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मुझे मालूम है पानी कहाँ ठहरा हुआ होगा

फ्रंटियर डेस्क by फ्रंटियर डेस्क
01/06/26
in लेख
मुझे मालूम है पानी कहाँ ठहरा हुआ होगा
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I know where the water will be stagnant
प्रशांत सिंह

प्रशांत सिंह

एक दिन एक रेलवे स्टेशन पर अपने खास मित्र शिवम के साथ खड़ा था। हम दोनों स्टेशन जल्दी पहुंच गए थे और स्टेशन भी बहुत व्यस्त नहीं था तो हमने उस दिन ट्रेन के कलपुर्जों का ठीक से जायजा लेने की ठानी। हम ये देख रहे थे कि काम काज का बटवारा कैसे होता है, ट्रेन का इंजन कैसे बदला जाता है वगैरह-वगैरह। इतने में मेरी नजर पड़ी दो डिब्बों को जोड़ने के लिए एक फिट से भी कम जगह में खड़े एक आदमी पर। वो हाथ से दोनों डिब्बों को जोड़ने वाली बड़ी सी कील सही ठिकाने पर डालने की कोशिश कर रहे थे। मेरे मुंह से निकला भाई कुछ भी हो जाय ये काम मत करना।

इस प्रतिक्रिया का डिब्बा जोड़ने के काम और उससे मिलने वाले दाम से कोई लेना देना नहीं था। एक तस्वीर आंखों में उतर आई थी जो कुछ ही दिनों पहले मैने देखी थी। बिहार के बेगूसराय से आई थी वो तस्वीर। मैने कहा शिवम हम लोग कोई बिजनेस कर लेंगे पॉलिटिक्स में चले जाएंगे पर तुम ये वाला फॉर्म नही भरना यार।

यह मैं इसलिए बता रहा हूं कि (RRB Group D) का एग्जाम जिसमें सफल होने के बाद ये नौकरियां मिलती हैं उसमें एक करोड़ से ऊपर फॉर्म भरे जाते हैं हमारे देश में। यहां से बात शुरु करने की मुख्य वजह यह है कि मैं ये साफ करना चाह रहा था कि इस परीक्षा में सफल होने पे कोई बड़ा बंग्ला गाड़ी या नौकर चाकर नहीं मिलते पर इस तरह आदमी से खबर हो जाने का पूरा इंतजाम है।

NEET का पेपर फिर से लीक हुआ और यह देख कर अच्छा लग रहा है कि एक सवाल सामूहिक रूप से व्यवस्था से पूछा जा रहा है। परंतु सवाल यहां से नहीं पूछे जाने चाहिए। सवाल शुरू से पूछना पड़ेगा।

उत्तर भारत में आज भी एक बड़ा युवा वर्ग Staff Selection Commission (SSC) द्वारा ली जाने वाली CGL और CHSL परीक्षाओं पर आने वाले भविष्य के सपने टिकाए खड़ा है। रेलवे की NTPC और Group D जैसी नौकरियों से आस लगाने वालों की भरमार है। टीचर बनने का सपना संजोने वाले भी लाखों की भीड़ में हैं।

इन सभी लोगों की एक साझा समस्या है पेपर लीक। इस समस्या को सुलझाने के कुछ उपाय हैं। पहला उपाय ये है कि इनको किसी ठीक से कम्युनिकेशन में मास्टर आदमी से मोटिवेशन दिलवाया जाय कि देखिए सरकारी नौकरियां तो सिर्फ 2% ही हैं। इन सब संस्थानों में तो ऐसा होता रहता है आप अपनी युवावस्था की ऊर्जा का ठीक तरीके से इस्तेमाल करें, कोई उद्यम करे, कोई और रास्ता खोजें, आज तो आप के पास आकाश भर संभावनाएं हैं।

दूसरा है राजनीतिक पार्टियां अपने मेनिफेस्टो में एक दो करोड़ के आस पास नौकरियां देने का डेटा शामिल करें। और स्टार प्रचारक को इस काम में लगाएं कि वो परीक्षार्थियों को ये विश्वास दिला सकें कि हम जैसे ही सत्ता में आएंगे पहले इस तरह की धांधली पर रोक लगाएंगे तब जाकर पानी चाय पियेंगे।

दो पंचवर्षीय योजना जितने समय को दिमाग में लेकर तैयारी करने वाले “युवा भारत” के युवाओं को संघर्ष की कविताओं और शेरों से भी कुछ मरहम लगाया जा सकता है। सोच के देखिए नीलोत्पल मृणाल सुना रहे हों – “कोई बलिया, देवरिया, कोई आजमगढ़ से आया है,

हजारों गाँव इलाहाबाद पैदल चलकर आया है,
बाबूजी चिंता न कर … कोई ये कह कर आया है,
कई बेटियों का हौसला भी बाप से लड़कर आया है,
हजारों ख्वाब का लश्कर पटरिया चढ़कर आया है।”
— तो कौन सा पत्थर दिल होगा जिसे सुकून नहीं मिलेगा।

इसके बाद आते हैं कोचिंग इंस्टिट्यूट और सेलिब्रिटी टीचर। हर परीक्षा की सबसे सटीक तैयारी का दावा इनकी जुबान पर है। सबने ये प्रोफेशन सिर्फ समाज सेवा के लिए चुना है। इस समाज सेवा के अंतर्गत बीच- बीच में सेमिनार, मुफ्त पुस्तक वितरण, और भंडारे का आयोजन किया जाता है। इन सभी गुरुजनों के पुण्य प्रताप से विद्यार्थी पेपर लीक होने के दंश को झेलने का साहस जुटा लेता है। और फिर से लग जाते हैं अगली नोटिफिकेशन और डेडलाइन के चक्कर में।

बिना किसी लागलपेट के कहूं तो इतनी सी बात है कि भीख नहीं मांग रहे हैं ये लोग। बरसों हुए इन्हें घरों से निकले, अब घर जाने की इच्छा नहीं बची। इस तंत्र में जहां रातों रात मंदिर, मस्जिद, पेड़, मकान, दुकान कुछ भी गायब कर देने की हिम्मत है वह यह पता नहीं लगा पा रही है कि इनकी जिंदगियों से खेल कौन रहा है।

ये सब झूठी अफवाहें हैं कि इलाहाबाद जिसे आज प्रयागराज कहते हैं, वहां बच्चों को दाल भात और चोखा बहुत पसन्द है। ये सबसे सस्ता खाना है जो यहां रहने वाला बच्चा अफोर्ड कर सकता है। चार रुपए की चाय वाली दुकान पर भीड़ इसलिए नहीं है कि वह सबसे अच्छी चाय बनाता है बल्कि इसलिए है कि वो चार रुपए में देता है। माननीय मुख्य न्यायाधीश जाने अनजाने जिस प्रजाति की बात कर रहे थे वो ऐसे ही शहरों में छोटे छोटे कमरों में बंद है।

मैने बहुत पास से देखी है इनकी बेचैनी, इन्हें पता है कि भाग्यउदय की सारी चाभियां कहां रखी गई हैं। ये वो लोग है जिन्होंने अपने सारे क्रिएटिव सपने भविष्य की गोंद में दे रखे हैं। किसी को घूमने लद्दाख जाना है, किसी के प्रेम की परिणति (culmination) इस बात पर निर्भर करती है कि एग्जाम टाइम पर हो, और सिलेक्शन हो। किसी को पेंटिंग का शौक है, किसी ने गिटार और तबला सीखने का फैसला एग्जाम के रिजल्ट पर डाल रखा है। कितनी लडकियों की आजादी की एक्सपायरी डेट आगे बढ़ने के बाद भी समाप्त हो रही है।

छोटे- छोटे कमरों में रह कर जिंदगी गुजार रहे ये लोग जानते हैं कि दिक्कत कहां है। दर्जनों से अधिक एग्जाम के पेपर लीक होने की सूचना है। प्रजातंत के पहरेदारों और पालनहारों अब पानी सर से ऊपर जा रहा है। यदि ईश्वर में विश्वास करते हैं तो बद्दुआ से डरिए। यदि नहीं करते तो दुनिया का इतिहास पढ़िए। एसी के कमरों में बैठ कर इनका भाग्य लिखने वालों, सुबह उठने पर भी पसीने से भीगी पीठ लिए ये लोग जिस दिन अपना सब्र खोएंगे, आपकी नॉनरोटी और जाम गले से नीचे नहीं जाएगा।

पता है सब हमें –
ये सारा जिस्म झुककर बोझ से दुहरा हुआ होगा,
मैं सजदे में नहीं था, आपको धोखा हुआ होगा।
यहाँ तक आते-आते सूख जाती हैं कई नदियाँ,
मुझे मालूम है पानी कहाँ ठहरा हुआ होगा।
(दुष्यंत कुमार)

अगर आप यहां तक आ गए हैं तो मेरी एक गुज़ारिश और मान लीजिए, आपने बाल मोहन पाण्डेय की नज़्म “अंधभक्त” नहीं सुनी या पढ़ी तो कृपया सुनिएगा जरूर।

प्रशांत सिंह (लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग में विद्यार्थी हैं।)

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