शिलॉन्ग : पूर्वोत्तर में इन दिनों चुनावी मौसम काफी गरम है। इसकी वजह हैं आगामी विधानसभा चुनाव। निर्वाचन आयोग ने पूर्वोत्तर के तीन राज्यों -त्रिपुरा, मेघालय और नागालैंड- में विधानसभा चुनाव की तारीखों की घोषणा कर दी है। इस साल होने वाले चुनावों के पहले दौर के तहत जहां त्रिपुरा में 16 फरवरी को मतदान होगा तो वहीं मेघालय और नगालैंड में एक ही दिन 27 फरवरी को मत डाले जाएंगे। तीनों राज्यों में मतगणना दो मार्च को होगी।
मेघालय में पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) खूब चर्चा में है। जानकर हैरानी होगी कि 2018 के विधानसभा चुनावों में टीएमसी को एक भी सीट नहीं मिली थी लेकिन वर्तमान में ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली पार्टी राज्य में मुख्य विपक्षी पार्टी है। TMC नवंबर 2021 में अचानक प्रमुख विपक्षी दल बन गई, जब पूर्व सीएम मुकुल संगमा के नेतृत्व वाले 17 में से 12 कांग्रेस विधायक इसमें शामिल हुए।
पूर्वोत्तर के तीन राज्यों में से टीएमसी की सर्वोच्च प्राथमिकता मेघालय है। यह एक ऐसा राज्य जहां दीदी को कुछ हद तक सफलता मिलने की उम्मीद है। दिवंगत लोकसभा अध्यक्ष पीए संगमा के बेटे मुकुल संगमा मेघालय के लोकप्रिय नेता हैं। अभिषेक बनर्जी ने कथित तौर पर उनके साथ पर्दे के पीछे डील की है। कहा जा रहा है कि मुकुल संगमा ने राज्य में जाकर चुपचाप जमीन तैयार की। राज्य में अब बड़ी संख्या में कांग्रेस के नेता टीएमसी में शामिल हो चुके हैं। नतीजतन, टीएमसी मेघालय में नंबर दो पार्टी है।
दिवंगत पीए संगमा ममता बनर्जी के समकालीन थे जब वह टीएमसी में शामिल हुए थे। बाद में वह राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में चले गए लेकिन फिर टीएमसी में लौट आए। अब अभिषेक बनर्जी और जूनियर संगमा के बीच अच्छे रिश्ते हैं, जो स्पष्ट रूप से टीएमसी के लिए फायदेमंद होगा। इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, टीएमसी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, ‘हम वहां (मेघालय) भले ही सरकार नहीं बना सकते लेकिन हम एक सम्मानजनक विपक्ष बना सकते हैं।’ टीएमसी को वहां सरकार बनाने के लिए आक्रामक प्रचार करना होगा।
मुकुल संगमा टीएमसी के विधायक दल के नेता हैं, जबकि पूर्व अध्यक्ष चालर्स पिंग्रोपे अब पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष हैं। गारो समुदाय से आने वाले संगमा और खासी समुदाय के पिंग्रोप दो मजबूत नेताओं के रूप में उभरे हैं। दोनों को टीएमसी दृढ़ता से “भूमि के पुत्र” के रूप में पेश कर रही है। इसकी वजह यह भी है कि टीएमसी “बंगाली पार्टी” के टैग को हटाने और आदिवासी-वोटों में पैठ बनाने की कोशिश कर रही है।
राज्य में जीरो हो गई सबसे बड़ी पार्टी
2018 में कांग्रेस 21 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी, लेकिन बाद में इन विधायकों के TMC, एनपीपी में शामिल होने के बाद वर्तमान में उसका कोई विधायक नहीं है। यहां तक कि अब कांग्रेस विधानसभा चुनाव के लिए अपने उम्मीदवारों की सूची तैयार करने के लिए भी संघर्ष कर रही है।
गुजरात जैसा होगा मेघालय का हाल?
लेकिन क्या कांग्रेस की जगह कब्जाने वाली टीएमसी बीजेपी का पत्ता काट सकती है? यह कुछ ऐसा है जिसे हमने 2022 के गुजरात विधानसभा चुनावों में देखा। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने राज्य में सक्रिय रूप से प्रचार किया और आम आदमी पार्टी अपनी पैठ बनाने में सफल रही। लेकिन चुनावों में कांग्रेस पार्टी की हार भी देखी गई और परिणामस्वरूप भाजपा ने एक असाधारण जीत हासिल की। मेघालय में एक बार फिर यह खेल देखने को मिल सकता है।
सबसे बड़ी पार्टी बनी थी कांग्रेस
मेघालय में नेशनल पीपुल्स पार्टी (एनपीपी) की सरकार है। एनपीपी पूर्वोत्तर की एकमात्र पार्टी है जिसे राष्ट्रीय दल के तौर पर मान्यता हासिल है। मेघालय में कुल मतदाताओं की संख्या करीब 21 लाख है। वर्तमान में मेघालय में नेशनल पीपुल्स पार्टी (एनपीपी) की अगुवाई में यूनाइटेड डेमोक्रेटिक पार्टी (यूडीपी), पीपुल्स डेमोक्रेटिक फ्रंट (पीडीएफ), भाजपा तथा हिल स्टेट पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (एचएसपीडीपी) की गठबंधन सरकार है और कोनराड संगमा इसका नेतृत्व कर रहे हैं।
हालांकि, आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर अभी तक किसी भी राजनीतिक दल ने गठबंधन बनाकर चुनाव लड़ने की घोषणा नहीं की है। मेघालय के पिछले चुनाव में किसी भी दल को बहुमत नहीं मिला था। कांग्रेस 21 सीट पर जीत दर्ज कर सबसे बड़ी पार्टी बनी थी, लेकिन वह बहुमत से दूर रह गई। कोनराड संगमा के नेतृत्व वाली एनपीपी 19 सीट पर जीत के साथ दूसरे नंबर पर थी। प्रदेश की यूडीपी के छह सदस्य चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे थे।
एनपीपी और भाजपा लड़ेंगे मिलकर चुनाव
इसी प्रकार राज्य की पीडीएफ को चार सीट पर जीत मिली थी और भाजपा तथा एचएसपीडीपी को दो-दो सीट पर सफलता मिली थी। चुनावी नतीजों के बाद संगमा ने भाजपा, यूडीपी, पीडीएफ, एचपीपीडीपी और एक निर्दलीय के साथ मिलकर गठबंधन की सरकार बनाई और वह राज्य के मुख्यमंत्री बने। साल 2018 के विधानसभा चुनाव में एनपीपी और भाजपा के बीच गठबंधन था। इस बार के चुनाव में एनपीपी और भाजपा ने अलग-अलग चुनाव लड़ने की घोषणा की है।
