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सरस्वती का मनन कर हिंदी के ‘महाप्राण’ बने निराला

Jitendra Kumar by Jitendra Kumar
25/01/23
in मुख्य खबर, साहित्य
सरस्वती का मनन कर हिंदी के ‘महाप्राण’ बने निराला

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गौरव अवस्थी। छायावाद के प्रमुख स्तंभ सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ की स्वघोषित जयंती। जानने वाले जानते ही हैं कि गद्य और पद्य दोनों विधाओं में हिंदी साहित्य को समृद्ध करने वाले महाप्राण निराला ने अपने ‘फक्कड़’ स्वभाव से साहित्य और समाज में नई लकीरें खींची। वह एकमात्र साहित्यकार हैं, जो अपने निराले अंदाज के चलते साहित्य से अधिक समाज में ‘किंवदंतियों’ में आज भी याद किए जाते हैं लेकिन कम लोग जानते हैं कि बांग्ला भाषी निराला जी ने एकलव्य की तरह हिंदी अपने समय की सचित्र मासिक पत्रिका ‘सरस्वती’ को पढ़कर ही सीखी थी। इसकी कहानी उनके अपने ‘जीवन चरित’ से ही सामने भी आती है।

छुआछूत और रूढ़ियों पर प्रहार करने वाले अपने चर्चित उपन्यास ‘कुल्ली भाट’ में निराला स्वीकार करते हैं कि हिंदी की ‘अज्ञानता’ का ज्ञान धर्मपत्नी मनोहरा देवी ने ही कराया-‘मुझे श्रीमतीजी की विद्या की थाह नहीं थी। एक दिन बात लड़ गई। मैंने कहा-‘ तुम हिंदी-हिंदी करती हो हिंदी में क्या है?’ उन्होंने कहा, ‘जब तुम्हें आती ही नहीं तब कुछ नहीं है।’ मैंने कहा-‘ हिंदी मुझे नहीं आती?’ उन्होंने कहा-‘ यह तो तुम्हारी जबान बतलाती है। बैसवाड़ी बोल लेते हो। तुलसीकृत रामायण पढ़ी है, बस। तुम खड़ी बोली का क्या जानते हो?’ तब मैंने खड़ी बोली का नाम भी नहीं सुना था। पंडित महावीर प्रसाद जी द्विवेदी, पंडित अयोध्या सिंह जी उपाध्याय, बाबू मैथिली शरण गुप्त जी तब मेरे स्वप्न में भी नहीं थे, जैसे आज हैं। श्रीमतीजी के हिंदी ज्ञान के आगे अपनी दाल न गलने की बात से लजाते हुए ही ‘गवहीं’ में गए निराला जी ससुराल (डलमऊ) से विदा लेकर गढ़ाकोला (घर) के बजाए सीधे कलकत्ते पहुंच जाते हैं। पत्नी की उलाहना ही उनमें हिंदी ज्ञान अर्जित करने की लालसा पैदा करती है। इसी लालसा में आचार्य द्विवेदी को मन ही मन ‘गुरु’ (द्रोणाचार्य) मानते हुए स्वयं को ‘एकलव्य’ बना लिया और माध्यम बनी सरस्वती। निराला ऐसे एकलव्य हैं, जिनकी शिक्षा आजन्म पूरी ही नहीं होती।

‘कुल्ली भाट’ उपन्यास में ही निराला ने लिखा- ‘एक आग दिल में लगी थी, मैंने हिंदी नहीं पढ़ी। बंगाल में हिंदी का कोई जानकार नहीं था। राजा के सिपाही जो हिंदी जानते थे, वह मुझे मालूम थी-ब्रजभाषा। खड़ी बोली के लिए अड़चन पड़ी। तब हिंदी की दो पत्रिकाएं थीं- सरस्वती और मर्यादा। सरस्वती चेहरे की भी सरस्वती थी और मर्यादा अमर्यादा। दोनों मंगाने लगा। सरस्वती पढ़कर भाव अनायास समझने लगा। मैं रात 2-2 और 3-3 बजे तक सरस्वती लेकर एक-एक वाक्य संस्कृत, अंग्रेजी और बांग्ला व्याकरण के अनुसार सिद्ध करने लगा। ऐसी अनेक अड़चनें पार कीं। आचार्य द्विवेदी जी को गुरु माना लेकिन शिक्षा अर्जुन की तरह-नहीं एकलव्य की तरह पाई।’

‘महावीर प्रसाद द्विवेदी और हिन्दी नवजागरण’ (पृ. 391) में रामविलास शर्मा लिखते हैं-‘ सरस्वती के अंकों का जैसा मनन निराला ने किया था, वैसा अन्य किसी हिंदी लेखक या पाठक ने न किया था। जब 1921 में उन्होंने द्विवेदी जी को लिखा था- ‘हिंदी सिखाइए’ तब तक वह सरस्वती के अंक घोटकर इतनी हिंदी सीख चुके थे कि बाद को सीखने के लिए बहुत कम रह गया था। सरस्वती के अध्ययन का प्रभाव भी उनकी गद्य शैली पर परिलक्षित होता है।’

सच है कि अपने सिद्धांतों पर अडिग आचार्य द्विवेदी से निराला को समय रहते सरस्वती का सहारा नहीं मिला लेकिन बावजूद इसके निराला में आचार्य के प्रति आदर कम नहीं हुआ। निराला ने ‘द्विवेदी युग’ के लेखकों में ‘पूज्य’ केवल आचार्य द्विवेदी को ही माना। महाप्राण निराला के कथन में द्विवेदी जी के प्रति ‘ आंतरिक श्रद्धा’ एक नहीं अनेक बार व्यक्त होती है। रामविलास शर्मा लिखते हैं-‘द्विवेदी जी के प्रति निराला की श्रद्धा ज्ञानजन्य थी।’

प्रयाग में द्विवेदी जी को अभिनंदन ग्रंथ भेंट किए जाने पर निराला जी ने सुधा पत्रिका के जुलाई 1933 के अंक में ‘आचार्य अमर हों!’ शीर्षक से संपादकीय टिप्पणी लिखी-‘ वह उस दिन कैसे भव्य लगते थे। कभी उनके मुख मंडल पर बृहस्पति का पांडित्य प्रतिबिंबित हो उठता था तो कभी स्वयं सरस्वती की प्रतिभा। हम दोनों (राष्ट्रभाषा और आचार्य) ही के उपासक हैं। ऐसे स्नेही पथ प्रदर्शक, ऐसे उदार गुरु, ऐसे भक्तवत्सल देवता, ऐसे निरभिमान आचार्य पाकर हम अपने को धन्य समझते हैं। आचार्य हिंदी के गौरव हैं।’ रामविलास शर्मा लिखते हैं-‘निराला ने द्विवेदी जी के जीवन काल में ही उनके कार्य अपनाए। उसका अध्ययन किया और विकास भी। श्रद्धा की यह रचनात्मक अभिव्यंजना वृहदाकार अभिनंदन ग्रंथों से अधिक महत्वपूर्ण है।’

गुरु-शिष्य का यह संबंध एकांगी नहीं था। निराला ने भले ही अपने को ‘एकलव्य’ सा शिष्य माना हो लेकिन उनकी प्रतिभा से प्रसन्न आचार्य द्विवेदी को निराला जी भी अतिप्रिय थे। इसका प्रमाण ‘स्वामी सारदानंद जी महाराज और मैं’ (कहानी, संस्मरण, लेख या निबंध आप जो भी मानें) में निराला स्वयं देते हैं -‘एक साधारण से विवाद पर महिषादल राज्य की नौकरी नामंजूर इस्तीफे पर भी छोड़कर मैं देहात (गढ़ाकोला) में अपने घर रहता था। साहित्य में द्विवेदी जी का गुरुत्व मैं उन्हीं के गुरुत्व के कारण मानता था (मानता भी हूं)। अपने किसी अर्थ निष्कर्ष या स्वार्थ लघुत्व के लिए नहीं। पर इष्ट तो निर्भर भक्त की भक्ति की ओर देखता ही है। इसी निबंध में वह लिखते हैं -‘ द्विवेदी जी भी मेरी स्वतंत्रता से पैदा हुई आर्थिक परतंत्रता पर विचार करने लगे। उनकी कोशिश- मैं किसी अखबार के दफ्तर में जगह पा जाऊं-कारगर रही। दो पत्र उन्होंने अपनी आज्ञा से चिन्हित कर गांव के पते पर मेरे पास भेज दिए, एक काशी के प्रसिद्ध रईस राजनीतिक नेता का था, एक कानपुर ही का। मालूम हो कि यह सब उदारता पूज्य द्विवेदी जी अपनी तरफ से स्नेहवश कर रहे थे।’

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी और निराला समकालीन न थे। दोनों में 32 साल का फर्क। आचार्य द्विवेदी 1864 मे दौलतपुर (रायबरेली ) में जन्मे और निराला का जन्म 1896 में महिषादल (पश्चिम बंगाल) में हुआ लेकिन दोनों का संबंध बैसवारे से है। निराला का पैतृक गांव गढ़ाकोला (उन्नाव ) भी बैसवारे में ही। गुरु-शिष्य के इस पवित्र रिश्ते की नींव है आचार्य द्विवेदी और निराला के व्यक्तित्व और कृतित्व में साम्य। दोनों ही महापुरुष वैचारिक, व्यावहारिक एवं सैद्धांतिक धरातल पर समान हैं। दोनों सिद्धांतों के पक्के। राष्ट्रभाषा और राष्ट्र के प्रति समर्पित। गरीबों, शोषितों, वंचितों दुखों के गायक-विधायक और उन्नायक। किसानों की दुर्दशा पर दोनों की ही कलम चली। किसानों के संगठन के मामले में निराला आचार्य से एक कदम आगे जाकर आंदोलनों में शामिल भी होते हैं।

‘महावीर प्रसाद द्विवेदी और हिन्दी नवजागरण’ ( पृष्ठ-390) में रामविलास शर्मा की भी यही स्थापना है-‘ द्विवेदी जी प्रणाम करने वालों को आशीर्वाद न देकर ‘नमो नमः’ कहा करते थे। निराला ने ‘नमो नमः’ कहना उन्हीं से सीखा। दोनों के स्वभाव में विनम्रता थी। मर्यादा का भी दोनों बराबर ही ध्यान रखते थे। द्विवेदी जी ने जैसे लक्ष्मीधर बाजपेई के जूते पोंछ कर रख दिए थे, वैसे ही निराला ने जानकी वल्लभ शास्त्री के जूते नीचे से उठाकर ऊपर की मंजिल में लाकर रखे थे। मर्यादा की सीमा लांघने पर दोनों ही फटकार लगा देते थे, सामने चाहे कितना ही कोई बड़ा आदमी क्यों न हो? दोनों को उनके जीवनकाल में ही लोग ऋषि बनाकर पूजने लगे थे। इस पूजा भाव से उनके उपासक उनके साहित्य की उपलब्धियों को ढंक लेते हैं। दोनों ही घोर तार्किक हैं। दोनों का प्रबल विरोध होता है और दोनों संग्राम में योद्धा की तरह डटे भी रहते हैं।’

यह परमतत्व है कि निराला आचार्य का शिष्यत्व ‘एकलव्य’ की तरह ग्रहण करते हैं लेकिन बिना किसी शिकवा-शिकायत के। निराला का एक ही लक्ष्य है – हिंदी ज्ञान का संधान। इसमें वह सफल नहीं अतिसफल और अतिसफल से अधिक सार्थक। सार्थक इसलिए कि उनका अधिकांश लेखन (गद्य और पद्य दोनों ) परमार्थक है। देवी, कुल्ली भाट, चतुरी चमार, हिरनी, परिवर्तन, न्याय, राजा साहब को ठेंगा दिखाया आदि आदि..! एकलव्य की तरह ज्ञान अर्जित करने वाले के मन में गुरु के प्रति ऐसी ‘श्रद्धा’ की कल्पना न तब की जा सकती थी और न अब लेकिन निराला तो निराले थे। ऐसे ‘निराले’ निराला की इस वसंत पंचमी को 127 वीं जयंती है । हिंदू समाज में जिस तरह बसंत पंचमी पर मां ‘सरस्वती’ की पूजा-आराधना का विधान है, उसी तरह साहित्यिक समाज में निराला का।
डॉ शिव मंगल सिंह ‘सुमन’ की इन पंक्तियों-
‘तुम जीवित थे तो सुनने का जी करता था,
तुम चले गए तो गुनने का जी करता है,
तुम सिमटे थे तो सहमी सहमी सांसें थी,
तुम बिखर गए तो चुनने का जी करता है।’
के साथ वसंत पंचमी पर सरस्वती के वरदपुत्र महाप्राण निराला को शत्-शत् नमन!

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