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सांसदी जाना राहुल गांधी के लिए संजीवनी?

Jitendra Kumar by Jitendra Kumar
26/03/23
in राष्ट्रीय, समाचार
सांसदी जाना राहुल गांधी के लिए संजीवनी?
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नई दिल्ली : लोकसभा सदस्यता से अयोग्य ठहराए जाने के बाद कांग्रेस नेता राहुल गांधी को विपक्षी दलों का जोरदार समर्थन मिला है। कांग्रेस आलाकमान इसे सत्ताधारी भाजपा के विरोधी दलों को एकजुट करने के बड़े मौके पर तौर पर देख रहा है। दरअसल, मानहानि से जुड़े मामले में राहुल को 2 साल की सजा सुनाई गई और फिर अगले ही दिन सांसदी भी छिन गई। इस फैसले के विरोध में कई विपक्षी दलों की तीखी प्रतिक्रिया सामने आई है। संसद में मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने समर्थन के इस तरह के दुर्लभ प्रदर्शन का स्वागत किया और इस मौके को भुनाने के प्रयास में है।

राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत गांधी परिवार के वफादार माने जाते हैं। उन्होंने कहा कि लोग पहले अन्य दलों से नाखुश थे, क्योंकि वे एकसाथ नहीं आ रहे थे। वो भी ऐसे समय में जब देश सही दिशा में नहीं जा रहा था। एनडीटीवी की रिपोर्ट के मुताबिक, सीएम गहलोत ने कहा कि अब चीजें बदल रही हैं। कांग्रेस नेता ने कहा, ‘उन्होंने (विपक्षी दलों) हमारा समर्थन करना शुरू कर दिया है और हर कोई उनके समर्थन से खुश है।’ वहीं, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने भी इस समर्थन पर खुशी जाहिर की। उन्होंने कहा, ‘मैं उन्हें धन्यवाद देना चाहता हूं क्योंकि वे लोकतंत्र को बचाने के लिए हमारे साथ खड़े हैं।

जयराम बोले- विपक्षी दलों की एकता को आगे बढ़ाना होगा
कांग्रेस के सीनियर नेता जयराम रमेश भी कह चुके हैं कि विपक्षी दलों की एकता को सही तरीके से आगे बढ़ाने की जरूरत है। उन्होंने कहा था, ‘कांग्रेस अध्यक्ष संसद में हर दिन विपक्षी दलों के साथ बातचीत करते हैं। अब यह प्रयास बाहर भी करना होगा।’ दरअसल, अगले साल ही लोकसभा चुनाव होने हैं। ऐसे में विपक्षी दलों की एकता को लेकर सवाल लगातार उठ रहे हैं। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या विपक्ष के अधिकतर दल चुनाव से पहले एकसाथ आएंगे। अगर एकसाथ आते भी हैं तो क्या वे कांग्रेस का नेतृत्व स्वीकर करेंगे। या फिर कोई तीसरा मोर्चा उभर कर सामने आ सकता है। ऐसी कई अटकलें लगाई जा रही हैं मगर कुछ भी दावे के साथ कहना मुश्किल है।

विपक्षी दलों का नेतृत्व करने का कांग्रेस के पास मौका?
विपक्षी दलों का बंटा होना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भारतीय जनता पार्टी के लिए फायदेमंद है। गैर-बीजेपी आवाजों को एकजुट करने के प्रयासों के अभी भी सकारात्मक नतीजे दिखाई देने बाकी हैं। मालूम पड़ता है कि विपक्षी दल अपनी-अपनी महत्वाकांक्षाओं पर आम सहमति बनाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। क्षेत्रीय नेताओं की ओर से जब तीसरे मोर्चे को लेकर चर्चा तेज हुई तो कांग्रेस अलर्ट हो गई। कांग्रेस नेताओं ने जोर देकर कहा था कि इसके बिना कोई विपक्षी मोर्चा संभव नहीं है। पार्टी की ओर से कहा गया कि किसी तीसरी ताकत के उभरने से बीजेपी/एनडीए को फायदा ही होगा। खड़गे ने कहा था, ‘मौजूदा कठिन परिस्थितियों में कांग्रेस देश में एकमात्र ऐसी पार्टी है जो सक्षम और निर्णायक नेतृत्व प्रदान कर सकती है।’

सपा-टीएमसी-NCP समेत कई विपक्षी दलों ने उठाए सवाल
सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने शुक्रवार को दावा किया था कि राहुल गांधी को अयोग्य ठहराना भाजपा का ध्यान भटकाने का हथकंडा है। उन्होंने कहा, ‘उत्तर प्रदेश में भाजपा ने कई सपा नेताओं की सदस्यता छीन ली। आज कांग्रेस के सबसे बड़े नेता की सदस्यता ले ली गई। अगर हम चीजों को ऐसे ही देखें तो कई बीजेपी सदस्य भी अयोग्य करार दिए जा सकते हैं। अगर ईमानदारी से जांच की जाए तो कई भाजपा नेता भी अपने भाषणों-टिप्पणियों के लिए आयोग करार दिए जाएंगे। यह महंगाई, बेरोजगारी, उद्योपति मित्रों की ओर से भारत के पैसों को डुबाने जैसे मुद्दों से लोगों का ध्यान भटकाने का हथकंडा है।’

‘विपक्षी नेता बन रहे भाजपा का मुख्य निशाना’
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने राहुल की सदस्यता से अयोग्य ठहराये जाने के बाद कहा था कि देश का संवैधानिक लोकतंत्र निम्न स्तर तक गिर गया है। बनर्जी ने गांधी का नाम लिए बिना कहा कि विपक्षी नेताओं को उनके भाषणों के लिए अयोग्य घोषित किया जा रहा है। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की प्रमुख बनर्जी ने ट्वीट किया, ‘प्रधानमंत्री (नरेंद्र) मोदी के नए भारत में विपक्षी नेता भाजपा का मुख्य निशाना बन गए हैं! आपराधिक पृष्ठभूमि वाले भाजपा नेताओं को मंत्रिमंडल में शामिल किया जाता है। विपक्षी नेताओं को उनके भाषणों के लिए अयोग्य घोषित किया जाता है। आज हमने अपने संवैधानिक लोकतंत्र का एक नया निम्न स्तर देखा है।’ इस तरह की और भी कई प्रतिक्रियाएं विपक्षी नेताओं की ओर से आई हैं, जिनमें बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की अध्यक्ष मायावती, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी), शिवसेना (यूबीटी) के प्रमुख उद्धव ठाकरे प्रमुख हैं। अब देखना यह होगा कि कांग्रेस इस मौके को किस हद तक भुना पाती है।

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