कि इसी के साथ बड़ा सवाल है कि वे किस भरोसे राहुल के नेतृत्व में किसी करिश्में की उम्मीद करें? राहुल तो 2014 से मोदी के खिलाफ मैदान में हैं. वे पिछले दो लोकसभा चुनावों से अपना अभियान मोदी विरोध पर केंद्रित किए हुए हैं. कभी सूट बूट की सरकार तो कभी चौकीदार चोर के नारे के साथ इस लड़ाई को उन्होंने व्यक्तिगत बना दिया. नतीजे क्या रहे? मोदी को सत्ता से दूर रखने की बात दूर वे कांग्रेस पार्टी को औपचारिक विपक्ष के दर्जे लायक सीटें भी नहीं दिला सके.

राहुल नजर आए सुपर ह्यूमन, भगवान राम तक से तुलना!
राहुल गांधी की पदयात्रा ने दिल्ली में छोटा विराम लिया है. 3 जनवरी को वे यात्रा का शेष दूरी पूरी करने के लिए दिल्ली से निकलेंगे. इस बीच कांग्रेस के दो नेताओं के बयान काफी चर्चा में आए. सलमान खुर्शीद ने उन्हें सुपर ह्यूमन बता डाला. खंडाऊ प्रसंग के प्रतीक के जरिए भगवान राम तक से तुलना कर डाली. उधर कमलनाथ ने पीटीआई को एक इंटरव्यू में साफ ऐलान किया कि 2024 में राहुल कांग्रेस पार्टी के पीएम पद के उम्मीदवार होंगे. जाहिर है कि अगर पार्टी इस स्टैंड पर कायम रहती है तो कांग्रेस के साथ चुनाव पूर्व गठबंधन के आकांक्षी दलों को इस शर्त को स्वीकार करना होगा. क्या पार्टी यात्रा को इतना सफल मान चुकी है कि अकेले मुकाबले की स्थिति में भी राहुल की छवि के सहारे बीजेपी को रोक पाएगी?

राहुल की असफलताओं की है लंबी फेहरिस्त
राहुल गांधी 2004 से संसद में हैं. 2004 से 2014 के मध्य केंद्र में कांग्रेस की अगुवाई में यूपीए की सरकारों ने राज किया. ये वो समय था जब राहुल गांधी पीएम सहित कोई भी पद हासिल कर सकते थे. विपरीत इसके उन्होंने किसी भी जिम्मेदारी से खुद को मुक्त रखा. 2014 और फिर 2019 के लोकसभा चुनाव में पार्टी ने उन्हें पीएम पद का उम्मीदवार भले न घोषित किया हो लेकिन पार्टी के चेहरे के तौर पर उन्होंने मोदी विरोधी जबरदस्त अभियान चलाया. हालांकि वे बुरी तरह विफल रहे. राहुल गांधी का दुर्भाग्य है कि उनकी असफलताओं की लंबी फेहरिस्त है. दूसरी ओर उनका सौभाग्य है कि मतदाताओं के बीच लगातार ठुकराए जाने के बाद भी कांग्रेस पार्टी पर उनकी और उनके परिवार की पकड़ निर्विवाद है. वे ऐसे विरले नेता हैं जिन्हें जनता के बीच असफल माना जाता है लेकिन पार्टी के समर्थकों की उनसे उम्मीदें बरकरार हैं.

राहुल का पहला अभियान जिसमे है निरंतरता
कन्याकुमारी से कश्मीर तक की पदयात्रा राहुल गांधी के अब तक के राजनीतिक जीवन का पहला अभियान है जिसमें निरंतरता है और जिसकी सफलता के लिए राहुल पूरी संजीदगी से समय दे और परिश्रम कर रहे हैं. खुद राहुल और उनकी पार्टी इस यात्रा से बड़े नतीजों की उम्मीद कर रहे हैं. एक कि ये यात्रा उन्हें उस छवि से मुक्त करेगी जिसे बिगाड़ने के लिए खुद राहुल गांधी के मुताबिक बीजेपी लगातार करोड़ों रुपए खर्च कर रही है. दूसरी ओर इससे जनता जागी है और मोदी सरकार की असलियत जानकर उसे उखाड़ फेंकने के लिए तैयार हो चुकी है.

पदयात्रा की भीड़ क्या वोटों में बदलेगी ?
राहुल गांधी की पदयात्रा जिन रास्तों से गुजरी है, उसमे जुटने वाली भीड़ ने पार्टी कैडर में जोश भरा है. यात्रा में ऐसे चेहरे भी शामिल हुए अथवा हो रहे हैं , जिनका कांग्रेस से संबंध नहीं हैं. बेशक यात्रा का नाम और घोषित मकसद समाज और संप्रदायों में बीजेपी सरकार की वजह से बढ़ती दूरियों को पाटना, नफ़रत को मोहब्बत में बदलना और भारत को जोड़ना है लेकिन इससे किसे इनकार होगा कि ये कोई सामाजिक-धार्मिक नहीं अपितु एक राजनेता की राजनीतिक यात्रा है. ऐसी राजनीतिक यात्रा की सफलता का एक पैमाना सड़कों पर जुटने वाली भीड़ है लेकिन इसका असली परीक्षण इस भीड़ के वोटों में बदलने के जरिए होगा.

पदयात्रा के दौरान राहुल गांधी ने एक दिन गुजरात में चुनाव प्रचार किया था. वहां इस बार पार्टी न्यूनतम स्थान पर खिसक गई. दिल्ली ने भी उसे निराश किया. हिमाचल में उसे कामयाबी मिली लेकिन वहां हर बार सरकार बदलने का रिवाज चला आ रहा है ,जो इस बार भी दोहराया गया. 2024 की चुनौती के दस राज्यों के विधानसभा चुनाव होने हैं,जिनमें मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और कर्नाटक, तेलांगना, त्रिपुरा, नगालैंड, मिजोरम, मेघालय शामिल हैं. जम्मू कश्मीर में भी इसी साल चुनाव संभावित है. राहुल की पदयात्रा की सफलता की पैमाईश इन राज्यों में कांग्रेस के प्रदर्शन के जरिए भी होगी. दूसरी ओर इन राज्यों के नतीजे 2024 के लिए विपक्षी चेहरे के तौर पर उन्हें स्वीकार करने में बड़ी भूमिका तय कर सकते हैं.

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