नई दिल्ली : दिल्ली और हरियाणा की सीमा सिंघु बॉर्डर (Singhu Border) पर जल्द ही एक बार फिर किसानों का जमावड़ा होने वाला है। शहीद किसान श्रद्धांजलि समारोह को लेकर संयुक्त किसान मोर्चा (आराजनीतिक) की ओर से ऑनलाइन बैठक की गई है।
बैठक में तय हुआ है कि आगामी 11 दिसंबर को शहीद किसान श्रद्धांजलि समारोह का आयोजन हरियाणा के जिला सोनीपत में पड़ने वाले सिंघु बॉर्डर पर स्थित राजीव गांधी एजुकेशन सिटी (राई) के गेट के सामने किया जाएगा। श्रद्धांजलि समारोह में हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, दिल्ली सहित विभिन्न राज्यों के किसान व शहीद किसानों के परिजन हिस्सा लेंगे।
भारतीय किसान एकता बीकेई अध्यक्ष लखविंद्र सिंह औलख ने इस बारे में जानकारी देते हुए बताया कि इस समारोह में भारी भीड़ जुटेगी। इस सिलसिले में वह भी अपनी टीम के साथ सिरसा क्षेत्र के गांवों में जाकर किसानों को न्यौता दे रहे हैं।
इसी कड़ी में वीरवार को उन्होंने ढुडियांवाली, बाहिया, सैनपाल कोठा, बणी, नथौर, बचेर, कालुआना, मम्मड़ खेड़ा, मत्तुवाला, सादेवाला, केहरवाला सहित दर्जनों गांवों का दौरा किया। किसान नेता लखव्द्रिर सिंह औलख ने बताया कि इस समारोह में शहीद किसानों के परिवारों की मौजूदगी में शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करके आगामी आंदोलन की रणनीति तय की जाएगी और केंद्र सरकार के प्रतिनिधि को राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन सौंपकर पंचायत का समापन किया जाएगा।
उन्होंने मांगों का जिक्र करते हुए बताया कि स्वामीनाथन आयोग के फॉर्मूले के अनुसार एमएसपी की गारंटी का कानून बनाना, किसानों को पूर्ण कर्ज मुक्त करना, किसानों की जमीन का अधग्रिहण करते समय 2013 के भूमि अधग्रिहण कानून के अनुसार किसानों को कलेक्टर रेट से 4 गुना से अधिक मुआवजा, मुश्तर्का मालकान व देह शामलात जमीनों का मसला, हरियाणा सरकार का नया भूमि अधग्रिहण कानून रद्द करवाना, लखीमपुर खीरी के शहीद किसानों को न्याय दिलवाकर एवं गृह-राज्यमंत्री अजय टेनी की गिरफ्तारी, मुक्त व्यापार समझौतों पर रोक लगवाना शामिल है।
गौरतलब है कि, अब रद्द हो चुके तीन विवादित कृषि कानूनों के खिलाफ आर-पार की लड़ाई का ऐलान करते हुए 26 नवंबर 2020 से हजारों की तादाद में किसानों ने दिल्ली, हरियाणा और उत्तर प्रदेश की सीमाओं पर करीब एक साल तक प्रदर्शन किया था। उस किसान आंदोलन का केंद्र सिंघु बॉर्डर ही था। बता दें कि, केन्द्र सरकार उन तीन कृषि कानूनों को कृषि क्षेत्र में बड़े सुधार के तौर पर पेश कर रही थी, वहीं प्रदर्शन कर रहे किसानों ने आशंका जताई थी कि उन कानूनों से एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) और मंडी व्यवस्था खत्म हो जाएगी और वे बड़े कॉरपोरेट पर निर्भर हो जाएंगे।
