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भारत के ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ का इन 7 देशों में छिपा है मूल-मंत्र?

Jitendra Kumar by Jitendra Kumar
12/12/24
in राष्ट्रीय, समाचार
भारत के ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ का इन 7 देशों में छिपा है मूल-मंत्र?
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नई दिल्ली: केंद्र की मोदी सरकार की कैबिनेट ने 12 दिसंबर 2024 को ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ बिल को मंजूरी देकर चुनावी प्रक्रिया में एक ऐतिहासिक कदम उठाया है। सूत्रों के अनुसार, अब जल्द ही शीतकालीन सत्र में इसे पेश किया जाएगा।

इसका मुख्य उद्देश्य भारत में संसदीय और विधानसभा चुनावों को एक साथ कराना है, ताकि चुनावी खर्च और प्रशासनिक जटिलताओं को कम किया जा सके। इस प्रस्ताव को लागू करने से पहले भारत ने कई देशों की चुनावी मॉडल्स का अध्ययन किया। इससे यह समझने का प्रयास किया गया कि उन देशों के मॉडल भारत में किस हद तक प्रभावी हो सकते हैं। यहां बताया गया है कि कमेटी ने किन-किन देशों से क्या सीखा….

दक्षिण अफ्रीका: आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली

क्या है चुनावी मॉडल: देश में राष्ट्रीय और प्रांतीय चुनाव हर पांच साल में एक साथ होते हैं। यहां चुनाव ‘पार्टी-सूची आनुपातिक प्रतिनिधित्व’ प्रणाली पर आधारित है, जिसमें पार्टियों को उनके द्वारा प्राप्त वोटों के अनुपात में सीटें दी जाती हैं। राष्ट्रीय विधानसभा (जो भारत की लोकसभा के समान है) और प्रांतीय विधानसभाओं (राज्य विधानसभाओं के समान) के चुनाव एकल-सदस्यीय निर्वाचन क्षेत्रों में ‘फ़र्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट’ वोटिंग प्रणाली द्वारा संपन्न होते हैं। हालांकि, नगरपालिका चुनाव अलग से होते हैं, जो आमतौर पर हर पांच साल में होते हैं लेकिन राष्ट्रीय चुनावों के साथ मेल नहीं खाते।

दक्षिण अफ्रीका में स्वतंत्र चुनाव आयोग (IEC) चुनाव प्रबंधन और निष्पक्षता के लिए जिम्मेदार होता है। मतदाता पंजीकरण के आधार पर, उन्हें एक मतदान जिला सौंपा जाता है, और मतदाता चुनाव के दिन अपने जिले से बाहर रहकर भी वोट कर सकते हैं, हालांकि इसके लिए अतिरिक्त कागजी कार्रवाई की आवश्यकता होती है।

क्या सीखा: दक्षिण अफ्रीका में राष्ट्रीय और प्रांतीय चुनाव एक साथ कराए जाते हैं। इस प्रक्रिया में पार्टियों को मिले वोटों के अनुपात में सीटें दी जाती हैं। हालांकि, नगरपालिका चुनाव अलग होते हैं। भारत में इस मॉडल को अपनाने पर स्थानीय निकाय चुनावों के लिए यह प्रणाली कारगर साबित हो सकती है।

स्वीडन: एक साथ चुनावों की प्रणाली

क्या है चुनावी मॉडल: स्वीडन में संसद (Riksdag), काउंटी काउंसिल और म्युनिसिपल काउंसिल के चुनाव हर चार साल में एक साथ होते हैं। यह चुनाव हर चार साल में सितंबर के दूसरे रविवार को आयोजित किए जाते हैं। स्वीडन में राजनीतिक दलों को उनकी पार्टी के वोट प्रतिशत के आधार पर सीटें मिलती हैं। इस प्रणाली को ‘आनुपातिक प्रतिनिधित्व’ कहा जाता है। इसके अलावा, स्वीडन में यूरोपीय संसद के लिए भी चुनाव होते हैं, जो हर पांच साल में जून में आयोजित किए जाते हैं।

क्या सीखा: स्वीडन में हर चार साल में संसद, काउंटी काउंसिल और म्युनिसिपल काउंसिल के चुनाव एक साथ कराए जाते हैं। यह प्रणाली भारत के लिए आदर्श मानी गई है क्योंकि यहां भी विभिन्न स्तरों पर चुनाव होते हैं। स्वीडन में राजनीतिक दलों को उनके वोटों के आधार पर सीटें दी जाती हैं, जिससे चुनावी प्रक्रिया में संतुलन बना रहता है।

जर्मनी : प्रोपोर्शनल रिप्रजेंटेशन और डायरेक्ट वोटिंग

क्या है चुनावी मॉडल: जर्मनी में बुंडेस्टैग (निचला सदन), लैंडटैग्स (राज्य विधानसभाएं) और स्थानीय चुनाव एक साथ होते हैं। यहां भी आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली लागू है। जर्मनी के मतदाता अपने उम्मीदवार को दो वोट देते हैं-एक सीधे उम्मीदवार के लिए और दूसरा पार्टी के लिए। बुंडेस्टैग की 598 सीटों का आवंटन एक जटिल प्रणाली के आधार पर किया जाता है, जिसमें प्रत्यक्ष निर्वाचन विजेताओं और पार्टी सूचियों के आधार पर सीटें आवंटित की जाती हैं।

क्या सीखा: जर्मनी में चुनावी प्रणाली में जनता को दो वोट मिलते हैं-एक उम्मीदवार के लिए और दूसरा पार्टी के लिए। यह मॉडल भारत के लिए संसदीय और विधानसभा चुनावों में संतुलन बनाए रखने में मददगार हो सकता है। इससे राजनीतिक स्थिरता के साथ-साथ बेहतर प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जा सकता है।

इंडोनेशिया: दुनिया का सबसे बड़ा एकदिवसीय चुनाव

क्या सीखा: इंडोनेशिया ने 2019 में राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, संसद और स्थानीय निकायों के चुनाव एक साथ कराए थे। यह चुनाव दुनिया का सबसे बड़ा एकदिवसीय चुनाव था, जिसमें 200 मिलियन से अधिक मतदाताओं ने हिस्सा लिया। भारत के लिए यह प्रेरणादायक हो सकता है, क्योंकि यहां भी बड़े पैमाने पर चुनाव कराए जाते हैं।

फिलीपींस: एक साथ राष्ट्रीय और स्थानीय चुनाव

क्या सीखा: फिलीपींस में 1995 से राष्ट्रीय और स्थानीय चुनाव एक साथ कराए जा रहे हैं। हर तीन साल में चुनाव होते हैं, जिससे देश के चुनावी खर्च और प्रशासनिक जटिलताओं में कमी आई है। भारत के लिए यह मॉडल चुनावी प्रक्रिया को सरल और प्रभावी बना सकता है।

क्या है इंडोनेशिया और फिलीपींस का चुनावी मॉडल?

इंडोनेशिया में 2019 से राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, संसद और स्थानीय निकायों के चुनाव एक ही दिन कराए जाते हैं। इसे दुनिया का सबसे बड़ा एकदिवसीय चुनाव माना जाता है, जिसमें करीब 200 मिलियन मतदाता शामिल होते हैं। इसी तरह, फिलीपींस में 1995 से राष्ट्रीय और स्थानीय चुनाव एक साथ कराए जाते हैं। हर तीन साल में होने वाले चुनावों में राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, और अन्य स्थानीय अधिकारियों का चुनाव होता है। फिलीपींस की चुनाव प्रणाली मिश्रित-सदस्यीय बहुलता प्रणाली पर आधारित है।

बेल्जियम चुनावी मॉडल

बेल्जियम में पांच प्रकार के चुनाव होते हैं-यूरोपीय, संघीय, क्षेत्रीय, प्रांतीय, और नगरपालिका चुनाव। संघीय चुनाव हर पांच साल में होते हैं और अक्सर यूरोपीय चुनावों के साथ होते हैं। 1999 और 2014 में, बेल्जियम ने संघीय और क्षेत्रीय चुनाव एक साथ कराए। यहां के नागरिकों के लिए मतदान अनिवार्य है, और 18 से 65 वर्ष की आयु के लोगों के लिए अनुपालन न करने पर जुर्माना भी लगाया जा सकता है।

जापान का चुनावी मॉडल

जापान में प्रधानमंत्री की नियुक्ति सबसे पहले राष्ट्रीय सभा द्वारा की जाती है और उसके बाद सम्राट द्वारा उसे स्वीकार किया जाता है।

क्यों जरूरी है वन नेशन, वन इलेक्शन?

‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ का मुख्य उद्देश्य देशभर में एक ही समय पर चुनाव कराना है। यह व्यवस्था न केवल चुनावी खर्च को कम करेगी, बल्कि चुनावी प्रक्रिया में स्थिरता और निरंतरता भी लाएगी। बार-बार चुनावों से देश की राजनीति में अस्थिरता आती है, जिससे प्रशासनिक कामकाज पर भी असर पड़ता है। इस प्रस्ताव से संसाधनों का बेहतर उपयोग हो सकेगा और चुनावी प्रचार से जुड़ी गतिविधियों पर कड़ी निगरानी रखी जा सकेगी।

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