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दिल्ली पर नीतीश की नजर, क्या यूपी हो सकता है लॉन्चपैड?

Jitendra Kumar by Jitendra Kumar
03/07/23
in राज्य, राष्ट्रीय
दिल्ली पर नीतीश की नजर, क्या यूपी हो सकता है लॉन्चपैड?
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नई दिल्ली । लोकसभा चुनाव 2024 को लेकर तमाम विपक्षी दल केंद्र की बीजेपी सरकार के खिलाफ एकजुट होने की कोशिश कर रहे हैं। जिसकी एक बानगी पिछले महीने पटना में हुई विपक्ष की बैठक भी है। इन सबके के बीच बिहार की मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की निगाह दिल्ली पर है, क्योंकि वो प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा पाले हैं, ऐसे में जदयू यूपी को लॉन्चपैड के रूप में देख रही है। यह वजह है कि प्रदेश जदयू समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन पर जोर दे रही है।

पटना में विपक्षी एकता बैठक के बाद से जदयू उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन की तलाश में है। उसकी नजर पूर्वी यूपी की फूलपुर और प्रतापगढ़ की दो लोकसभा सीटों पर है। पार्टी यह भी कैलकुलेशन कर रही है कि अगर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार फूलपुर से लोकसभा चुनाव लड़ते हैं तो इससे कुर्मियों और यादवों के वोट, जिन्हें अन्य पिछड़ा वर्ग के रूप जाना जाता है। यह वोट भाजपा के खिलाफ विपक्षी गठबंधन के पक्ष में एकजुट हो जाएंगे।

विपक्ष को साथ लाने का काम कर रहे नीतीश कुमार
ऐसे में जेडीयू खुद को यूपी में अपनी पहचान बनाने की कोशिश कर रही है। जिसको 2019 के आम चुनावों में 0.01% वोट मिले थे, लेकिन माना जाता है कि नीतीश कुमार, जो प्रधानमंत्री पद की महत्वाकांक्षा पाले हैं। वो भाजपा के खिलाफ विपक्ष को एक साथ लाने के लिए काम कर रहे हैं और बिहार के बाहर सीट की तलाश कर सकते हैं।

इसके अलावा फूलफुर सीट की एक अलग ही पहचान रही है, क्योंकि इस सीट से पूर्व प्रधानमंत्रियों जवाहरलाल नेहरू और वीपी सिंह प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। यह वह सीट भी है जहां से समाजवादी विचारक राम मनोहर लोहिया ने चुनाव लड़ा था। पार्टी के एक नेता ने कहा, “नीतीश कुमार राम मनोहर लोहिया की विचारधारा के समर्थक हैं, जिन्होंने 1962 में फूलपुर से चुनाव लड़ा था। इसलिए, ओबीसी बहुल फूलपुर उनके लिए आदर्श सीट है।”

जदयू के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि यूपी में बड़ी संख्या में गैर-यादव ओबीसी वोट है, जो पहले बहुजन समाज पार्टी के साथ था। पिछले 10 सालों से यह वोट भाजपा के पाले में चला गया। 2022 के विधानसभा चुनावों से सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने ओबीसी को एक साथ लाने की कोशिश शुरू की है, लेकिन विधानसभा चुनावों में उन्हें ज्यादा सफलता नहीं मिली। ऐसे में अगर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार फूलपुर से चुनाव लड़ते हैं, तो वह कुर्मी और यादव मतदाताओं को एक साथ ला सकते हैं। साथ ही सपा-जदयू का यह प्रभावी गठबंधन भाजपा को मात दे सकता है।

कुर्मी जाति से आते हैं नीतीश कुमार
जिसका सबसे बड़ा कारण एक यह भी है कि नीतीश कुमार खुद कुर्मी जाति से आते हैं। कुर्मी वोट पूर्वी और मध्य यूपी के कई निर्वाचन क्षेत्रों काफी निर्णायक माना जाता है। नेता ने कहा कि जेडीयू और एसपी के बीच गठबंधन लगभग तय है। जब सीट बंटवारे पर चर्चा शुरू होगी तो जदयू फूलपुर और प्रतापगढ़ की दो सीटें उसके लिए छोड़ने के लिए सपा नेतृत्व से बात करेगा। इससे विपक्षी गठबंधन के समर्थन में कुर्मी मतदाता एकजुट होंगे। नेता के अनुसार, यूपी के कई निर्वाचन क्षेत्रों में कुर्मी और यादव लगभग समान संख्या में मौजूद हैं।

यूपी में जदयू-सपा बना सकते हैं बीजेपी के खिलाफ गठबंधन
जेडीयू के मुख्य राष्ट्रीय प्रवक्ता केसी त्यागी ने द इंडियन एक्सप्रेस से कहा, ”नीतीश कुमार पर पार्टी कार्यकर्ताओं की ओर से लोकसभा चुनाव लड़ने का दबाव है, लेकिन नीतीश कुमार ने अभी तक किसी खास सीट से चुनाव लड़ने का मन नहीं बनाया है। उन्होंने कहा कि जहां तक फूलपुर की बात है तो सपा और अखिलेश यादव को शामिल किए बिना कुछ भी तय नहीं होगा। त्यागी ने कहा कि जदयू और सपा यूपी में बीजेपी के खिलाफ एक मजबूत गठबंधन बना सकते हैं।

सपा प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी ने कहा, ‘अब तक, जदयू और सपा सहित विपक्षी दलों ने भाजपा को हराने के लिए एक साथ फैसला लिया है, लेकिन यूपी में गठबंधन को लेकर अभी कुछ तय नहीं हुआ है।’

इन जिलों में है कुर्मी जाति का अच्छा दबदबा
कुर्मी पूर्वी और मध्य यूपी के जिलों जैसे मिर्ज़ापुर, वाराणसी, चंदौली, प्रयागराज, कौशांबी, प्रतापगढ़, फ़तेहपुर, बस्ती, गोंडा, बहराईच, भदोही और सोनभद्र में चुनावी रूप से महत्वपूर्ण है। वहीं प्रतापगढ़ में ब्राह्मणों और ठाकुरों का वर्चस्व है, जबकि यहां कर्मी मतदाता तीसरे नंबर पर है। प्रयागराज में कुर्मी जाति का अच्छा खासा दबदबा है

वहीं फूलपुर की मौजूदा सांसद बीजेपी की केशरी देवी पटेल भी कुर्मी हैं। लोकप्रिय कुर्मी नेता और अपना दल के संस्थापक सोनेलाल पटेल ने भी 2004 में यहां से चुनाव लड़ा था। हालांकि के सपा उम्मीदवार अतीक अहमद जीत हासिल की थी। फूलपुर में मुस्लिम, यादव और अन्य ओबीसी जैसे मौर्य, निषाद और राजभर भी महत्वपूर्ण संख्या में हैं।

पिछले साल पटना में जेडीयू की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में पार्टी के यूपी नेताओं ने पहली बार प्रस्ताव रखा कि नीतीश कुमार को राज्य से लोकसभा चुनाव लड़ना चाहिए।

राज्य जद (यू) के एक नेता ने कहा, ‘यूपी इकाई ने सुझाव दिया कि नीतीश कुमार को मिर्ज़ापुर, फूलपुर या अंबेडकर नगर की तीन सीटों में से किसी एक पर चुनाव लड़ना चाहिए। उन्होंने कहा कि हमें केंद्रीय नेतृत्व से अभी तक कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली है, लेकिन हमने यूपी से नीतीश कुमार की उम्मीदवारी की वकालत की है। नेता ने कहा कि पार्टी ने सपा के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ने के लिए खुद को तैयार करने के लिए सदस्यता अभियान के रूप में अपना संगठनात्मक विस्तार पहले ही शुरू कर दिया है।”

यूपी+बिहार=गई मोदी सरकार
इसके बाद से ही गठबंधन की बातें हवा में हैं। पिछले साल नीतीश की अखिलेश से मुलाकात के बाद लखनऊ में समाजवादी पार्टी कार्यालय के बाहर लगा एक बैनर काफी चर्चा में रहा था। जिस पर नीतीश और अखिलेश की तस्वीरें लगी हुईं थीं। बैनर पर नारा लिखा था यूपी+बिहार=गई मोदी सरकार। फिलहाल यह देखने वाली बात होगी कि अगर यूपी में सपा और जदयू का गठबंधन होता है तो इससे किस राजनीतिक दल को कितना नफा-नुकसान होता है।

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